जिस दिन राजनीति बदल गई

जिस दिन राजनीति बदल गईअयोध्या में लोग उस मंजर को याद कर सिहर उठते हैं। फोटो : गाँव कनेक्शन

राजेन्द्र कुमार

कुछ घटनाएं कभी नहीं भूलतीं। दिल के किसी कोने में घर बना लेती हैं। फिर चाहे वह 8 नवंबर 2016 की नोटबंदी वाली रात हो। या 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या के रामजन्मभूमि परिसर में हुआ ध्वंस। देश के करोड़ों लोग जहां अभी बिना नकदी, खाली जेब की बैचेनी और पीड़ा में जी रहे हैं और समूचा भारत नोटबंदी से लाभ और हानि की बहस में उलझा है। ठीक इसी प्रकार 6 दिसम्बर 1992 को जब अयोध्या के रामजन्मभूमि परिसर में एक जर्जर धार्मिक स्थल का ध्वंस हुआ था, तब भी पूरा भारतवर्ष ऐसी ही बहस में उलझ गया था।

एक कड़वी याद

अयोध्या के रामजन्मभूमि परिसर में हुआ ध्वंस मेरी एक ऐसी ही कड़वी याद है। यह ध्वंस हमारी हिन्दू-मुस्लिम मेलजोल वाली संस्कृति पर एक जख्म है। और बहुलतावादी भारतीय लोकतंत्र के मुंह पर ऐसी कालिख है जो चौबीस साल में भी धुल नहीं पाई। 6 दिसम्बर 1992 के दिन बाबरी ढांचे की शक्ल में जब हमारे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्य तोड़े गए। तब अयोध्या में रामजन्मभूमि परिसर का करीब 46 एकड़ इलाका जिस नफरत, उन्माद और जुनून की गिरफ्त में था, इसकी एक-एक याद आज भी मेरे जहन में है। कैसे उन्मादी कारसेवकों ने करीब पांच घंटे में रामजन्मभूमि मंदिर के ढांचे को गिरा दिया, वह भुलाये नहीं भूलता।

याद करके शरीर कांप जाता है

आज भी ‍24 बरस पहले अयोध्या में घटित यह ध्वंस शरीर में सिहरन पैदा कर देता है, हालांकि अब वैसा जुनून अयोध्या के किसी कोने में दिखाई नहीं देता। अयोध्या में रामजन्म भूमि परिसर के समीप रहने वाले अधिकांश लोग भी इस घटना के गवाह हैं। जिनके जहन में अयोध्या मंदिर ध्वंस की यादें बस सी गई हैं। मैं भी छह दिसंबर 1992 के मंदिर ध्वंस की घटना के दौरान अयोध्या में मौके पर मौजूद रहा था। मैंने मंदिर ध्वंस के पहले और उसके बाद का माहौल देखा है। अयोध्या में 6 दिसम्बर 1992 को जो हुआ उसकी यादें मेरे जहन में हमेशा ही चलती रहती हैं। कैसे मैं 6 दिसंबर की सुबह -सुबह अपने साथियों के साथ मंदिर परिसर में बिना किसी भय और आशंका के कवरेज के लिए पहुंचा था। फिर वहां क्या-क्या हुआ? कैसे हुआ? आए दिन यह मुझे याद आता। याद और जुनून की गिरफ्त में था, इसकी एक-एक याद आज भी मेरे जहन में है। कैसे उन्मादी कारसेवकों ने करीब पांच घंटे में रामजन्मभूमि मंदिर के ढांचे को गिरा दिया, वह भुलाये नहीं भूलता।

सबसे शर्मनाक घटना

6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में आजाद भारत की सबसे शर्मनाक घटना घटेगी, इसका अंदाज हमें सुबह छह बजे उस समय नहीं हुआ था, जब मैं अपने दो फोटोग्राफर साथियों के साथ रामजन्मभूमि मंदिर के ठीक सामने बने मानस भवन की छत पर पहुंचा था। वहां विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के तमाम कार्यकर्ता तमाम पत्रकारों और फोटोग्राफरों के साथ मौजूद थे। इन्होंने ही हमें बताया कि लालकृष्ण आडवाणी सहित तमाम नेता राजजन्मभूमि परिसर से सटे रामकथा कुंज में दस बजे के करीब पहुंचेंगे। तब तक आप लोग यहां की छत से रामजन्म भूमि परिसर के आसपास एकत्र हो गए जन सैलाब की फोटोग्राफ खींचे और हम लोगों द्वारा चाय पानी का जो इंतजाम किया गया है उसे ग्रहण करें। विहिप के जिस स्थानीय नेता ने मुझसे यह कहा था, उसे मैं नहीं जानता था, पर वह जनता था कि मैं किस अखबार से हूं और कहां रूका हूं। चाय पीते हुए उसने मुझे यह बताया।

