गाँवों में काम ठप्प भाग 2: बजट तो बढ़ा, मगर नियमों में उलझ गया गाँवों के विकास का पहिया

गाँवों में काम ठप्प भाग 2: बजट तो बढ़ा, मगर नियमों में उलझ गया गाँवों के विकास का पहियाफोटो साभार: गूगल

अरविंद शुक्ला/ अश्वनी निगम

लखनऊ। करीब 60 हजार ग्राम पंचायतों वाले यूपी के हजारों गांवों में पिछले डेढ़ वर्ष से विकास कार्य नहीं हो रहे हैं। 14वें वित्त आयोग के तहत पंचायतों का फंड कई गुना बढ़ गया है, लेकिन फंड के इस्तेमाल के लिए जारी गाइडलाइंस, पंचायत प्रतिनिधियों में जागरुकता का अभाव और अधिकारियों की हीलाहवाली के चलते गांवों में विकास के पहिए थमे हुए हैं।

कार्ययोजना भेजी, मगर मुहर नहीं लगी

प्रदेश के ज्यादातर प्रधानों का कहना है कि पैसा उनके खातों में है, लेकिन उन्हें खर्च करने की अनुमति नहीं मिल रही है। उन्होंने जो कार्ययोजना बनाकर भेजी है, उस पर मुहर नहीं लग पा रही है। जबकि पंचायती राज विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि पंचायतों से ग्राम पंचायत विकास योजना (जीसीडीपी) के तहत कार्ययोजना ही नहीं आ रही है।

खुद कतराते हैं अधिकारी

पंचायतों को लेकर लंबे समय से आवाज उठाने वाले सामाजिक संगठन मताधिकाकर संघ के अध्यक्ष पीएन कल्की बताते हैं, “पहले केंद्र के हिस्से का पैसा राज्य सरकार के माध्यम से प्रधान तक पहुंचता था, लेकिन अब सीधे प्रधान के खाते में आता है। जीसीडीपी में साफ किया गया है कि गांव के विकास की योजना ब्यूरोक्रेट (अधिकारी) नहीं, बल्कि गांव के लोग बनाएं।” वो आगे बताते हैं क्योंकि पहले ग्राम पंचायतों में आए बजट का ऑडिट नहीं होता था, अब क्योंकि अधिकारी शामिल हो गए हैं तो कैग इसका ऑडिट करेगा। इसलिए जब गाइड लाइंस पूरी नहीं होगी, अधिकारी योजना को हरी झंडी दिखाने से कतराते हैं।”

प्रधानों को नहीं मिली ट्रेनिंग तो फिर...

इऩ सबके पीछे प्रधानों के अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि सरकार ने नई गाइंडलाइंस जारी की, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर की व्यवस्था नहीं की गई। व्यवस्था बदली है तो उसकी जानकारी भी मिलनी चाहिए, लेकिन हमें कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई। कानपुर जिले के पचोग गांव के ग्राम प्रधान पीयूष मिश्रा बताते हैं, “काम शुरू करने से पहले पांच साल की कार्ययोजना बनानी है। पहले पंचायत में सबकी सहमति मिले फिर उसे कंप्यूटर में एंट्री करानी है, जो वक्त पर नहीं हो पा रही है क्योंकि विभाग के पास पर्याप्त संख्या में कंप्यूटर और ऑपरेटर नहीं है।” हालात इतने बद्तर है कि अगर एक दिन में एक गांव का प्लान फीड किया गया तो साल भर ऐसे नहीं निकल जाएगा।” कानपुर के ही कुकरादेवा के प्रधान श्रीकांत शुक्ला बताते हैं, काम कैसे करना है न तो इसकी कोई ट्रेनिंग हुई और न ही कोई बताने वाला है।”

जो प्रधान सक्षम थे उनको...

दरअसल पंचायत चुनाव के बाद प्रदेशभर के प्रधानों को क्षमता विकास का प्रशिक्षण दिया जाना था। क्योंकि पहली कार्ययोजना वार्ड के पंचों द्वारा बनाई जानी है, इसलिए उन्हें ट्रेंड करने का प्रावधान था, लेकिन वो हो नहीं पाया पाया। ज्यादातर जिलों में सिर्फ प्रधानों को ही कामचलाऊ प्रशिक्षण मिला। ऐसे में जो प्रधान तकनीकि रुप से सक्षम थे या फिर जिले के अधिकारियों के आगे बढ़कर काम किया, वहां काम सुचारु रुप से चल रहा है।

क्या कहते हैं जिम्मेदार

सोनभद्र के जिला पंचायती राज अधिकारी पीएम श्रीवास्तव बताते हैं, “मेरे यहां 600 ग्राम पंचायतें हैं, जहां 50 हजार से लेकर 12 लाख तक के काम हो रहे हैं। प्रधानों की कार्ययोजना को स्वीकृत कर वेबसाइट पर अपलोड करवाकर उनकी वर्क आईडी जारी कर दी गई है। सभी प्रधानों को टेनिंग भी दी है। अभी कोई समस्या नहीं है।”

