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मोटर वाहन संशोधन विधेयक 2019: बढ़े चालान के अलावा ये बातें भी आपको पता होनी चाहिए

ट्रैफिक नियम 2019: केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक 2019 के बारे में चर्चा करते हुए पिछले दिनों लोकसभा में कहा कि आज लोगों में कानून के प्रति न तो सम्मान है और न ही लोग कानून से डरते हैं। लोगों में कानून के प्रति सम्मान और डर लाना जरुरी है।

Deepanshu MishraDeepanshu Mishra   20 Sep 2019 12:35 PM GMT

मोटर वाहन संशोधन विधेयक 2019: बढ़े चालान के अलावा ये बातें भी आपको पता होनी चाहिए

लखनऊ। फैजाबाद से अपने घर लखनऊ आ रहे रवींद्र मौर्य (35 वर्ष) की मोटर साइकिल में एक ट्रक ने पीछे से टक्कर मार दी। उन्‍हें गंभीर चोटें आई, उनका एक हाथ और एक पैर टूट गया लेकिन जान बच गई। डॉक्टरों ने कहा कि हेलमेट पहनने की वजह से सिर में चोट नहीं थी, वर्ना ऐसे हादसों में जान बड़ी मुश्किल से बचती है। वहीं ठीक एक इसी तरह के हादसे में बाराबंकी के उदयवीर (23वर्ष) की जान चली गई। तेज रफ्तार बाइक से गिरने के बाद उनका सिर डिवाइडर से टकरा गया था। पूरे शरीर में चोट नहीं थी, लेकिन सि‍र जख्मी हो गया। उनके घर वाले रोज पछताते हैं कि उनके बेटे ने काश! हेलमेट पहना होता।

डॉ. संदीप तिवारी, प्रमुख, ट्रॉमा सर्जरी विभाग, किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्याल

सड़क हादसे में घायल होकर सैकड़ों लोग लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्याल (केजीएमयू) के ट्रॉमा सेंटर में आते हैं, इनमें से कई लोगों की मौत भी हो जाती है। ट्रॉमा सेंटर में सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. संदीप तिवारी की बात को अगर सुना जाए तो पता चलता है कि नए नियम खुद के लिए एक सुरक्षा कवच जैसा है।

एक रिपोर्ट के अनुसार देश की सड़कों पर प्रतिदिन 1,317 दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें 413 लोगों की जान जाती है। ज्यादातर लोगों की जान हेलमेट न लगाने, सीट बेल्ट न पहनने और ट्रैफिक नियमों का पालन न करने से होती है। एक सितंबर से देश में यातायात के नए नियम लागू किए गए हैं। सड़क पर वाहन चलाते वक्त नियम तोड़ने पर जुर्माना कई गुना लगाया जा रहा है। मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक 2019 में कठोर सजा का भी प्रावधान है। नये नियमों को लेकर लोगों की मिलीजुली प्रतिक्रिया है। ज्यादातर लोग इसे खुद की सुरक्षा से जोड़कर देख रहे हैं।

ट्रामा सेंटर, लखनऊ के डॉ. संदीप तिवारी गांव कनेक्‍शन को बताते हैं, "ज्यादातर मामलों में लोग सीट बेल्ट या हेलमेट नहीं लगाते। हाईवे पर होने वाले हादसों में अक्सर ये देखा गया है अगर कार चालक सीट बेल्ट लगाता है तो पीछे या बगल वाले नहीं लगाते। बाइक चलाने वाला हेलमेट लगा लेता है लेकिन पीछे वाला नहीं लगाता है। ऐसे में अगर कोई हादसा होता है तो बाइक से गिरने के दौरान जो हेलमेट नहीं लगाते हैं उन्‍हें हेड इंजरी हो जाती है। सड़क हादसों में जितने लोगों की जान जाती है उनमें से पचास फीसदी बाइक सवार ही होते हैं।"

