बदलते सामाजिक मूल्‍य और इंटरनेट के गलत इस्‍तेमाल से अपने ही बन रहे क़ातिल

Ranvijay SinghRanvijay Singh   29 Dec 2018 6:14 AM GMT

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बदलते सामाजिक मूल्‍य और इंटरनेट के गलत इस्‍तेमाल से अपने ही बन रहे क़ातिल

लखनऊ। आगरा का संजली हत्याकांड हो या उन्नाव में एक लड़की की चाकू से गोदकर की गई हत्या, इन घटनाओं ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। साथ ही, एक बात की ओर ध्यान भी खींचा कि बढ़ती ऐसी घटनाओं के पीछे नैतिक मूल्यों की गिरावट है।

आगरा और उन्नाव में हुए हत्याकांड समेत तमाम घटनाओं के पीछे वही लोग थे जो करीबी रिश्तेदार थे या पहले से जानते थे। रोंगटे खड़े कर देने वाली इस तरह की वीभत्स घटनाओं की आई बाढ़ के पीछे कई कारण निकल कर आ रहे हैं।

देश भर में होने वाले अपराधों को दर्ज करने वाली संस्था राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, 2015 में 95 प्रतिशत रेप पीड़िता के करीबी या जानने वाले किसी व्‍यक्‍ति द्वारा किये गए। लड़कियों के प्रति बढ़ती इन घटनाओं की कड़ियों को अगर जोड़ें तो साफ तौर पर दिखता है कि हाल के कई वर्षों में इंसान के सामाजिक और नैतिक मूल्‍यों में गिरावट आई है।

संजलि की हत्‍या के बाद आगरा के लालऊ गांव में उसके घर के पास लगी ग्रामीणों की भीड़। फोटो- रणव‍िजय सिंह (गांव कनेक्‍शन)

यूपी में महिलाओं की सुरक्षा के लिए काम करने वाली सरकारी संस्था वूमेन पावर लाइन (1090) की एडीजी अंजू गुप्‍ता कहती हैं, ''रेप के मामलों में सबसे ज्‍यादा करीबी शामिल होते हैं, क्‍योंकि उनकी पहुंच पीड़िता तक होती है। ऐसे में जानने वालों से खतरा ज्‍यादा है, राह चलते लोगों से कम। राह चलते लोग इसलिए भी ऐसा नहीं करते क्‍योंकि उन्‍हें कानून का डर है, समाज का डर है। लेकिन करीबी की पहुंच आसान होती है तो डर भी कम होता है।''

एनसीआरबी की वर्ष 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 14 मिनट में 1 रेप होता है, वहीं, हर तीन मिनट में महिला के खिलाफ कोई न कोई अपराध होता है। वर्ष 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बलात्कार के मामले 2015 की तुलना में 12.4 फीसदी बढ़े हैं।

''अपने करीबी को शिकार इसलिए भी बनाया जाता है कि ऐसा करने वालों को लगता है कि उन्‍हें कौन पकड़ेगा, वो इस माहौल में सबसे सुरक्ष‍ित हैं। साथ ही हमारा समाज जैसा है उसमें ये भी मान लिया जाता है कि लड़की लोकलाज के डर से कहीं शिकायत भी नहीं करेगी,'' मानव व्यवहार और संबद्ध विज्ञान संस्थान (आईएचबीऐएस) में क्‍लिनिकल साइक्‍लोजिस्‍ट एवं विभागाध्यक्ष उदय सिंहा कहते हैं।

समाज सेविका ताहिरा हसन

इसी साल नवंबर में यूपी के जिले बाराबंकी में एक छह साल की बच्ची से रेप की घटना में आरोपी को पीड़िता 'दादा' कह के पुकारती थी। समाज में आ रहे इस नैतिक पतन को समाज सेविका ताहिरा हसन समझाती हैं, ''इसके पीछे की असल वजह पितृसत्तात्मक सोच है। इसमें औरतों को कमोडिटी के तौर पर देखा जाता है। उसके साथ होने वाले अपराध को अपराध नहीं समझा जाता,"

