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हर चौथे व्यक्ति को घर चलाने के लिए लेना पड़ा कर्ज, पड़ोसी साबित हुए सबसे बड़े मददगार: गांव कनेक्शन सर्वे

गाँव कनेक्शन के राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार हर चौथे व्यक्ति ने यह स्वीकारा कि उन्हें घर चलाने के लिए उधार या कर्ज लेना पड़ा। 23 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें इस मुश्किल दौर में जमीन, गहने, कीमती सामान को गिरवी रखना पड़ा या बेचना पड़ा। सीरीज के इस भाग में पढ़िए उन लोगों की मुश्किलें जिन्हें उधार या कर्ज लेना पड़ा।

Neetu SinghNeetu Singh   11 Aug 2020 9:37 AM GMT

हर चौथे व्यक्ति को घर चलाने के लिए लेना पड़ा कर्ज, पड़ोसी साबित हुए सबसे बड़े मददगार: गांव कनेक्शन सर्वे

कोरोनाकाल में हुए देशव्यापी लॉकडाउन में ग्रामीण भारत का वो पहलू भी नजर आया जो अक्सर अंधेरे में रहता था, जिन तक लोगों का कभी ध्यान नहीं जाता था। लॉकडाउन के बाद सड़कों पर नजर आई मजदूरों और प्रवासियों की भीड़ देखकर लोगों को अंदाजा हुआ कि ग्रामीण भारत का कितना बड़ा तबका शहरों में रहता था, जिनमें सबसे ज्यादा भीड़ अंसगठित मजदूरों की थी, जो आंकड़ों और सरकारी दस्तावेजों से दूर थे।

कोविड-19 के दौरान देश का लगभग 70-80 फीसदी वो तबका देखने को मिला जो रोजी-रोटी के लिए रोज जद्दोजहद करता है। लॉक डाउन में काम बंद होने के बाद परिस्थियां ऐसी बनी जो इन्हें रोजमर्रा खर्चों के लिए पड़ोसियों से उधार लेना पड़ा, कीमती वस्तुएं, गहने, जमीन या तो बेचने पड़े या गिरवी रखने के लिए मजबूर हुए।

कोरोनाकाल में जूझते ग्रामीण भारत की मुश्किलों को समझने के लिए भारत के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन के डेटा और इनसाइट्स विंग 'गांव कनेक्शन इनसाइट्स' द्वारा देश के 23 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 179 जिलों में 30 मई से 16 जुलाई, 2020 के बीच आयोजित किया गया, जिसमें 25,300 उत्तरदाता शामिल हुए। गाँव कनेक्शन के राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार हर चौथे व्यक्ति ने यह स्वीकारा कि उन्हें घर चलाने के लिए उधार या कर्ज लेना पड़ा।

झारखंड की रहने वाली कलावती देवी कलकत्ता में ईंट भट्टे पर काम करती थीं, लॉकडाउन के बाद इनके परिवार के 9 सदस्य किसी तरह अपने गाँव पहुंचे। गाँव में इनके यहाँ इतना इंतजाम नहीं था जिससे ये घरेलू खर्चा चला सकें।

कलावती (45 वर्ष) बताती हैं, "घर में जो बर्तन रखे थे वही बेच दिए, अब क्या करते पेट तो भरना ही था। तीन महीने से कुछ-कुछ सामान बेचकर खर्चा चला रहे हैं। अब धान की रोपाई शुरू हुई है अब थोड़ा मजदूरी मिल रही है।"

कलावती, रांची जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर सिल्ली ब्लॉक के ब्राह्मनी गाँव की रहने वाली हैं।

इनके ही मोहल्ले की रहने वाली तारा देवी (32 वर्ष) बांस की झाडू बनाकर पूरे परिवार का खर्चा चलाती थीं लेकिन जबसे लॉकडाउन हुआ बाजार लगने बंद हो गये तो इनकी झाडू भी नहीं बिकी।

"घर के आँगन में पेड़ लगा था वो बेच दिया। साइकिल बेच दी और बकरी भी। जब झाडू नहीं बिकी तो यही सब बेचकर बच्चों को खिलाया," तारा देवी ने बताया।

आपको क्या सरकारी कोटे से राशन नहीं मिला इस पर वह बोलीं, "बच्चों का नाम राशन कार्ड में चढ़ा नहीं। हम दो लोगों को 10 किलो ही चावल मिलता है, अब इतने से छह लोगों का खर्चा कैसे चलेगा?"

