देश के पहले उपन्यासकार थे श्रद्धाराम शर्मा

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लखनऊ। देश का शायद ही कोई मंदिर या घर होगा जहां ओम जय जगदीश आरती के स्वर न गूंजते हों। इसके शब्द उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत के हर घर में गूंजती इस आरती का प्रयोग सबसे पहले निर्माता-निर्देशक और प्रसिद्ध अभिनेता मनोज कुमार ने अपनी सुपरहिट फ़िल्म ‘पूरब और पश्चिम’ में किया था।

इसलिए कई लोग इस आरती के साथ मनोज कुमार का नाम जोड़ देते हैं। बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि इस आरती की रचना देश के पहले उपन्यासकार पंडित श्रद्धाराम शर्मा (फिल्लौरी) ने किया था। आज ही के दिन 24 जून 1881 को पंडित श्रद्धाराम शर्मा की मृत्यु पाकिस्तान के लाहौर में हुई थी।

पंडित जी सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और संगीतज्ञ होने के साथ-साथ हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार भी थे। पंडित श्रद्धाराम ने पंजाबी (गुरुमुखी) में ‘सिक्खां दे राज दी विथिया’ और ‘पंजाबी बातचीत’ जैसी किताबें लिखकर मानो क्रांति ही कर दी। अपनी पहली ही किताब ‘सिखों दे राज दी विथिया’ से वे पंजाबी साहित्य के पितृपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। इस पुस्तक मे सिख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सारगर्भित रूप से बताया गया था।

क़रीब डेढ़ सौ वर्ष में मंत्र और शास्त्र की तरह लोकप्रिय हो गई ‘ओम जय जगदीश हरे’ आरती जैसे भावपूर्ण गीत की रचना करने वाले पंडि़त श्रद्धाराम शर्मा का जन्म ब्राह्मण कुल में 30 सितम्बर, 1837 में पंजाब के जालंधर ज़िले में लुधियाना के पास एक गाँव ‘फ़िल्लौरी’ (फुल्लौर) में हुआ था। उनके पिता जयदयालु स्वयं एक अच्छे ज्योतिषी और धार्मिक प्रवृत्ति के थे। ऐसे में बालक श्रद्धाराम को बचपन से ही धार्मिक संस्कार विरासत में मिले थे। पिता ने अपने बेटे का भविष्य पढ़ लिया था और भविष्यवाणी की थी, “ये बालक अपनी लघु जीवनी में चमत्कारी प्रभाव वाले कार्य करेगा।”

बचपन से ही श्रद्धाराम शर्मा जी की ज्योतिष और साहित्य के विषय में गहरी रुचि थी। उन्होंने वैसे तो किसी प्रकार की शिक्षा हासिल नहीं की थी, परंतु उन्होंने सन 1844 में मात्र सात वर्ष की उम्र में ही गुरुमुखी लिपि सीख ली थी। दस साल की उम्र में संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी, पर्शियन तथा ज्योतिष आदि की पढ़ाई शुरू की और कुछ ही वर्षों में वे इन सभी विषयों के निष्णात हो गए। उनका विवाह एक सिक्ख महिला महताब कौर के साथ हुआ था।

श्रेष्ठ साहित्यकार

पंडित श्रद्धाराम शर्मा सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संगीतज्ञ तथा हिन्दी के ही नहीं बल्कि पंजाबी के भी श्रेष्ठ साहित्यकारों में से एक थे। इनकी गिनती उन्नीसवीं शताब्दी के श्रेष्ठ साहित्यकारों में होती थी। अपनी विलक्षण प्रतिभा और ओजस्वी वक्तृता के बल पर उन्होंने पंजाब में नवीन सामाजिक चेतना एवं धार्मिक उत्साह जगाया जिससे आगे चलकर आर्य समाज के लिए पहले से निर्मित उर्वर भूमि मिली। उनका लिखा उपन्यास ‘भाग्यवती’ हिन्दी के आरंभिक उपन्यासों में गिना जाता है। 