''पहले कहा जाता था कि बेटियां चारदीवारी में सबसे ज्‍यादा सुरक्ष‍ित हैं, लेकिन वो वहीं सबसे ज्‍यादा प्रताड़ित हैं।'' - ताहिरा हसन समाज सेविका

एनसीआरबी की वर्ष 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक बलात्‍कार के मामले सबसे ज्‍यादा मध्‍य प्रदेश में दर्ज किए गए। मध्‍य प्रदेश में 4,882 मामले, दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश में 4,816 मामले और तीसरे नंबर पर महाराष्ट्र में 4,189 मामले दर्ज किए गए।

सामाजिक और नैतिक मूल्यों को हम आधुनिक भारत के प्रसिद्ध चिंतक एवं समाज विज्ञानी राधाकमल मुखर्जी के कथन से समझ सकते हैं, ''मनुष्य को मूल्य अपने जीवन से, अपने पर्यावरण से, अपने आप से, समाज और संस्कृति से ही नहीं अपितु मानव-अस्तित्व व अनुभव से प्राप्त होते हैं।'' यानि एक इंसान के चारों तरफ हो रहे बदलाव का सीधा असर उसके मूल्‍यों पर पड़ता है।

वकील रेनू मिश्रा।

हालिया घटनाओं को समझाते हुए महिलाओं के कानूनी अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली संस्था आली की प्रमुख रेनू मिश्रा कहती हैं, ''आज के वक्‍त में परिवार में प्रेम और एक दूसरे के लिए सम्मान की भावना कम हुई है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि पहले मोहल्ले की लड़की भी बहन होती थी। उसके साथ छेड़छाड़ की बात कोई सोचता नहीं था, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा।''

''अभिभावक भी व्‍यस्‍त हैं। बच्‍चों पर ध्‍यान नहीं दे पाते। ऐसे में बच्‍चों का जैसा मानसिक विकास होना चाहिए वो नहीं हो पा रहा।'' - रेनू मिश्रा

सस्ता इंटरनेट और पॉन की दुनिया बड़ी वजह

सितंबर-2018 में नोएडा की एक 15 साल की लड़की ने अपने पिता के खिलाफ रेप का मामला दर्ज कराया था। लड़की के मुताबिक उसका पिता अश्लील फिल्में देखने का आदी था और ऐसी फिल्में मोबाइल में देखकर उसके साथ रेप करता है।

''ये सब सस्ते मोबाइल और इंटरनेट की देन है। फिलहाल सरकार ने कुछ पॉर्न साइट्स को बैन किया है। लेकिन कुछ दिन पहले तक तो यह बहुत आसान था, अभी भी है। अब कोई पॉर्न देखेगा तो थोड़ा आवेग उसमें आएगा। ऐसे में वो आस-पास के लोगों को ही टारगेट बनाते हैं, क्‍योंकि ये उनके लिए सबसे आसान होता है,'' क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट उदय सिन्‍हा समझाते हैं।

समाजसेविका ताहिरा हसन भी मोबाइल और इंटरनेट के गलत इस्‍तेमाल को लेकर चिंता जताती हैं। ''ऐसे मामलों के बढ़ने के पीछे सस्ते इंटरनेट का बहुत बड़ा रोल है। इसमें ब्‍लू फिल्‍म का भी रोल है। बच्‍चे देख रहे हैं, नौजवान देख रह हैं। इसमें कोई रोक नहीं है। अब आप देखें निर्भया में क्‍या हुआ था।'' बता दें, दिल्‍ली के निर्भया मामले के आरोपियों ने भी पुलिस पूछताछ में बताया था कि वो मोबाइल पर पॉर्न देखा करते थे।