सुरक्षा से लैस

इस विहिप नेता के साथ मानस भवन की छत पर कुछ देर रूकने के बाद हम हिन्दुस्तान टाइम्स के फोटोग्राफर संजय और उनके एक अन्य फोटोग्राफर साथी पाअलो के साथ रामजन्मभूमि मंदिर से कोई 50 मीटर दूर स्थित सी‍ता रसोई की 15 फुट ऊंची छत पर गए। वहां से देखा कि रामजन्मभूमि मंदिर के चबूतरे पर पूजा अर्चना चल रही थी। इसी भवन में पुलिस कंट्रोल रूम बना था। सीसीटीवी कैमरों के जरिए रामजन्मभूमि परिसर के सुरक्षा प्रबंधों पर कंट्रोल रूम में कुछ पुलिसकर्मी लगातार नजर रख रहे थे। लखनऊ जोन के आईजी अशोक कांत भी कंट्रोल रूम में लगे टीवी पर नजरें जमाये थे। करीब साढे दस बजे के आसपास शेषावतार मंदिर के पास कारसेवकों ने उत्पात मचाना शुरू किया। छत पर मौजूद फोटोग्राफर सक्रिय हुए। इसी बीच रामजन्मभूमि मंदिर के ढांचे के पीछे भी कारसेवकों ने पत्थर बरसाना शुरू किया और देखते ही देखते रामजन्मभूमि मंदिर के सामने के मैदान में भगदड़ मच गई।

कारसेवक बरसा रहे थे पत्थर

मैं भी सीता रसोई की छत से नीचे उतरा और ढांचे के उस ओर भागा जहां से कारसेवक ढांचे पर पत्थर बरसा रहे थे। ढांचे की सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मी जब तक इन कारसेवकों को रोकते रामकथा कुंज में नेताओं के भाषण सुन रहे हजारों लोग उस तरह आ गए। इन्हें देख ढांचे पर पत्थर बरसा रहे कारसेवकों के गुट का हौसला बुलन्द हुआ और वह लोग यकायक पत्थर बरसाते हुए ढांचे की तरफ भागे। फिर भी सीआरपीएफ, पीएसी और सिविल पुलिस के जवानों ने इन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज नहीं किया। पुलिसकर्मियों के एक्शन न लेने पर, यह कारसेवक बाबरी ढांचे के गुबंद तक पहुंच गये। कुछ कारसेवकों को गुबंद पर चढ़ा देख रामजन्मभूमि परिसर में बड़ी संख्या में मौजूद कारसवेवकों में गुबंद पर पहुंचने की होड़ सी लग गई।

जब फोटोग्राफर खींचने लगे फोटो

यह सब देखकर वहां मौजूद प्रेस फोटोग्राफर भी रामजन्मभूमि मंदिर के ढांचे पर चढ़‍‍ते कारसेवकों के इस एक्शन की फोटो खींचने लगे। मैं भी अपने कैमरे से ऐसी ही तस्वीरे खींचने लगा। इसी दरमियान मैदान में केसरिया कपड़े पहने मौजूद विहिप व भाजपा के कार्यकर्ता और कारसेवक फोटोग्राफरों को फोटो खींचने से रोकने लगे। परन्तु किसी फोटोग्राफर ने उनकी बात नहीं मानी। तो इन लोगों ने फोटोग्राफरों के साथ मारपीट शुरू कर दी। उनके कैमरे तोड़ने लगे। मेरा भी कैमरा तोड़ डाला गया और कुछ कारसेवकों ने मुझे और संजय को अकारण मारना शुरू कर दिया। कारसेवकों की मार से मेरा जबड़ा टूट गया। इन लोगों ने मेरे कैमरा का बैग छीन लिया। ऐसा ही सलूक अन्य फोटोग्राफरों और पत्रकारों के साथ भी किया गया। विदेशी फोटोग्राफर और पत्रकारों को भी नहीं बक्शा गया। मुझे कई विदेशी पत्रकार और फोटोग्राफर भी पिटाते हुए दिखाई दिए। कारसेवकों के चंगुल से छूटने के बाद मुझे अपनी सुरक्षा की चिंता हुई और मैं रामजन्मभूमि मंदिर की सुरक्षा के लिए बनाई गई दीवार पर चढ़ कर बैठ गया। इस दीवार पर तमाम लोग पहले से ही बैठे थे। मुझे भी दीवार पर बैठे लोगों ने बैठने की जगह दी। मैं वहीं से परिसर में घट रहे घटनाक्रम तथा कारसेवकों की गतिविधियों को देखने लगा।

