चुनावी नब्ज़ टटोलती पार्टियां स्वास्थ्य सेवा की नब्ज़ भी देखें

चुनावी नब्ज़ टटोलती पार्टियां स्वास्थ्य सेवा की नब्ज़ भी देखेंयूपी के ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में 50 फीसदी नर्सिंग स्टाफ की कमी

इंडिया स्पेंड

लखनऊ। यूपी में चुनाव दस्तक दे चुके हैं। गाँवों में स्वास्थ्य व्यवस्था के सुधार की घोषणा हर बार की तरह इस बार भी लगभग सभी दलों ने की है जबकि हकीकत ये है कि उत्तर प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में 50 फीसदी नर्सिंग स्टाफ की कमी है।

पचहत्तर जिलों में 814 ब्लॉक और 97607 गाँवों के साथ, आबादी की दृष्टि से उत्तर प्रदेश पांचों चुनावी राज्यों में सबसे बड़ा है। लेकिन स्वास्थ्य, पोषण परिणाम, बुनियादी ढांचे और सुरक्षा संकेतक की दृष्टि में यह अब भी सुस्त है। इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है कि चुनाव वाले पांच राज्यों में से उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति सार्वजनिक व्यय यानी राज्य और केंद्र दोनों सरकार का, सबसे कम है।

गोवा, जहां की आबादी उत्तर प्रदेश की आबादी के 1 फीसदी से भी कम है, वहां नागरिकों के स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति पांच गुना ज्यादा खर्च किया जाता है। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य का सार्वजनिक औसत खर्च भारतीय औसत का 70 फीसदी है। कम खर्च से स्वास्थ्य संस्थानों में डॉक्टरों, नर्सों और सहयोगी स्टाफ की कमी जैसी समस्याएं होती हैं। यही कारण है कि यहां दो में से एक बच्चे का पूर्ण टीकाकरण नहीं होता है।

राज्य के 14 फीसदी परिवारों को अनर्गल स्वास्थ्य व्यय का सामना करना पड़ता है, जो कि कुल घरेलू खर्च से 25 फीसदी ज्यादा है। भारतीय औसत की तुलना में यूपी के 15.2 फीसदी लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा कवरेज से 4.2 फीसदी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2016 के अध्ययन के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में आधे से ज्यादा डॉक्टर हैं। यह अनुपात देश भर में सबसे अधिक है। यह शायद अन्य स्वास्थ्य कर्मियों के पर्याप्त संख्या नहीं होने का एक नतीजा है। उत्तर प्रदेश में, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की संख्या भी सबसे कम है। यह संख्या करीब 19.9 फीसदी है, जबकि भारतीय औसत 38 फीसदी है।

उदाहरण के लिए, यदि नर्सों की संख्या के हिसाब से रैंकिग देखें तो देश में नीचे से 30 जिलों में से ज्यादातर जिले उत्तर प्रदेश के हैं। कुछ जिले बिहार और झारखंड में भी स्थित हैं। उत्तर प्रदेश जहां देश की 16.16 फीसदी आबादी रहती है, वहां केवल 10.81 समग्र स्वास्थ्य कार्यकर्ताएं थे। हालांकि नवीनतम जनगणना के आंकड़ों (जिसका विश्लेषण बाकी है) के आधार पर संख्या में ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ (एनआरएचएम) के कारण आंशिक रूप से सुधार हो सकता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के समग्र रैंकिंग में बदलाव होने की संभावना कम है।

सरकार की ओर से नवीनतम उपलब्ध राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के 71वें दौर के आंकड़ों के आधार पर एक संस्था ‘ब्रूकिंग्स इंडिया’ द्वारा हाल के एक शोध के अनुसार उत्तर प्रदेश प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य पर हर साल 488 रुपये खर्च करता है। ये आंकड़े केवल बिहार और झारखंड से ज्यादा हैं। हिमाचल प्रदेश द्वारा 1,830 रुपए खर्च किए जाते हैं, जिसकी तुलना में उत्तर प्रदेश का खर्च केवल 26 फीसदी है।

शिशु मृत्यु दर में यूपी तीसरे नंबर पर

दिसंबर 2016 में जारी किए गए, 2015 के लिए नवीनतम नमूना पंजीकरण प्रणाली बुलेटिन के अनुसार, 36 भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में, शिशु मृत्यु दर (आईएमआर, प्रति 1000 जीवित जन्मों पर होने वाली मौत) के मामले उत्तर प्रदेश नीचे से तीसरे स्थान पर है। अपेक्षाकृत कई गरीब राज्य उत्तर प्रदेश की तुलना में काफी बेहतर हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश भर में मातृ मृत्यु दर (मैटरनल मोरटालिटी रेशियो-एमएमआर यानी प्रति 100,000 जन्म पर होने वाली मौत) के संबंध में, उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है। यदि नवीनतम उपलब्ध वर्ष 2014 के एसआरएस के आंकड़ों पर नजर डालें तो हरियाणा को छोड़कर, बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश में जन्म के समय लिंग अनुपात सबसे कम है।

यूपी में जन्म पंजीकरण में प्रगति नहीं

नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों अनुसार, भारत में बच्चों के जन्म के पंजीकरण का समग्र स्तर 2013 में 85.6 फीसदी से बढ़ कर 2014 में 88.8 फीसदी हुआ है। उत्तर प्रदेश में जन्म पंजीकरण प्रगति नहीं हुई है। राज्य में 68.3 फीसदी से ज्यादा जन्मों के पंजीकरण नहीं हुए हैं। यदि हम सरकारी आंकड़ों को छोड़, तीसरे पक्ष के सर्वेक्षणों जैसे आरएसओसी 2013-14 पर नजर डालें तो 39.1 फीसदी के साथ उत्तर प्रदेश का जन्म पंजीकरण सबसे नीचे है, जबकि राष्ट्रीय औसत 71.9 फीसदी है।

बाल विवाह पर ध्यान देना जरूरी

बच्चे पर रैपिड सर्वे (आरएसओसी) 2013-14 के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश उन कुछ भारतीय राज्यों में से है, जहां महिलाओं की शादी के लिए औसत उम्र शादी के लिए संवैधानिक उम्र यानी 18 वर्ष से कम है। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि राज्य में उच्च शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में सुधार के लिए बाल विवाह के मुद्दे पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है।

यूपी में जन्म पंजीकरण में प्रगति नहीं

भारत में बच्चों के जन्म के पंजीकरण का समग्र स्तर 2013 में 85.6 फीसदी से बढ़ कर 2014 में 88.8 फीसदी हुआ है। उत्तर प्रदेश में जन्म पंजीकरण प्रगति नहीं हुई है। राज्य में 68.3 फीसदी से ज्यादा जन्मों के पंजीकरण नहीं हुए हैं। तीसरे पक्ष के सर्वेक्षण आरएसओसी 2013-14 के अनुसार 39.1 फीसदी के साथ उत्तर प्रदेश का जन्म पंजीकरण सबसे नीचे है।

सीएचसी में 84 फीसदी विशेषज्ञ कम

ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी-2016 के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सीएचसी में 84 फीसदी विशेषज्ञों की कमी है। यदि पीएचसी और सीएचसी, दोनों को एक साथ लिया जाए तो उनकी जरूरत की तुलना में मात्र पचास फीसदी स्टाफ हैं।

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