कुछ टीवी सीरियल और फिल्में भी अपराध की पाठशाला

टीवी सीरियर और वेब सीरिज का भी पड़ रहा असर। फोटो- NDTV Gadgets

आगरा के संजली हत्‍याकांड में पुलिस के सामने आरोपियों ने कुबूला कि घटना को अंजाम देने का तरीका टीवी सीरियल से सीखा। इससे पहले भी कई मामलों में पुलिस इस बात की ओर इशारा करती रही है। इस ट्रेंड को लेकर क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट उदय सिन्‍हा कहते हैं, ''साल 2015 में अजय देवगन की एक हिंदी फिल्‍म आई थी दृश्‍यम। वो फिल्‍म उदाहरण है कि फिल्‍म देखकर लोग क्‍या सीख सकते हैं और क्‍या कर सकते हैं? अब वेब सीरिज का जमाना है। वहां भी वॉयलेंट सेक्‍स और रेप के सीन दिखाए जा रहे हैं। उसकी भी भागीदारी है। हां, कितनी भागीदारी है यह कह नहीं सकते।''

अपराधियों में कम होता खौफ

वकील रेनू मिश्रा कहती हैं, "कानून सही तरीके से लागू नहीं हो रहा इस लिए डर खत्‍म हो रहा है। सामाजिक मूल्‍यों और कानून का एक दूसरे से जुड़ाव है। जिस भी जगह पर कानून सख्‍त होगा, वहां ऐसे मामले कम होंगे। कानून को लागू करने वाले संस्‍थानों ने इतनी छूट दे रखी है कि अपराधी सोचता है कि वो बच निकलेगा। अगर कानून का सही तरीके से लागू किया जाए तो ऐसे मामलों में कमी आएगी।"

वहीं, समाजसेविका ताहिरा हसन कहती हैं, ''हर मां को अपनी बेटी को गुड टच और बैड टच के बारे में बताना चाहिए। इसे इज्‍जत से न जोड़ें कि उनकी इज्‍जत खराब होगी, जो गलत करेगा उसकी इज्‍जत खराब होगी। लड़कियों को डर रहता है कि वो घर पर बताएंगी तो उनकी पढ़ाई रोक दी जाएगी, या उन्‍हें घर से नहीं निकलने दिया जाएगा। ऐसा भी नहीं होना चाहिए।''

लोगों को जागरूक करना जरूरी

हालांकि, साइकोलॉजिस्ट उदय सिन्‍हा को लगता है कि अभी ग्राउंड पर बिल्‍कुल भी काम नहीं हो रहा है। वो कहते हैं, ''निर्भया मामले के वक्‍त जस्‍टिस वर्मा कमिटी बनी थी। उस कमिटी द्वारा एक रिपोर्ट दी गई जो अब तक लागू नहीं की गई है। उसमें कहा गया था कि समाज को ज्‍यादा संवेदनशील होना होगा। आज ऐसा नहीं है। इसके लिए लोगों को जागरूक करना जरूरी है और यह सिर्फ शहरों तक न हो। गांव में जाकर काम करने की जरूरत है। गांव को फोकस करना जरूरी है, क्‍योंकि हमारा देश गांव से बना है।''

''मुझे नहीं लगता कि जब तक सब लोग मिलकर काम नहीं करेंगे तब तक कुछ होना है। अभी ऐसा तो नहीं हो रहा। छोटे-छोटे ग्रुप में काम हो रहा है, लेकिन वो व्‍यक्‍तिगत फायदे का ज्‍यादा लगता है।'' - उदय सिन्‍हा निराश मन से कहते हैं

एडीजी वूमेन पावर लाइन (1090) अंजू गुप्‍ता।

एडीजी वूमेन पावर लाइन (1090) अंजू गुप्‍ता इन मामलों के समाधान पर कहती हैं, ''इसका समाधान दो तरीके से हो सकता है। पहला जागरूकता और दूसरा है लड़कियों को सशक्‍त करना। लड़कियों को बताना होगा कि वो पुलिस में शिकायत कर सकती हैं। 1090 डायल कर सकती हैं। वहीं, लोगों की सोच बदलने की भी जरूरत है। शहर से लेकर गांव देहात के क्षेत्रों तक कैंपेन करने की जरूरत है। हम लोग इसे लेकर काम कर रहे हैं। हमारे पास जो भी मामले आते हैं उसका समाधान किया जाता है।''

   

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