शिशु मृत्यु दर घटाने में यूपी अभी पीछे

शिशु मृत्यु दर घटाने में यूपी अभी पीछेदेश में ज्यादा शिशु मृत्यु दर के मामले में यूपी तीसरे पायदान पर                     फोटोः विनय गुप्ता

रिया कोलासो

नई दिल्ली। शिशु मृत्यु दर को घटाने में उत्तर प्रदेश फिसड्डी साबित हो रहा है। देश में ज्यादा शिशु मृत्यु दर वाले राज्यों की सूची में यूपी तीसरे स्थान पर है। तय लक्ष्य को छूने में अभी यूपी अभी पीछे है। वहीं, देशभर में इस आंकड़े को कम करने में दो फीसदी की सफलता हाथ आई है।

दरअसल, वर्ष 2015 में प्रति 1,000 बच्चों पर 37 बच्चों की मृत्यु हुई है। पिछले हफ्ते जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, ये आंकड़े उस वर्ष के लिए सरकार द्वारा 39 शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) के अनुमान से दो अंक कम है। इन आंकड़ों में पिछले 25 वर्षों में 53 फीसदी की गिरावट हुई है।

आईएमआर कम करने का लक्ष्य 67 फीसदी था। संयुक्त राष्ट्र के परामर्श से वर्ष 2015 में सहस्राब्दि विकास लक्ष्य (एमडीजी) के तहत भारत ने इस संबंध में 27 का आंकड़ा निर्धारित किया था। वर्तमान में यह संख्या 10 कम है। भारत ने अब भी 30 की आईएमआर लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया है, जिसे सरकार ने वर्ष 2012 के लिए निर्धारित किया था।

नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) बुलेटिन से नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, देश में आईएमआर में व्यापक रूप से भिन्नता देखी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, छोटे और अधिक साक्षर राज्यों का आईएमआर अमीर देशों के आईएमआर के करीब या उनसे बेहतर है। वहीं, बड़े और गरीब राज्यों में गरीब देशों की तुलना में अधिक बच्चों की मृत्यु की सूचना दी गई है।

25 वर्षों के दौरान, कुल आईएमआर में सुधार का संबंध संस्थागत प्रसव और गर्भवती महिलाओं के लिए आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां उपलब्ध कराने के साथ तो है ही। इसके अलावा वर्ष 1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद से बढ़ती आय और रहने की परिस्थितियों सहित सरकार के विविध हस्तक्षेप भी आईएमआर में सुधार से जुड़े हैं। स्वास्थ्य को बेहतर करने के प्रयास का असर होगा चुनाव पर?

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, 2005 में शुरू किया गया था। मिशन के तहत वर्ष 2012 तक प्रति 1,000 जन्मों पर 30 मृत्यु का आईएमआर लक्ष्य रखा गया था। हालांकि, वर्ष 2012 का लक्ष्य हम 2017 में भी प्राप्त नहीं कर पाए हैं। समग्र विकास में स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण कारक होने के बावजूद भारत में विधानसभा चुनाव में शायद ही स्वास्थ्य को चुनावी मुद्दे के रुप में लिया गया है। स्वास्थ्य राज्य का विषय है, लेकिन राजनीतिक दल शायद ही कभी स्वास्थ्य के मुद्दों को घोषणापत्र में शामिल करते हैं।

हालांकि, शिशु मृत्यु दर और अन्य प्रजनन, मातृ, नवजात शिशु और बच्चे के स्वास्थ्य संकेतक जैसे लक्ष्य जो चुनावी चक्र में फिट हो सकें, उन पर ध्यान केंद्रित करने से परिणाम बेहतर हो सकते हैं। आगामी चुनावों के साथ पांच राज्यों के लिए आईएमआर उपलब्धियों पर करीब से एक नजर डाली जाए तो इसके मिले-जुले परिणाम दिखते हैं। वर्ष 2015 में उत्तराखंड का आईएमआर वर्ष 2012 के बराबर यानी 34 था। वर्ष 2014 और वर्ष 2015 में, राज्य ने पिछले साल की तुलना में शिशु मृत्यु दर में वृद्धि की सूचना दी है।