हमला देख भागे पुलिसकर्मी

पत्रकारों तथा फोटोग्राफरों पर उग्र कारसेवकों द्वारा किए गए हमले को देख परिसर में मौजूद पुलिसकर्मी भी भाग गए। करीब 12 बजे मैंने देखा कि रामजन्मभूमि मंदिर के नजदीक न तो कोई खाकी वर्दी वाला पुलिसकर्मी मौजूद है और न ही कोई फोटोग्राफर। हर तरफ कारसेवक ही कारसेवक हैं। रामजन्मभूमि मंदिर और उसके तीनों गुबंद पर कारसेवकों का कब्जा था। पत्रकार और फोटोग्राफरों को परिसर से भगाया जा चुका था। और मंदिर के तीनों गुबंदों पर चढ़े हुए कारसेवक बैरिकेडिंग के पाइप, कुदाल आदि से गुबंदों को तोड़ने का प्रयास कर रहे थे। करीब एक घंटे में गुबंद पर चढ़े सैंकड़ों कारसेवकों ने तीनों गुबंदों के प्लास्टर को तोड़ डाला। इसी दरमियान परिसर में मौजूद कारसेवकों का एक गुट कहीं से मोटे-मोटे रस्से ले आया। जिसे रामजन्मभूमि मंदिर के तीन गुबंदों में से एक पर बांध दिया गया। फिर इस रस्से से और रस्से बांधे गए। नीचे खड़े लोगों ने इन रस्सों को खींचते हुए गुबंदों को गिराने का प्रयास शुरू कर दिया। पर वह गुबंद नहीं गिरा। तो कुछ कारसेवकों ने बैरिकेडिंग में लगे लोहे के पाइप से मंदिर की दीवारों को एक तरफ से तोड़ना शुरू कर दिया। गुबंदों को थामने वाली दीवारों के कमजोर होते ही करीब पौने तीन बजे रामजन्मभूमि के दाहिनी तरफ का गुबंद धड़ाम से जमीन पर गिर गया। जिसके नीचे कुछ कारसेवक भी दब कर मरे। फिर पौने चार बजे के करीब दायां गुबंद भी कारसेवकों ने इसी तरह से गिरा दिया। मंदिर के गर्भगृह वाले तीसरे गुबंद को करीब तीन बजकर पचास मिनट पर कारसेवकों ने गिराया। यह गुबंद गिरते ही मंदिर यही बनायेंगे का जयघोष हवा में गूजने लगा।

ध्वस्त हुए गुम्बद

करीब सवा चार बजे कारसेवकों की नफरत और जुनून से ध्वस्त हुए रामजन्मभूमि मंदिर के तीनों गुम्बदों के मलबे को देखता हुआ मैं पुलिस कंट्रोल रूम की ओर बढ़ा। वहां मुझे हैरान परेशान पुलिस अधिकारी दिखे। वायरलेस सेट हाथ में पकड़े तमाम अधिकारी वहां के घटनाक्रम के बारे में किसी को जानकारी दे रहे थे। पर कोई भी पुलिस अधिकारी कारसेवकों को वहां से हटाने के लिए प्रयास करता मुझे नहीं दिखा। यह लोग कारसेवकों को भी संयम में रहने का निर्देश नहीं दे रहे थे। शायद उनकी हिम्मत भी ऐसा निर्देश देने की नहीं थी, क्योंकि रामकथा कुंज की छत से आचार्य धर्मेन्द्र लगातार यह कह रहे थे कि यह मलबा नहीं बाबर की अस्थि‍यां है। इन्हें कारसेवक अपने साथ ले जाएं। उनका यह ऐलान लाउडस्पीकर से हवा में गूंज रहा था और इसे सुन कारसेवकों ने भी निशानी के तौर पर रामजन्म भूमि परिसर की मिट्टी, ईंट और बैरिकेडिंग में लगे लोहे के पाइप उठाने शुरू कर दिये।