साहित्य में योगदान

पंडित श्रद्धाराम शर्मा ने सन 1866 में पंजाबी (गुरुमुखी) में ‘सिखों दे राज दी विथिया’ और ‘पंजाबी बातचीत’ जैसी किताबें लिखकर मानो क्रांति ही कर दी। अपनी पहली ही पुस्तक ‘सिखों दे राज दी विथिया’ से वे पंजाबी साहित्य के पितृपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हो गए और उनको “आधुनिक पंजाबी भाषा के जनक” की उपाधि मिली। बाद में इस रचना का रोमन में अनुवाद भी हुआ। इस पुस्तक में सिक्ख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सार गर्भित रूप से बताया गया था। पुस्तक में तीन अध्याय हैं। इसके तीसरे और अंतिम अध्याय में पंजाब की संस्कृति, लोक परंपराओं, लोक संगीत, व्यवहार आदि के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई थी। इसी कारण से शायद इस पुस्तक को उच्च कक्षा की पढ़ाई के लिए चुना गया। 

‘ओम जय जगदीश हरे’ की रचना

पंडित श्रद्धाराम शर्मा का गुरुमुखी और हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1870 में 32 वर्ष की उम्र में पंडित श्रद्धाराम शर्मा ने ‘ओम जय जगदीश हरे’ आरती की रचना की। उनकी विद्वता और भारतीय धार्मिक विषयों पर उनकी वैज्ञानिक दृष्टि के लोग कायल हो गए थे। जगह-जगह पर उनको धार्मिक विषयों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता था और तब हजारों की संख्या में लोग उनको सुनने आते थे। 

स्त्री शिक्षा पर बल

श्रद्धाराम जी ने लड़कियों को तब पढ़ाने की वकालत की, जब लड़कियों को घर से बाहर तक नहीं निकलने दिया जाता था, परंपराओं, कुप्रथाओं और रुढ़ियों पर चोट करते रहने के बावजूद वे लोगों के बीच लोकप्रिय बने रहे। जबकि वह एक ऐसा दौर था, जब कोई व्यक्ति अंधविश्वासों और धार्मिक रुढ़ियों के ख़िलाफ़ कुछ बोलता था तो पूरा समाज उसके ख़िलाफ़ हो जाता था। निश्चय ही उनके अंदर अपनी बात को कहने का साहस और उसे लोगों तक पहुंचाने की जबर्दस्त क्षमता थी।

गाँव से निष्कासन

पंडित श्रद्धाराम शर्मा के विचार और भाषण पुलिस में दाखिल होने वाले असंख्य लड़कों ने सुने थे और उसी के लिए 1865 में ब्रिटिश सरकार ने उनको उनके गाँव फिल्लौरी से निष्कासित कर दिया था और आस-पास के गाँवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई थी लेकिन उनके द्वारा लिखी गई किताबों का पठन विद्यालयों में हो रहा था और वह जारी रहा। पंडित श्रद्धाराम शर्मा ने अपने व्याख्यानों से लोगों में अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ क्रांति की मशाल ही नहीं जलाई बल्कि साक्षरता के लिए भी ज़बर्दस्त काम किया। पंडित श्रद्धाराम शर्मा स्वयं ज्योतिष के अच्छे ज्ञाता थे और अमृतसर से लेकर लाहौर तक उनके चाहने वाले थे। इसलिए इस निष्कासन का उन पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई। लोग उनकी बातें सुनने को और उनसे मिलने को उत्सुक रहने लगे। इसी दौरान उन्होंने हिन्दी में ज्योतिष पर कई किताबें लिखीं और लोगों के सम्पर्क में रहे।

कुप्रथाओं पर प्रहार

आज जिस पंजाब में सबसे ज़्यादा कन्याओं की भ्रूण हत्याएं होती हैं, इसका एहसास पंडित श्रद्धाराम शर्मा ने बहुत पहले कर लिया था और इस विषय पर उन्होंने ‘भाग्यवत’ उपन्यास लिखा, जो समय से बहुत पहले ये सोच लेकर सामने आया कि स्त्री शिक्षा, स्त्री को समानता का दर्जा मिलना स्वस्थ समाज के लिए लाभकारी है। इस उपन्यास में उन्होंने काशी के एक पंडित उमादत्त की बेटी भगवती के किरदार के माध्यम से ‘बाल विवाह’ जैसी कुप्रथा पर ज़बर्दस्त चोट की थी। इस उपन्यास में उन्होंने भारतीय स्त्री की दशा और उसके अधिकारों को लेकर क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किए थे।

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