कलावती और तारा देवी देश की पहली महिला नहीं हैं जिन्हें पेट भरने के लिए सामान बेचना पड़ा हो।

सर्वे स्टोरी 2 - लॉकडाउन में पैदल लौटने को मजबूर हुए 23 % प्रवासी मजदूर : गाँव कनेक्शन सर्वे


गाँव कनेक्शन के राष्ट्रीय सर्वे के आंकड़ों अनुसार 23 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें इस मुश्किल दौर में खर्च चलाने के लिए जमीन, गहने, कीमती सामान को गिरवी रखना पड़ा या बेचना पड़ा। पांच फीसदी ने जमीन बेची या गिरवी रखी। सात फीसदी ने गहने या तो बेचे या गिरवी रखे। वहीं आठ फीसदी लोगों ने महंगे सामान या तो बेचे या गिरवी रखे।

लोगों से यह सवाल पूछा गया था कि लॉकडाउन के दौरान क्या आपने या आपके परिवार के किसी व्यक्ति ने किसी से उधार पैसे लिए या ऋण लिया, जमीन बेची या गिरवी रखी, आभूषण बेचे या गिरवी रखे, कीमती सामान जैसे- घड़ी, बाइक, कार और फोन को बेचा या गिरवी रखा। नीचे दिए गये आंकड़ों में इस सवाल का जवाब समझिये कि लोगों ने अपनी क्या प्रतिक्रिया दी?

उधार या लोन लिया- 23 %

जमीन बेची या गिरवी रखी- 05 %

गहने बेचे या गिरवी रखे- 07 %

कीमती सामान बेचे या गिरवी रखे- 08%

भारत में देशव्यापी लॉकडाउन में सबसे ज्यादा मार असंगठित क्षेत्र पर पड़ी है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों के अनुसार असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले 40 करोड़ मजदूरों के सामने मुश्किलें पैदा हो गयी हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) द्वारा जिनेवा में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन की वजह से मेट्रो और बड़े औद्योगिक शहरों में रहकर रोज कमाने-खाने वालों को अपने गांव लौटना पड़ा है। भारत, नाइजीरिया और ब्राजील में लॉकडाउन के कारण अंसगठित क्षेत्र में काम करनेवाले कामगारों पर ज्यादा असर पड़ा है। गांव लौटी प्रवासियों की बड़ी आबादी परेशान हैं क्योंकि वहां उन्हें काम नहीं मिल रहा है। आईएलओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ऐसे हालात से निपटने के लिए तैयार नहीं है। यही वजह है कि पेट भरने के लिए ये लोग कर्ज या उधार लेने को विवश हैं।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र प्रोफेसर अशोक कौल गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "भारत में पिछले 20-30 सालों में सरकार ने उच्च वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग पर जोर दिया। पॉलिसी बनाते समय ये गाँव को भूल गये। जिस वजह से लगभग 70-75 फीसदी लोग गरीब रहे। देश में 40 करोड़ मजदूर वर्ग गाँव से आता है, अभी लगभग 40-50 लाख मजदूर ही गाँव को वापस लौटे होंगे, बाकी के वहीं रह गये। देश में लगभग 80 फीसदी वो लोग हैं जो रोज कुआं खोदते हैं (रोज कमाने खाने वाले)। इनके पास सेविंग्स (बचत) नहीं हैं इसलिए कर्ज लेना इनकी मजबूरी है।"

लॉकडाउन में देश में ग्रामीण भारत की मनोदशा को समझने के लिए गाँव कनेक्शन ने राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, असम, अरुणांचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, केरला, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और चंडीगढ़ में सर्वे किया था। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, लद्धाख, अंडमान एडं निकोबार द्पी समूह में भी सर्वे किया गया। इन सभी राज्यों में घर के मुख्य कमाने वाले का साक्षात्कार लिया गया, साथ ही उन लोगों का अलग से सर्वे किया गया जो लॉकाडउन के बाद शहरों से अपने गांवों को लौटे थे।