आवश्यक जानकारी और ट्रेनिंग तो मिले

हालांकि कई जिलों में अधिकारियों का ये भी कहना है कि पहले ग्राम पंचायतों में प्रधान और सचिव मिलकर कागज पर योजना बनाकर काम करा लेते थे। लोगों को उसकी भनक नहीं लगती थी, कि गांव में होना क्या है या होने वाला क्या है, लेकिन अब क्योंकि खुली पंचायतें बुलाने, वीडियो रिकार्डिंग कराने का प्रावधान है तो अधिकांश प्रधान इसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन प्रधानों का कहना है सबसे जरूरी है कि आवश्यक जानकारी और पूरी ट्रेनिंग हमें दी जानी चाहिए।

ऐसे पास बनाने और पास कराने हैं प्रस्ताव

नई गाइड लाइंस के मुताबिक, वार्ड के लोग प्रस्ताव बनाएंगे, प्रधान उसका अनुमोदन करेगा। प्रशासनिक कमेटी सारे वार्डों के प्रस्तावों को इकट्टठा करके ग्राम सभा की खुली बैठक बुलाएगी। उनमें सर्व सम्मति और प्राथमिकता के आधार पर तय काम प्रस्ताव में सरकारी मशीनरी (मैकेनिकल टीम) शामिल होगी। तकनीकी पहलुओं की चर्चा के बाद प्रस्ताव एक बार फिर ग्राम सभा की खुली बैठक में खुलकर सुनाया जाएगा। अनुमोदन होने पर उसे बजट के अनुरूप अधिकारियों के पास भेजा जाएगा। इसके तहत 50 हजार तक के काम का अनुमोदन ग्राम पंचायत पचास हजार एक रुपये लेकर ढाई लाख तक एडीओ पंचायत, ढाई लाख से ऊपर 5 लाख तक डीपीआरओ, जबकि इसके ऊपरी की योजना पर जिलाधिकारी मुहर लगाते हैं। वर्क आईडी जारी करने के बाद ही प्रधान पैसे खर्च कर सकते हैं।

कार्य योजना और अनुमोदन करने का अधिकार

50 हजार रुपये तक- ग्राम पंचायत

50001 से 2.5 लाख- एडीओ पंचायत

250.001 से 5 लाख – डीपीआरओ

500001 से ऊपर- डीएम

कंप्यूटर आपरेटर की नहीं हुई भर्ती

गांवों के विकास के लिए कार्ययोजना बनाने के लिए बड़ी संख्या में आपरेटर की नियुक्ति होनी थी। लेकिन कुछ जिलों में छोड़कर अधिकतर जिलों में एक से लेकर दो कंप्यूटर ही आपरेटर की नियुक्ति हुई है।

एक साल में खर्च करने हैं 40 लाख

विकास कामों के लिए हर ग्राम पंचायत को उसकी आबादी के मुताबिक दो करोड़ रुपए मिलना हैं। यानि सालाना ग्राम पंचायत को 40 लाख रुपए के फंड का इस्तेमाल विकास कामों के लिए करना है। पहले यह फंड 20 लाख होता था, लेकिन केन्द्र की तरफ से 14वें वित्त आयोग से 39.70 करोड़ और राज्य वित्त में तीन किस्तों में 37.36 करोड़ रुपए मिलना है। इसकी पहली किश्त जारी भी हो चुकी है।

सरकार ने नई गाइंडलाइंस जारी की, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर की व्यवस्था नहीं की गई। व्यवस्था बदली है तो उसकी जानकारी भी मिलनी चाहिए, लेकिन हमें कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई।
पीयूष मिश्रा, प्रधान, पचोग, कानपुर

काम शुरू करने से पहले पांच साल की कार्ययोजना बनानी है। पहले पंचायत में सबकी सहमति मिले, फिर उसे कंप्यूटर में एंट्री करानी है, जो वक्त पर नहीं हो पा रही है क्योंकि विभाग के पास पर्याप्त संख्या में कंप्यूटर और ऑपरेटर नहीं है।
श्रीकांत शुक्ला, प्रधान कुकरदेवा, कानपुर

सोनभद्र की सभी 600 ग्राम पंचायतों में 50 हजार से 12 लाख तक के काम हो रहे हैं, हमने प्रधानों को ट्रेनिंग दिलाकर योजना वेबसाइट पर फीड कराई है और उनकी वर्क आईडी भी जारी करा दी, यहां कोई समस्या नहीं है।
पीएम श्रीवास्तव, जिला पंचायती राज अधिकारी, सोनभद्र

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