मरते-मरते भी पांच की जिंदगी बचा गए महेश

मरते-मरते भी पांच की जिंदगी बचा गए महेशस्वर्गीय महेश जायसवाल (बायें) और अस्पताल में महेश के परिजन और डॉक्टर। (दाएं)

लखनऊ। वह अचानक काल के गाल में समा गए, मगर जाते-जाते उन्होंने पांच लोगों की जिंदगी बदल दी। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के डॉक्टर्स और लखनऊ पुलिस ने मिलकर एक और कोशिश रविवार को की। रविवार को ब्रेन डेड महेश प्रसाद जायसवाल की मौत के बाद उनका लिवर किसी की जिंदगी को बचाने के लिए दिल्ली भेजा गया है। इसके लिए लखनऊ ट्रैफिक पुलिस ने ग्रीन कॉरिडोर बनाया। एक एंबुलेंस लाल रंग के डिब्बे में लिवर को लेकर 4:34 पर केजीएमयू से रवाना हुई और मात्र 17 मिनट में 4:51 मिनट पर अमौसी एयरपोर्ट पहुंची।

ऑटो से जा रहे थे, हो गया एक्सीडेंट

रायबरेली के रहने वाले महेश प्रसाद जयसवाल (42) मुम्बई के एक सरकारी इण्टर कालेज के केमेस्ट्री के प्रोफेसर थे। वह अपने परिवार वालों के साथ दिवाली मनाने आए थे। तीन सितम्बर को वह प्रतापगढ़ अपनी सुसराल ऑटो से जा रहे थे। ऑटो पलटने से उनका एक्सीडेंन्ट हो गया और वह बुरी तरह घायल हो गए। एक्सीडेन्ट के बाद परिवार वाले उन्हें इलाहाबाद के एक निजी अस्पताल लेकर गए, मगर वहां से इनको चार तरीख को लखनऊ के मेयो अस्पताल में रेफर कर दिया गया। 5 तारीख को महेश को केजीएमयू के ट्रामा में लाया गया और रविवार को करीब 12:45 पर डाक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया।

अब तक 16 अंगदान केजीएमयू में

ब्रेन डेड घोषित करने के बाद महेश की पत्नी ललिता जयसवाल की स्वीकृति के बाद डाक्टरों ने अंगदान की प्रक्रिया शुरू कर 4:34 पर ग्रीन कोरिडोर की मदद से लिवर को दिल्ली और किडनी को एसजीपीजीआई भेजा गया, वही कारनिया को केजीएमयू के नेत्र विभाग को दे दिया गया। एक अकेले महेश की बदौलत पाँच लोगों को जीवनदान मिलेगा। महेश को मिलाकर अब तक केजीएमयू में 16 अंगदान हो चुके हैं। इसको मिलाकर राजधानी में यह 16 ग्रीन कोरिडोर बनाया गया था।

इस बार रूट मैप में था बदलाव

महेश की मौत के बाद शाम चार बजकर 34 मिनट पर केजीएमयू से ग्रीन कॉरीडोर बनाकर महज 17 मिनट में लीवर एयरपोर्ट पहुंचाया गया, जिसे दिल्ली भेजा गया। वहीं, दोनों किडनियों को ट्रांसप्लांट के लिए पीजीआई भेज दिया गया, जबकि कार्निया केजीएमयू के नेत्र रोग विभाग को दे दिया गया। एसपी ट्रैफिक ने बताया कि रूट मैप के हिसाब से केजीएमयू से अमौसी एयरपोर्ट की दूरी 31.4 किमी है। लेकिन इस बार एक नए रूट मैप से ट्रैफिक पुलिस की टीम ने केजीएमयू से अमौसी एयरपोर्ट की दूरी कम कर 20 किमी कर दी। ग्रीन कॉरीडोर बनाने के लिए केजीएमयू से शाहमीना, हजरतगंज, बंदरियाबाग, करियप्पा, जेल रोड, बंगला बाजार, नहरिया और पुरानी चुंगी होते हुए एयरपोर्ट ले जाने का रूट मैप तैयार किया गया। इसके लिए हर चेक प्वाइंट और चौराहों पर दो-दो पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई। साथ ही इस काम में सभी सीओ और एसपी लेवल के अधिकारी लगे। एंबुलेंस के आगे एक इंटरसेप्टर लगी है, जो ट्रैफिक को क्लीयर करते हुए आगे बढ़ती है।

विशेष बॉक्स में रखकर ले जाया गया लिवर

लिवर निकालने के बाद उसे एक लाल रंग के विशेष बॉक्स में रखा गया। इस बॉक्स में ऑर्गन प्रिजर्वेटिव सॉल्यूशन और बर्फ के मिश्रण में लिवर को रखा गया। ऑर्गन डोनेट के बाद लीवर की 6 घंटे और किडनी की 24 घंटे की लाइफ होती है।

ब्रेन डेड के बाद परिजनों ने कराया अंगदान

ब्रेन डेड बाद परिजन काफी टूट गए। ब्रेन डेड मरीज के बारे में महेश के परिजनों को केजीएमयू के कांउसलरों ने समझाने की कोशिश की। शताब्दी अस्पताल के ऑर्गन ट्रांसप्लांट विभाग के कांउसलर पीयूष श्रीवास्तव, क्षितिज वर्मा और समाजसेवी अश्वनी सिंह ने परिजनों को अंगदान करने के बारे में जानकारी दी। करीब 4:34 बजे ऑपरेशन पूरा हुआ और डॉ. अभिजीत चंद्रा व डॉ. विवेक और डाक्टर परवेज लीवर को एक लाल बॉक्स में लेकर दिल्ली रवाना हो गए। केजीएमयू के ऑर्गन ट्रांसप्लांट विभाग द्वारा अभी तक ब्रेन डेड मरीजों से 16 लिवर और 26 किडनियों को निकालकर दूसरे संस्थानों में ट्रांसप्लांट के लिए भेजा गया है। जबकी 32 कारनिया को केजीएमयू के नेत्र विभाग की मदद से लोगों को रोशनी दी गयी है।

आम आदमी भी ले सकता है ग्रीन कॉरीडोर की मदद

एसपी ट्रैफिक हबीबुल हसन ने बताया कि मरीज का जीवन बचाने के लिए न केवल संस्थान, बल्कि आम आदमी भी ग्रीन कॉरीडोर की मदद ले सकता है। इसके लिए शर्त है कि 2 घंटे पहले एसपी ट्रैफिक को सूचना देनी होगी, जिससे तैयारी की जा सके। इसके लिए 9454401085 नंबर पर कॉन्टैक्ट किया जा सकता है।

क्या होता है ग्रीन कॉरीडोर

ग्रीन कॉरीडोर मानव अंग को एक निश्चित समय के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए बनाया जाता है। यह उस वक्त बनाया जाता है कि जब आपात स्थिति में किसी मरीज का इलाज चल रहा हो। वर्तमान में यह व्यवस्था बेंगलुरु, दिल्ली, कोची, चेन्नई और मुंबई में उपलब्ध है। लेकिन लखनऊ की पुलिस ने किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज की अपील पर यह ग्रीन कॉरीडोर बनाया। इसमें पुलिस उस पूरे रूट को खाली करवाती है, जिसमें से एम्बुलेंस को गुजरना होता है। एम्बुलेंस के आगे पुलिस की गाड़ी चलती है, ताकि उसकी स्पीड में कोई ब्रेक न लगे, इसलिए इस प्रक्रिया को "ग्रीन कॉरीडोर" नाम दिया गया है।

Share it
Share it
Share it
Top