झाडू-पोछा का काम करने वाली रजनी जिस घर में काम करती थी वहां से 5,000 रूपये उधार लिए पर वो लौटा नहीं पायी। इधर लॉकडाउन लगातार बढ़ता गया रजनी को काम पर वापस नहीं बुलाया गया। रजनी बताती हैं, "अप्रैल महीने में एक साहूकार से 10 प्रतिशत के मासिक ब्याज पर 20,000 लिए हैं। मई, जून, जुलाई में ब्याज की किश्तें ही मुश्किल से दे पायी हूँ। सोच रही थी एक दो महीने में सब ठीक हो जाएगा पर ये बढ़ता ही जा रहा है।"

रजनी मूल रूप से हरियाणा के पंचकूला जिले की रहने वाली हैं। पंचकूला की ही रहने वाली आशा देवी (37 वर्ष) को अप्रैल और मई महीने में 5,000-5,000 रूपये घरेलू खर्चों के लिए कर्ज लेना पड़ा। हरियाणा में कर्ज लेने की ये आपबीती सिर्फ रजनी और आशा की नहीं है। सर्वे के अनुसार सबसे ज्यादा उधार या साहूकारों से कर्ज लेने वाला राज्य हरियाणा है जिसमें 65 फीसदी लोगों ने यह कहा कि उन्होंने उधारी या साहूकार से लोन लिया है। नीचे दी गयी सारणी में उन नौ राज्यों का आंकड़ा साझा किया है जिसमें सबसे ज्यादा उधारी या कर्ज लिया गया, गहने और कीमती सामान बेचे या गिरवी रखे गये।


अगर राज्यों के अनुसार सर्वे पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा हरियाणा, पंजाब, असम, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश में लोगों को दूसरे राज्यों की तुलना में ज्यादा कर्ज और उधार लिया है। वहीं त्रिपुरा में जमीन 13 फीसदी और कीमती सामान 20 फीसदी बेचना या गिरवी रखना पड़ा। पश्चिम बंगाल में 22 फीसदी गहने और 17 फीसदी कीमती सामान बेचा या गिरवी रखा।

पश्चिम बंगाल के कोलकाता 700 किलोमीटर दूर कूच बिहार जिले में कुम्हारों का सबसे पुराना और शायद सबसे बड़ा इलाका है। प्रदीप पाल एक कारखाने के मालिक हैं वो बताते हैं, "मूर्ति बनाने के सभी ऑर्डर लॉकडाउन में कैंसिल हो गये। पर ऐसे में जो मजदूर हमारे साथ कई सालों से काम कर रहे उन्हें हम हटा नहीं सकते थे इन्हें पैसे देने के लिए हमने छह लाख रुपये का कर्ज लिया और कर्मचारियों का भुगतान किया।"

आखिर लोगों को कर्ज लेने गहने, जमीन और कीमती वस्तुओं को बेचने या गिरवी रखने की जरूरत क्यों पड़ी? अगर हम इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन द्वारा जिनेवा में जारी रिपोर्ट को देखें तो इस साल दुनिया भर में 19.5 करोड़ लोगों की नौकरी छूट सकती है। आईएलओ ने कोरोना वायरस को दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे भयानक संकट बताया है। भारत में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में 90 फीसदी मजदूर काम करते हैं। बेरोजगार होने वाला एक बड़ा तबका है जिसके पास इतनी बचत नहीं है कि वो कुछ महीने बिना कमाए खा सके इसलिए इन्हें अलग-अलग मदों के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है।

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के रिटायर्ड अर्थशास्त्री अरुण कुमार कर्ज लेने की वजह पर कहते हैं, "सरकार की बनाई नीतियां गाँव तक पहुंचती ही नहीं है। कम्पनियों में उत्पाद की मांग न बढ़ने से पूरा कारोबार ठप्प पड़ा है। रोजगार ख़त्म हो गया है सब बेरोजगार बैठे हैं। अब ऐसे में पेट भरने के लिए कर्ज तो लेना ही पड़ेगा।"

"सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम में 40,000 करोड़ रुपए अतिरिक्त दिया है मेरे हिसाब से यह बहुत कम है क्योंकि गाँव पहुंचें प्रवासियों की संख्या बहुत ज्यादा है जिसके लिए यह पर्याप्त नहीं है। मेरे हिसाब से इस बजट में तीन चार लाख करोड़ रूपये डालने चाहिए जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सके और उन्हें उधारी से मुक्ति मिले," अरुण कुमार आगे बताते हैं।