वर्ष 2015 की स्वास्थ्य विफलताओं से प्रभावित होंगे 2030 के लक्ष्य

पिछले 25 वर्षों में भारत ने 67 फीसदी के स्थापित एमडीजी लक्ष्य की बजाय 53 फीसदी की गिरावट दर्ज की है। वर्ष 2015 की एमडीजी उपलब्धियां वर्ष 2030 की सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के लिए आधार तैयार करता है। हालांकि, शिशु मृत्यु दर की निगरानी एसडीजी के दायरे में नहीं आता। एसडीजीके तहत नवजात मृत्यु दर की निगरानी की जाती है। यानी जीवन के पहले 28 दिनों के दौरान जो मौतें हुई हैं। याद रहे यह भी शिशु मृत्यु दर का एक प्रमुख घटक है।

नवजात मृत्यु दर काफी हद तक बुरे मातृ स्वास्थ्य, अपर्याप्त प्रसव पूर्व देखभाल, गर्भावस्था की जटिलताओं और प्रसव संबंधी जटिलताओं के अनुचित प्रबंधन से बढ़ता है। वर्ष 2013 में, भारत में कुल मृत्यु में से नवजात मृत्यु दर की 68 फीसदी की हिस्सेदारी रही है और इससे बच्चे की मौत का बढ़ता अनुपात लगातार प्रभावित होता रहेगा। प्रधानमंत्री के मातृत्व लाभ योजना (सार्व भौमीकरण और इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना का विस्तार प्रतीत होता है) संभवतः एक कदम हो सकता है, जो नकद हस्तांतरण के माध्यम से मातृ स्वास्थ्य और प्रसव को बेहतर करने करने में सहायक हो।

यदि भारत को लिंग, धन और जाति के अनुसार एसडीजी लक्ष्य को प्राप्त करना है तो इसे शिशु और मातृ स्वास्थ्य नीतियों की दिशा में ज्यादा ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। नगहीं तो एक बार फिर वर्ष 2030 में भारत अपने स्वास्थ्य लक्ष्यों से पिछड़ता हुआ देखेगा।

लड़कों की तुलना...

वर्ष 2015 में, आठ राज्यों का आईएमआर भारतीय राष्ट्रीय औसत से कम है। इनमें सात गरीब राज्य शामिल हैं, जिन्हें विशेष ध्यान देने के लिए अलग किया गया है, जिन्हें इम्पाउअर्ड एक्शन ग्रूप (इएजी) कहा जाता है। बता दें कि इसमें इएजी का एक और राज्य झारखंड शामिल नहीं है, जबकि मेघालय का नाम इसमें शामिल है। इन राज्यों (इएजी राज्यों में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, राजस्थान और असम शामिल हैं) में अधिक से अधिक औसत दर काफी हद तक लड़के और लड़कियों शिशुओं के लिए समान था।

यूपी में एक हजार जन्मों में 46 शिशुओं की होती है मौत

उत्तर प्रदेश के लिए प्रति 1,000 जन्मों पर 46 शिशु मृत्यु के आंकड़े रहे हैं। वहीं, शिशु मृत्यु दर में 60 फीसदी से अधिक की गिरावट के साथ गोवा, मणिपुर और पंजाब ने सफलतापूर्वक वर्ष 2015 का भारतीय एमडीजी लक्ष्य हासिल किया है। वर्ष 2000 के बाद से उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के मृत्यु दर में कमी आई है, लेकिन दोनों ने भारत के लक्ष्य प्राप्त नहीं किए हैं।

लड़कों की तुलना में अधिक होती है लड़कियों की मृत्यु

भारत में शिशु लड़कों की तुलना में शिशु लड़कियों की अधिक मृत्यु जारी है और नए आंकड़ों के अनुसार आईएमआर के अंतराल में कोई कमी नहीं हुई है। शिशु लड़कों के लिए प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 35 मृत्यु का आईएमआर है, जबकि शिशु लड़कियों के लिए प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 39 का आईएमआर है।

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