देश में प्रजा तो है, लेकिन तंत्र और उसके रखवाले नहीं

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न्यायालय ने दिल्ली के दो विधायकों को अयोग्य घोषित किया है क्योंकि वे रेप के दोषी पाए गए। मध्य प्रदेश का एक विधायक अयोग्य पाया गया क्योंकि उसने अपने गुनाह छुपाए थे। उत्तर प्रदेश का एक विधायक फोन पर मां-बहन की गालियां दे रहा था किसी अधिकारी को और मुख्यमंत्री ने उसे तलब किया है, बिहार के एक विधायक स्टेज पर ठुमका लगा रहे थे। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और आसाम के विधायक पर बड़ी संख्या में अपराधिक मामले अदालतों में लम्बित हैं। ये प्रजा के लिए शासन का तंत्र चलाने वाले लोग हैं। 

कहते हैं शाहजहां के जमाने में एक घन्टा टंगा था, कोई भी मुसीबत का मारा जाकर उस घंटे को बजा सकता था, सरकारी अधिकारी जान जाते थे कोई फ़रियादी आया है। उसकी फ़रियाद सुनी जाती थी और माना जाता है उसे तुरन्त इंसाफ़ मिलता था। आज के ज़माने में अदालतों में फरियाद करने से फरियादी मर जाता है और कई बार निर्णय नहीं हो पाता। झगड़ा इस बात पर होता है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में जजों की चलेगी या सरकार की। परिणामतः तमाम पद भरे नहीं जाते और न्यायाधीशों की कुर्सियां खाली पड़ी रहती हैं।

तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने 1977 की आजादी की पूर्व संध्या पर कहा था हमें अंग्रेजों का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने आईएएस अधिकारियों का प्रशासन तंत्र और रेलवे का परिवहन तंत्र दिया था। उस समय के नेता बहुत नाराज़ हुए थे लेकिन सच्चाई यह है कि अंग्रेजों द्वारा बनाए गए तंत्र को स्वाधीन भारत के नेताओं ने सुधारा नहीं, बिगाड़ा ही है। आज के आईएएस अफसरों के पास मध्य प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश में जो अकूत सम्पदा है वह भ्रष्टाचार का नमूना मात्र है। विधायिका और न्यायपालिका की ही तरह कार्यपालिका भी लचर हो गई है। प्रजा को तंत्र कैसे मिलेगा।

ऐसा नहीं कि देश और दुनिया में प्रजातंत्र फेल हो गया है। जो अन्य व्यवस्थाएं प्रचलित हैं जैसे मुस्लिम देशों का राजतंत्र और उससे जुड़ी कठोर शासन व्यवस्था या फिर साम्यवाद की सामूहिक तानाशाही। इनमें भी प्रजा को न्याय नहीं मिलता इसलिए कमी प्रजातंत्र की नहीं बल्कि उसे लागू करने वालों की है।

दुनिया के देशों में प्रजातंत्र अनेक रूपों में प्रचलित है। अमेरिका और फ्रांस की राष्ट्रपति प्रणाली और इंग्लैंड की पार्लियामेंन्ट प्रणाली। इनके विविध रूप दुनिया में अाजमाए गए हैं लेकिन सफल नहीं हुए। हमारे देश की कठिनाई यह रही है कि हम विदेशी व्यवस्थाओं के आगे सोच ही नहीं पाए। अतीत भारत में प्रजातंत्र के उदाहरण मौजूद हैं लेकिन हमने अाजमाया नहीं और शायद अब देर हो चुकी है।

पिछले 70 साल में हमारे देश ने प्रजातंत्र के बहुत से उतार चढ़ाव देखे हैं। आपातकाल भी देखा है जब प्रजातंत्र की हत्या हुई थी और आयाराम गयाराम का जमाना भी देखा है जब प्रजातंत्र का मखौल उड़ा था। दूसरे देशों ने भी अपने ढंग से प्रजातंत्र में परिपक्वता हासिल की है। आशा है हमारा देश भी करेगा ।

हमारे सामने एक तरफ है मध्यपूर्व का हृदयहीन शासन जिसमें मानवीय पक्ष के लिए कोई जगह नहीं और दूसरी और है पश्चिमी देशों की लिबरल व्यवस्था जो सुधारवादी है और जिसमें दंड का स्थान गौण है। हमारा रास्ता अपने हजारों साल के अनुभव पर आधारित इन्हीं के बीच से निकलना चाहिए।          

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