सरकार ऐसी क्या रणनीतियां बनाये जिससे इस असंगठित तबके को सहूलियत हो सके? इस पर अरुण कुमार बोले, "सरकार को सबसे पहले चाहिए कि रोजगार पैदा करे। लोगों की योग्यता के अनुसार क्षेत्र में ही उन्हें काम दे। जैसे कोई व्यक्ति शिक्षण कार्य करने में सक्षम है तो उसे शिक्षा विभाग में लगा दे, कोई स्वास्थ्य सेवा में निपुण है तो उसे अस्पतालों से जोड़े। वैसे भी अध्यापकों डॉक्टरों सबकी देश में बहुत ज्यादा कमी है।"

देश के कई राज्यों में शहरों से वापस लौटे मजदूरों की स्किल मैपिंग हो रही थी, लेकिन उससे कितने लोगों को रोजगार मिला, ये अभी साफ नहीं है।

"लॉकडाउन से अबतक रेट ऑफ़ ग्रोथ लगातार घट रहा है। सरकार को बजट पर पुन: काम करने की जरूरत है। अगर बजट फार्मुलेट नहीं किया तो स्थितियां गम्भीर हो सकती हैं। सरकार को टैक्स कलेक्शन बहुत कम मिलेगा क्योंकि बिजनेस पर असर पड़ा है। सरकार तनख्वाह देने की स्थिति में नहीं होगी इसलिए पहले से ही सबकी सैलरी काटी जाए और उस पैसे को दूसरे जरूरी मद में खर्च किया जाए। युद्ध से बद्त्तर स्थिति है इसलिए पूरे देश को इस स्थिति से जुड़ना पड़ेगा, हर वर्ग पर ध्यान देना पड़ेगा तभी कुछ बेहतर स्थिति में होंगे हम, " अरुण कुमार ने चिंता जताई।

लॉकडाउन में कर्ज लेने की वजहें भले ही अलग-अलग हों लेकिन किसी न किसी मद में लोगों ने कर्ज जरुर लिया है। गाँव कनेक्शन के सर्वे के अनुसार जो 23 फीसदी उधारी या कर्ज लेने वाला आंकड़ा है नीचे दी गयी सारणी से समझें कि लोगों ने किन-किन मदों में कितने फीसदी कर्ज लिया है। सवाल था किस उद्देश्य के लिए आपको कर्ज या उधार लेना पड़ा?


गांव कनेक्शन के सर्वे में जिन 23 फीसदी ने बताया उन्हें कर्ज़ या उधार लेना पड़ा उनमें से जिसमें 71 फीसदी लोगों के मुताबिक उन्होंने ये पैसा घरेलू खर्च के लिए लिया,जबकि 10 फीसदी ने दवाओं, अस्पताल खर्च और 8 फीसदी कृषि कार्य जबकि 11 फीसदी लोगों ने कर्ज़-उधारी की दूसरी वजहें बताईं। वहीं चार फीसदी लोगों का कोई जवाब नहीं आया।

राज्य सरकारें ऐसा क्या करे जिससे कर्ज लेने वाले लोगों का प्रतिशत कम हो इस पर बीएचयू के समाजशास्त्र प्रोफेसर अशोक कौल बोले, "इस काम में राज्य सरकारों के अलावा उद्योगपतियों और उस हर व्यक्ति को आगे आना होगा जो तीन चार लोगों का खर्चा उठाने में सक्षम हो। इन सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारियां लेनी पड़ेंगी, सिविल सोसाइटी को जागना पड़ेगा। चैरिटी सिस्टम पर हमें जोर देना होगा। अमीर और अमीर, गरीब और गरीब हो जाए सालों से चलने वाले इस सिस्टम पर बदलाव की जरूरत है। बहुत ज्यादा नहीं पर इतना हो जाए कि गरीब को पेट भरने के लिए साहूकारों के हाथ न जोड़ने पड़ें। जमीन और गहने गिरवी न रखने पड़ें, कर्ज के बदले ताउम्र बंधुआ मजदूर बनकर न रह जाएँ।"

प्रोफेसर अशोक कौल की इन बातों का जवाब गाँव कनेक्शन सर्वे में भी दिखता है कि जो एक दूसरे की मदद करने वाले लोग हैं वो 57 फीसदी पड़ोसी या दोस्त हैं। सवाल पूछा गया था कि आपने जो कर्ज लिया है वो किससे लिया है नीचे दिए गये आंकड़ों से समझें कि लोगों ने कर्ज या उधारी किससे ली है?