मंदिर बनाने की जद्दोजहद

दूसरी तरफ विहिप के कार्यकर्ता और महंत रामचन्द्र परमहंस रामजन्मभूमि परिसर में रामलला का अस्थायी मंदिर बनाने की तैयारी में जुट गए। इन लोगों ने दो मोर्चे पर काम किया। एक मोर्चा अस्थायी मंदिर बनाने के काम में लगा और दूसरा बीएसएफ और सीआरपीएफ के जवानों को मंदिर परिसर तक ना पहुंचने देने की तैयारी में लगा। इस दूसरे मोर्चे में शामिल कारसेवकों को रामजन्मभूमि मंदिर की ओर आने वाली सड़क पर अवरोध खड़े करने के निर्देश किसी विहिप नेता ने रामकथा कुंज के माइक से करीब पांच बजे दिये। जिसके तुरन्त बाद अयोध्या से रामजन्मभूमि मंदिर के आने वाले हर रास्ते पर बड़े-बड़े पत्थर रखकर रास्ते को अवरुद्ध कर दिया गया। और महंत रामचन्द्र परमहंस की देखरेख में अस्थायी मंदिर निर्माण के लिए मंदिर के चबूतरे पर जमा गुबंदों के अवशेष हटाकर जमीन समतल करने का कार्य होने लगा। करीब पांच सौ से अधिक लोगों को इस कार्य में जुटा देख हमें रामजन्मभूमि परिसर में अस्थायी मंदिर निर्माण का कार्य रात भर में पूरा होने का विश्वास हो गया। इस निर्णय पर पहुंचने के बाद मैं खबर भेजने के लिए फैजाबाद की ओर चल पड़ा। रामजन्मभूमि मंदिर से फैजाबाद वापस लौटते हुए हमें कारसेवकों द्वारा सड़क पर खड़े किए गए तमाम अवरोध दिखाई दिये।

विध्वंस को हो गए 24 साल

आज इस विध्वंस के चौबीस साल बाद अयोध्या-फैजाबाद मार्ग पर यह अवरोध नहीं दिखायी देते। परन्तु अयोध्या में एक भव्य राममंदिर निर्माण को लेकर 6 दिसंबर 1992 को हुए इस ध्वंस ने जो बड़ा अवरोध लगाया था वह 24 साल बाद भी हट नहीं सका है। और सीबीआई जैसी देश की प्रमुख एजेंसी भी इस ध्वंस के इतने सालों बाद इसकी साजिश में शामिल रहे लोगों का पर्दाफाश नहीं कर सकी है। यही नहीं ढांचा ढहाने के आरोप में किसी कारसेवक को अब तक सजा भी नहीं मिली है और ना ही अब तक यह तय हो सका है कि मंदिर ध्वंस के उस उन्माद के लिए जिम्मेदार कौन है? हालांकि मंदिर ध्वंस की जांच के लिए बने लिब्रहान आयोग ने करोड़ों रुपए फूंक गए, इस आयोग ने हजार पेज की रिपोर्ट दी, पर एक भी अपराधी पर अंगुली नहीं रख सका। इसके चलते ही छह दिसंबर का दिन नफरत और धार्मिक हिंसा के इतिहास से जुड़ गया है। और इस दिन हम अयोध्या में चौबीस साल पहले हुए कभी ना भूल सकने वाले इस हादसे को याद करते हैं। मेरे जानने वाले तमाम दोस्त भी हर साल छह दिसम्बर की याद ताजा करते हैं कि किस तरह से अयोध्या के रामजन्मभूमि परिसर में एक 500 साल पुराने धर्मस्थल का ध्वंस भारत में रहने वाले पूरे मुस्लिम समाज को आहत करने वाली घटना बन गई। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये इनके निजी विचार हैं।)

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