नोटबंदी: कालेधन पर चोट या RBI की स्वायत्तता पर ‘आघात’?

नोटबंदी: कालेधन पर चोट या RBI की स्वायत्तता पर ‘आघात’?भारतीय रिजर्व बैंक।

नई दिल्ली (आईएएनएस)। केंद्र सरकार द्वारा की गई नोटबंदी के बाद देश में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्वायत्तता के मुद्दे पर बहस छिड़ गई है। अर्थशास्त्री हालांकि इस पर अलग-अलग राय जता रहे हैं। लेकिन सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या RBI ने अपने गवर्नर उर्जित पटेल के कार्यकाल में अपनी स्वायत्तता खो दी है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने नोटबंदी के अभियान पर जिस तरह मोर्चा संभाला, कम से कम उसे देखकर तो कई विशेषज्ञों को ऐसा ही लग रहा है।

पूर्व प्रधानमंत्री और RBI के गवर्नर रह चुके मनमोहन सिंह ने संसद में हाल ही में कहा था कि नोटबंदी के बाद बैंकिंग प्रणाली के नियमों में बार-बार संशोधन देश के लिए अच्छा नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री ने पिछले महीने राज्यसभा में कहा था, ''इसका प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्री कार्यालय और RBI पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। मुझे इस बात का खेद है कि RBI पूरी तरह बेनकाब हो गया है, उसकी आलोचनाएं हो रही हैं।'' इस पूरे अभियान में यह बात स्पष्ट नहीं हुई है कि इस नीतिगत फैसले में केंद्रीय बैंक ने कितना हस्तक्षेप किया।

RBI के पूर्व गवर्नर केसी चक्रवर्ती ने लंदन से टेलीफोन पर कहा, ''सरकार ने कहा है कि नोटबंदी की सिफारिश RBI ने की। मुझे नहीं पता कि ऐसा करने के लिए सरकार ने RBI पर दबाव डाला, या उसने खुद यह फैसला लिया।''

मैं तब तक कुछ बोलने में सक्षम नहीं होऊंगा, जब तक बोर्ड की बैठक की रिपोर्ट सामने नहीं आ जाती। RBI का रुख तो हमेशा नोटबंदी के खिलाफ रहा है।
केसी चक्रवर्ती, पूर्व गवर्नर, RBI

ब्लूमबर्ग के एक सवाल के जवाब में केंद्रीय बैंक ने कहा है कि 500 और 1,000 रुपये के नोटों को अमान्य करने का फैसला आठ नवंबर को शाम 5.30 बजे लिया गया, मतलब मोदी की घोषणा से मात्र तीन घंटे पहले।

रातोंरात देश में मौजूद 15.44 लाख करोड़ रुपये या कुल 86 फीसदी मुद्रा अवैध घोषित कर दी गई। लोग अपने पुराने नोटों को कैसे जमा करेंगे या उन्हें नए नोटों से किस तरह बदलेंगे, इसको लेकर नियमों को रोजाना हिसाब से बदला गया।

केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता के संबंध में चक्रवर्ती ने कहा, ''आपको यह बात समझनी चाहिए कि सरकार से RBI को जो स्वायत्तता मिलती है, इसका कारण यह है कि वह उसे स्वयत्तता देना चाहती है। अगर सरकार किसी निकाय को स्वायत्तता नहीं देना चाहे, तो RBI कुछ नहीं कर सकता।''

भारत के सबसे ज्ञानी लोग RBI के गवर्नर हुए हैं। इनमें वर्तमान गवर्नर उर्जित पटेल का नाम भी शामिल है। वह एक अच्छे अर्थशास्त्री हैं। लेकिन उनके आते ही यह स्वायत्त संस्था दंतविहीन हो चुकी है। RBI सिर्फ सरकार के निर्देश पर नोटिस जारी कर रहा है और वापस ले रहा है। उसकी कोई मर्जी नहीं चल रही है।
अमित मित्रा, वित्तमंत्री, पश्चिम बंगाल

अमित मित्रा ने कहा, ''नोटबंदी के संदर्भ में जो सबसे खतरनाक बात है, उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। गंभीर मुद्दा यह है कि ऐतिहासिक प्रकृति के भारत के मौलिक संस्थान की अनदेखी की जा रही है और उसे प्रभावहीन किया जा रहा है। इसलिए लोगों का इस पर से विश्वास उठ रहा है। यह देश के लिए बहुत खतरनाक बात है।''

जिन पैसों को अवैध घोषित किया जा चुका है, उन्हें अभी भी बदला जाना है। RBI ने कहा था कि 2,000 रुपये और 500 रुपये के नए नोटों की शक्ल में 5.93 लाख करोड़ रुपये मूल्य के नोट छापे जा चुके हैं। लेकिन 10 नवंबर के बाद से ही देश में अधिकांश एटीएम बंद हो गए, और जो खुले रहे, उनमें जल्द ही नकदी खत्म होने के कारण ‘नो कैश’ का बोर्ड लटक गया। पैसे निकालने की अधिकतम सीमा कम होने के बावजूद बैंकों के कैश काउंटर का यह हाल चिंताजनक है। इतनाही नहीं, कई बैंककर्मियों का भी केंद्रीय बैंक पर से भरोसा खत्म होता दिखाई दे रहा है।

एक बैंक के मुख्य कार्यकारी ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर कहा, ''हां, ऐसा लगता है कि नोटबंदी के मुद्दे पर RBI ने अपनी स्वायत्तता खो दी है और केंद्रीय बैंक कुव्यवस्था की भेंट चढ़ गया है।'' उन्होंने कहा, ''RBI को चलन में मौजूद 86 फीसदी नोटों को वापस लेने और उसे देश के कोने-कोने तक पहुंचनाने के सिलसिले में सामने आ रही जमीनी हकीकत से केंद्र सरकार को अवगत कराना चाहिए था।''

लेकिन कुछ अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ जैसे पूर्व केंद्रीय राजस्व सचिव और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व कार्यकारी निदेशक एमआर शिवरमण के मुताबिक, नोटबंदी का RBI की स्वायत्तता से कोई लेना-देना नहीं है। सबसे उलट वह यह मानते हैं कि हालात को बेहतर तरीके से संभालने के लिए आरबीआई को पहल करनी चाहिए थी।

इंफोसिस बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष टीवी मोहनदास पई ने केंद्रीय बैंक की स्वयत्तता को हानि पहुंचने की बात को खारिज करते हुए कहा, ''नोटबंदी से कालेधन पर लगाम लगेगी, नकली नोट खत्म होंगे और बैंकिंग प्रणाली से बाहर फंसे धन प्रणाली का हिस्सा बनेंगे।''

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