उल्लूओं की घटती संख्या पर विशेषज्ञ चिंतित

उल्लूओं की घटती संख्या पर विशेषज्ञ चिंतितउल्लूओं की घटती संख्या पर विशेषज्ञ चिंतित।

जयपुर (भाषा)। राजस्थान में तस्करी एवं अवैध रूप से शिकार के कारण उल्लुओं की घटती संख्या पर विशेषज्ञों ने चिता जताई है और इनके संरक्षण की मांग की है ताकि इस रेगिस्तानी राज्य से इनको विलुप्त होने से बचाया जा सके।

राजस्थान के अतिरिक्त प्रधान वन संरक्षक जीवी रेड्डी ने ‘स्वीकार किया कि राज्य में कितने उल्लू है, इसके बारे में अधिकृत जानकारी नहीं है। वन विभाग के पास प्रदेश में उल्लू की संख्या को लेकर आंकड़े नहीं है।

राज्य सरकार के पास उल्लूओं की संख्या ज्ञात नहीं होने पर गहरी नाराजगी जताई और कहा कि इससे स्पष्ट है कि सरकार उल्लूओं के प्रति कितनी अनदेखी कर रही है।
बाबू लाल जाजू वन्यजीव संरक्षक और पर्यावरणविद

उन्होंने कहा कि सरकार की अनदेखी के कारण ही प्रदेश में उल्लूओं की संख्या लगातार कम होती जा रही है। सरकार ने उल्लुओं के सरंक्षण की ओर ध्यान नहीं दिया तो गिद्ध की तरह एक दिन राजस्थान से उल्लू का भी नामोनिशान मिट जाएगा। गिद्ध की तरह उल्लू केवल चित्रों में ही नजर आएंगें।

जाजू ने कहा कि बाघों का कुनबा बढ़ता है तो सरकार जोरशोर से प्रचार करती है लेकिन जब बाघ गायब होते है या मरते है तो अधिकारी फोन तक नहीं उठाते। उन्होंने कहा, ‘‘मैं भीलवाडा के नजदीक अरसी की पहाड़ी के पास घायल बीमार जीवों का अस्पताल चलाता हूं। अस्पताल में छह उल्लूओं का उपचार हो चुका है।''

वन विभाग में वन्यजीवों की गणना का लेखा जोखा रखने वाले कमलेश मीणा ने कहा कि प्रदेश में कितने उल्लू हैं, इसके बारे में विभाग के पास जानकारी नहीं है। विभाग ने उल्लूओं के बारे में कभी गणना नहीं करवाई। वन्यजीवों का अध्ययन करने वाले शोधकर्ता ही इस बारे में जानकारी दे सकते है।

पीपुल फॉर एनीमल्स के प्रदेश प्रभारी जाजू ने कहा कि देश में कुछ वर्ष पहले उल्लू बहुतायत में दिखाई देते थे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उल्लू की मांग में तेजी आने के कारण शिकारियों की गतिविधियां भी तेज हो गई है।

जाजू के अनुसार इन दिनों बाजार में बार्न उल्लू, ग्रेट होर्नड उल्लू तथा यूरोपियन ईगल उल्लूओं का इस्तेमाल किया जाने लगा है। इनमें से प्रत्येक की कीमत तीन लाख से पांच लाख रुपए तक है। उल्लू को शोध के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है। शिकारी उल्लूओं को जंगल से पकड़कर व्यापारियों को बेचते हैं जिनके एजेन्ट उन्हें नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते यूरोप एवं मध्य पूर्व पहुंचाते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत में 1990 में वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम, 1972 के तहत इन्हें पकड़ने के और व्यापार करने पर रोक लगाई थी लेकिन उल्लू की तस्करी का गोरखधंधा नहीं थम पाया।

तांत्रिक पूजा और अनुष्ठान के लिए उल्लू की खोपड़ी, पंख, कान, पंजे, हृदय, यकृत, गुर्दे, खून, आंखे, चर्बी, अण्डे, मांस और हड्डियां का देश एवं प्रदेश में पक्षियों का अवैध व्यापार करने वालों ने अब उल्लू को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया। उल्लू के अंगों का इस्तेमाल तंत्र मंत्र के साथ ही शक्ति तथा सिद्घि प्राप्ति के लिए ही किया जाता है, इसलिए तांत्रिक भी इनकी खोज में रहते हैं।
वन्यजीव प्रेमी ने बताया

महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान में 8 किस्म के उल्लू पाए जाते है लेकिन सभी प्रजातियां अब लुप्त होने के कगार पर है।

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