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केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक 2019 के बारे में चर्चा करते हुए पिछले दिनों लोकसभा में कहा था, "देश का दुर्भाग्य है कि हर साल पांच लाख का एक्सीडेंट होता है और इनमें से डेढ़ लाख लोगों की मौत हो जाती है। इस मामले में भारत एक नंबर पर है। इन मौतों को रोकना और सड़क सुरक्षा को बढ़ावा देना हम सब की जिम्मेदारी है। साल 1988 में जिस जुर्माने की कीमत 100 रुपये थी, उसकी अगर आज की कीमत निकाली जाये तो 5,000 से ऊपर की हो जाती है। आज लोगों में कानून के प्रति न तो सम्मान है और न ही लोग कानून से डरते हैं। लोगों में कानून के प्रति सम्मान और डर लाना जरुरी है।"

दीपक रतन, पुलिस महानिरिक्षक (यातायात),उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिरिक्षक (यातायात) दीपक रतन ने गांव कनेक्शन को बताया, "यातायात के जो नियम बने हुए हैं ये हमारी अपनी सुरक्षा के लिए बने हुए हैं। ये सारे नियम हमें जान-माल से बचाने के लिए ही बनाये जाते हैं इसलिए हम सबका यह दायित्व बनता है कि अपने परिवार के प्रति, अपने समाज के प्रति, अपने देश के लिए इस नियम का पालन करें।"

कई राज्यों ने जताई आपत्ति

इस नए मोटर व्हीकल एक्ट के आने के बाद कई राज्यों ने आपत्ति जताई थी। राजस्थान समेत कई राज्यों ने इस नियम को लागू करने से इंकार कर दिया तो वहीं गुजरात-उत्तराखंड ने चालान के एवज में लगाए जाने वाले जुर्माने की राशि में कटौती कर दी। राज्यों की आपत्तियों और सोशल मीडिया में भारी जुर्माने के विरोध के बाद नितिन गड़करी ने कहा, "ये जुर्माना राजस्व वसूलने के लिए नहीं है। न ही जुर्माने की रकम में केंद्र का कोई हिस्सा है। हमारी कोशिश है लोग कानून का सम्मान करें और अपनी यात्रा सुरक्षित बनाएं। इस संबंध में मैंने कई मुख्यमंत्रियों से भी बात की है।"

राज्य सरकार नहीं मान रही कानून ये सिर्फ अफवाह

सड़क सुरक्षा को लेकर कई वर्षो से कम करने वाली संस्था सेव लाइफ फाउंडेशन के संस्थापक पीयूष तिवारी गाँव कनेक्शन को बताते हैं, "मोटर व्हीकल एक्ट के सेक्शन 200 के अंतर्गत राज्य को ये अधिकार है कि वो जुर्माना बढ़ाये या घटाकर एक रुपए कर दें।"

पीयूष तिवारी, संस्थापक, सेवलाइफ फाउंडेशन

बढ़े चालान को लेकर पीयूष तिवारी कहते हैं, "लोगों को गलतफहमी है कि इस कानून में सिर्फ सजा और जुर्माना बढ़ाया गया है। नए कानून लाइसेंसिंग से लेकर रोड इंजीनियरिंग, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, खराब गाड़ियों की वापसी समेत कई प्रावधान हैं, जब इन सब पर काम होगा तभी सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी।"

नये कानूनों का क्या असर दिख रहा है इस बारे में बात करने पर लखनऊ में हजरतगंज चौराहे पर तैनात पुलिस अधिकारी जय हिंद विश्वकर्मा कहते हैं, "पहले इस चौराहे पर दिन में 20-25 लोगों का चालान बिना हेलमेट के लिए होता था, लेकिन अब सिर्फ 2-3 ही होते हैं। जुर्माने का असर ये है कि 95 फीसदी लोग सुधर गए हैं। जुर्माना कम था तो लोग जमा कर निकल जाते थे। लोगों के दिमाग में जुर्माना रहता है।" वहीं लखनऊ के ही एक आईटी चौराहे तैनात पुलिस उपनिरिक्षक संजय सिंह बताते हैं, "पहले सिफारिश भी चल रही थी लेकिन अभी किसी की सिफारिश भी नहीं सुनी जाती है, सीधे जुर्माना होता है। लोग अनुशासन से चल रहे हैं इसका मतलब है कि लोग कानून से डरने लगे हैं।"