लॉकडाउन के दौरान सबसे ज्यादा मददगार 57 फीसदी दोस्त और पड़ोसी हुए। साहूकारों से 21 फीसदी लोगों ने कर्ज लिया जबकि सिर्फ 5 फीसदी को बैंक से लोन मिला, वहीं 7 फीसदी को रिश्तेदार और 8 फीसदी अन्य में थे जबकि तीन फीसदी ने कोई जवाब नहीं दिया।

यूपी के लखीमपुर जिले के विक्रम यादव (25 वर्ष) दो साल पहले अपने एक रिश्तेदार से 20,000 रूपये कर्ज लेकर महाराष्ट्र कमाने गये। वहां उन्हें अच्छा काम नहीं मिला मजबूरन किसी ढाबे में काम करना पड़ा। विक्रम यहाँ इतने पैसे नहीं कमाता था जिससे वो अपने खर्चों के अलावा कर्ज भी चुका सके। इधर जब लॉकडाउन पड़ा तो उसे महाराष्ट्र से वापस आना था। विक्रम बताते हैं, "मेरे पास घर वापस आने के पैसे नहीं थे इसलिए हमारे घरवालों ने गाँव के एक साहूकार से 10,000 कर्ज लेकर अपने पैसा भेजा। वहां से आने में छह-सात हजार रूपये खर्च हो गये, अब इतना कर्जा हो गया है दिमाग नहीं काम कर रहा कैसे चुकाएंगे?"

रोज दोनों वक़्त रोटी बन सके इसके लिए लखनऊ जिले के अटेसुवा गाँव के रहने वाले मुन्नालाल (65 वर्ष) को अपने पत्नी के गहने गिरवी रखने पड़े।

"घरैतिन (पत्नी) का जेबर गिरवी रखना पड़ा, इतना कभी कमा नहीं पाए कि बैंक में जमा कर देते जो इस बुरे वक़्त में काम आता। अभी इन्ही पैसों से साग-सब्जी का खर्चा चल रहा है। कमाकर जेबर उठा लेंगे," यह बताते हुए मेवालाल के चहरे पर संकोच भी था और चिंता की लकीरें भी थीं जो उनकी गरीबी को बयान करने के लिए काफी थीं।

यूपी में 29 फीसदी लोगों को पैसे उधार या कर्ज़ लिए। सात फीसदी ने जमीन गिरवी रखी या बेची, आठ फीसदी को अपनी कोई कीमती चीजें बेचनी पड़ी वहीं आठ फीसदी को ज्वैलरी बेचनी या गिरवीं रखनी पड़ी।

लॉकडाउन में सरकार ने अलग-अलग मदों में जैसे जनधन, उज्जवला, वृद्धावस्था पेंशन, पीएम किसान निधि में सीधे गरीबों के खातों में पैसे भेजे पर सर्वे के आंकड़ों के अनुसार 69 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें तंगी हुई। सर्वे में इन्हीं लोगों ने कहा कि सरकार ने जो मदद भेजी थी वो उनके लिए पर्याप्त नहीं थी।

सर्वे में दो तिहाई परिवारों ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन में खाद्य सामग्री की दिक्कत हुई। आंकडों की बात करें तो 32 फीसदी ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन में फूड एक्सेस के लिए हद से ज्यादा दिक्कत हुई। जबकि 36 फीसदी ने कहा कि उन्हें काफी दिक्कतें हुई जबकि 22 फीसदी के मुताबिक कई बार या कुछ कुछ दिक्कतें हुई।

जिन राज्यों में खाने की समस्या हुई तो इनमें सबसे ऊपर जम्मू कश्मीर और लद्धाख हैं, यहां 56 फीसदी ने कहा (वेरी हाई) दिक्कत, जबकि उत्तराखंड में 47फीसदी, बिहार में 43, पश्चिम बंगाल में 41, हरियाणा में 40 और झारखंड में 39 फीसदी रहा। केरल में सिर्फ 9 फीसदी लोगों को खाने की दिक्कत हुई। सर्वे में साफ नजर आया कि जिन लोगों को किसी तरह की भी दिक्कतें हुई उनमें गरीब सबसे ज्यादा थे।


सर्वेक्षण की पद्धति

इस सर्वे में 79.1 फीसदी पुरुष और 20.1 फीसदी महिलाएं शामिल थीं। सर्वे में शामिल 53.7 फीसदी लोग 26 से 45 साल के बीच के थे। इनमें से 33.1 फीसदी लोग या तो निरक्षर थे या फिर प्राइमरी से नीचे पढ़े हुए थे सिर्फ 15 फीसदी लोग स्नातक थे। सर्वे में शामिल 43.00 लोग गरीब, 24.9 फीसदी लोवर क्लास और 25. फीसदी लोग मध्यम आय वर्ग के थे।

ये पूरा सर्वे गांव कनेक्शन के सर्वेयर द्वारा गांव में जाकर फेस टू फेस एप के जरिए मोबाइल पर डाटा लिया गया। इस दौरान कोविड गाइडलाइंस (मास्क, उचित दूरी, हैंड सैनेटाइजर) आदि का पूरा ध्यान रखकर पूरा किया गया है। इस सर्वे का डिजाइन और डाटा विश्लेषण नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी के लोकनीति-सीएसडीएस टीम द्वारा किया गया।

सीएसडीएस, नई दिल्ली के प्रोफेसर संजय कुमार ने कहा, "सर्वे की विविधता, व्यापकता और इसके सैंपल साइज के आधार पर मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि यह अपनी तरह का पहला व्यापक सर्वे है, जो ग्रामीण भारत पर लॉकडाउन से पड़े प्रभाव पर फोकस करता है। लॉकडाउन के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क और अन्य सरकारी नियमों का पालन करते हुए यह सर्वे गांव कनेक्शन के द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें उत्तरदाताओं का फेस टू फेस इंटरव्यू करते हुए डाटा इकट्ठा किए गए।"

"पूरे सर्वे में जहां, उत्तरदाता शत प्रतिशत यानी की 25000 हैं, वहां प्रॉबेबिलिटी सैम्पलिंग विधि का प्रयोग हुआ है और 95 प्रतिशत जगहों पर संभावित त्रुटि की संभावना सिर्फ +/- 1 प्रतिशत है। हालांकि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से उनके जनसंख्या के अनुसार एक निश्चित और समान आनुपातिक मात्रा में सैंपल नहीं लिए गए हैं, इसलिए कई लॉजिस्टिक और कोविड संबंधी कुछ मुद्दों में गैर प्रॉबेबिलिटी सैम्पलिंग विधि का प्रयोग हुआ है और वहां पर हम संभावित त्रुटि की गणना करने की स्थिति में नहीं हैं," संजय कुमार ने आगे बताया।

इस सर्वे के कुछ मुख्य निष्कर्ष नीचे दिए गए हैं-

- गांव कनेक्शन के सर्वे में शामिल लोगों में सबसे ज्यादा संख्या किसानों की थी, सर्वे में शामिल आधे से अधिक किसान लॉकडाउन के दौरान अपने फसल को सही समय पर काटने में सफल तो हुए लेकिन सिर्फ एक चौथाई किसानों को ही अपनी फसल का सही दाम मिल पाया।

-वो लोग जिनके पास राशन कार्ड था, उनमे से 71 फीसदी लोगों को लॉकडाउन के दौरान सरकार द्वारा निर्धारित राशन (गेंहू या चावल) मिला। सर्वे के दौरान 17 फीसदी लोग ऐसे मिले जिनके पास राशन कार्ड नहीं था और ऐसे राशन कार्ड विहीन लोगों में से सिर्फ 27 फीसदी लोगों को ही राशन मिल सका। जबकि सरकार ने सभी के लिए निःशुल्क राशन की घोषणा की थी।

--लॉकडाउन से सबसे अधिक प्रभावित कुशल कामगार और अकुशल मजदूर रहें। 60 फीसदी कुशल कारीगरों का काम पूरी तरह ठप रहा, जबकि 64 फीसदी अकुशल मजदूर भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुए और उनका काम पूरी तरह से ठप हो गया।

-सर्वे के दौरान हर आठ में से एक ग्रामीण परिवार ने कहा कि लॉकडाउन में आर्थिक तंगी के कारण उन्हें कई बार पूरे दिन भूखा रहना पड़ा।

-सिर्फ 20 प्रतिशत ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन के दौरान मनरेगा के तहत काम मिला। छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक 70 फीसदी लोगों को मनरेगा के तहत काम मिला, जबकि 65% और 59% के साथ उत्तराखंड और राजस्थान तीसरे स्थान पर रहें। वहीं गुजरात और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर-लद्दाख का प्रदर्शन इस मामले में सबसे खराब रहा और वहां क्रमशः सिर्फ 2% और 4% मजदूरों को ही मनरेगा के तहत काम मिल सका।