भारत में सड़क हादसे

सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018 में कुल 4 लाख 61 हजार सड़क हादसे हुए। इनमें 1 लाख 49 हजार लोगों ने अपनी जान गंवाई। वर्ष 2017 में कुल 4 लाख 65 हजार सड़क हादसे हुए, जिनमें 1 लाख 46 हजार लोगों ने अपनी जान गंवाई। वर्ष 2018 में 2017 के मुकाबले हादसों में 4 हजार की कमी आई लेकिन मौत के मामले में 3 हजार बढ़ गए। सड़क परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक हादसों के मामले में यूपी की स्थिति सबसे खराब है, यहां 53 लोगों की रोजाना मौत होती है।

कैसे रुकेंगे सड़क हादसे?

सड़क हादसे रोकने के लिए ट्रैफिक नियम, जुर्माना और जागरुकता समेत कई तरह पहलू शामिल हैं। पीयूष तिवारी सड़क हादसों के चार प्रमुख कारण और बचाव के तरीके सुझाते हैं।

ड्राइविंग बिहेवियर- वाहन चलाने का तरीका हमें ट्रेनिंग और लाइसेंसिग के जरिए आता है। लेकिन देश में न तो सही तरीके से लाइसेंस दिया जाता है न लोगों को प्रशिक्षण मिलता है। ऐसे में लोग गलतियां करते हैं और हादसे होते हैं।

बाध्यता- विदेशों की बात करें तो वहां सरकारों की सख्ती के चलते ही नियम का उल्लंघन कम होते हैं और लोग दुर्घटनाओं से बचते हैं। लेकिन हमारे देश में इंफोर्समेंट नहीं हो पा रहा। इसकी दो वजह हैं, पहला भ्रष्टाचार और दूसरा है क्षमता। देश में नई तकनीकी लाने की जरुरत है। नए कानून में 136 ए में टेक्नोलॉजी की बात की गई है इलेक्ट्रॉनिक इम्फोर्स्मेंट (सुधार) कैसे लाया जाये, जिससे भ्रष्टाचार और क्षमता दोनों को सुधार जा सके।

इंजीनियरिंग- सड़कों की इंजीनियरिंग तो सबको पता ही है, लोग बोलते हैं सड़कें कम और गड्ढे ज्यादा हैं। यह बात सच भी है लेकिन न इंजीनियर को पकड़ा जाता है और न ही ठेकेदार। गाड़ियों की समस्या यह है कि जो कम्पनियां गाड़ियां बेचती हैं, वो विदेश की तुलना में भारत में सुरक्षा मानक को कम रखा जाता है। इसके लिए भी कानून में प्रावधान लाये गये हैं।

चिकित्सा- सड़क हादसों में 50 फीसदी मौतें इसलिए हो जाती हैं क्योंकि उन्हें सही समय पर उपचार नहीं मिलता। देश में अगर इमरजेंसी केयर में सुधार लिया जाए तो मौतें रुक सकती हैं।

सारे विभाग मिलकर करें काम

सड़क सुरक्षा का दायित्व 15 अलग-अलग विभागों पर है। लाइसेंस कोई और देता है, सड़क कोई और बनाता है, इंजीनियरिंग किसी और की होती है, ट्रामा स्वास्थ्य के अंतर्गत आता है। नए कानून के तहत इन 15 विभागों के बीच सामंजस के लिए एक बोर्ड या अथॉरिटी का गठन होना चाहिए।

फुटपाथ को मिले तवज्जो

पीयूष अपनी चिंता जताते हुए सुझाव देते हैं, "वाहन और व्यक्ति में हमने ज्यादा तवज्जो वाहन को दे रखी है आप देख सकते हैं कि गाड़ी में एक-दो लोग होते हैं वो इतनी जगह को घेरता है जो कि 10-12 लोग के लिए पर्याप्त होती है। पैदल यात्री को कोने में जगह दी जाती है। वहां भी चलने की जगह नहीं होती है। क्योंकि कई जगह ठेले और तो कई जगह गड्ढे होते हैं। ऐसे में वो व्यक्ति सड़क पर चलने लगता है और कई बार हादसे होते है। हम लोगों की मांग है कि पैदल चलने वालों को ज्यादा जगह दी जाए।"


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