-68 फीसदी से अधिक ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन के दौरान आर्थिक दिक्कतों का गंभीर सामना करना पड़ा।

-लॉकडाउन के दौरान 23 फीसदी मजदूर ऐसे रहें, जिन्होंने पैदल ही शहर से अपने घर-गांव की यात्रा की। वहीं 33 फीसदी प्रवासी मजदूरों ने कहा कि वे रोजगार के लिए फिर से शहरों की तरफ वापस जाना चाहते हैं।

-ऐसे घर जिनमें गर्भवती महिलाएं थी, उनमें से 42 फीसदी लोगों ने कहा कि लॉकडाउन के कारण वे गर्भावस्था के दौरान होने वाली नियमित जांचों (चेकअप) को नहीं करा सकीं। पश्चिम बंगाल (29%) और ओडिशा (35%) इस सूची में सबसे निचले पायदान वाले राज्यों में रहे।

-डेयरी और पोल्ट्री उद्योग से जुड़े 56 फीसदी लोगों ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें अपने उत्पाद बेचने में बहुत कठिनाई हुई जबकि 35 फीसदी ने कहा कि उन्हें अपने उत्पाद का सही कीमत नहीं मिला।

-78 प्रतिशत लोगों ने कहा कि लॉकडाउन के कारण उनका काम (रोजगार) पूरी तरह से रुक गया या काफी हद तक प्रभावित हुआ। 44 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनका काम लॉकडाउन के दौरान पूरी तरह ठप हो गया।

-71 फीसदी ग्रामीण परिवारों ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उनके परिवार की मासिक आय में गिरावट आई।

-सबसे अधिक गरीब प्रभावित हुए। 75 फीसदी गरीब परिवारों और 74 फीसदी निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों के मासिक आय में गिरावट दर्ज हुई।

-38 फीसदी ग्रामीण परिवारों ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें जरूरी दवा या चिकित्सा मिलने में परेशानी हुई। पूर्वोत्तर राज्य इससे सबसे अधिक प्रभावित रहें। असम में 87% और अरुणाचल प्रदेश में 66% परिवारों ने कहा कि उन्हें जरूरी दवा या चिकित्सा उपलब्ध नहीं हुई।

- आंगनबाड़ी और सरकारी स्कूलों में पंजीकृत बच्चों वाले आधे से अधिक परिवारों (54%) को लॉकडाउन के दौरान सूखा राशन/भोजन प्राप्त हुआ। उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर-लद्दाख और छत्तीसगढ़ में यह प्रतिशत क्रमशः 90%, 89% और 86% रहा, जो कि अधिकतम है। जबकि बिहार और गुजरात में क्रमश: 32% और 25% के साथ सबसे नीचे के राज्य रहें।

-64 फीसदी लोगों ने कहा उन्हें या उनके घर में किसी शख्स को लॉकडाउन के दौरान सरकार द्वारा भेजी गई आर्थिक सहायता (जनधन 500 रुपए महीना, 2000 रुपए पीएम किसान योजना, 1000 रुपए श्रम कल्याण योजना या उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी गैस की सब्सिडी) बैंक खाते में सीधी पहुंची, हालांकि सबसे गरीब परिवारों को इन डीबीटी योजनाओं का उतना लाभ नहीं मिल पाया।

-40% लोगों ने कहा कि लॉकडाउन 'बहुत कठोर' था, जबकि 38% ने कहा कि यह 'पर्याप्त कठोर' था। वहीं 11% ने कहा कि लॉकडाउन को और कठोर होना चाहिए था। जबकि 4% लोग ऐसे भी थे जिन्होंने कहा कि लॉकडाउन बिल्कुल नहीं होना चाहिए था।

"30 मई से 16 जुलाई 2020 के बीच हुए इस सर्वे में कुल 25,371 उत्तरदाताओं का साक्षात्कार किया गया। सभी उत्तरदाता अपने घरों के प्रमुख कमाने वाले थे, इस तरह यह सर्वे पुरुष प्रधान रहा और लगभग 80 प्रतिशत उत्तरदाता पुरूष ही रहें। हालांकि इसमें 20 फीसदी महिलाओं ने भी हिस्सा लिया," गाँव कनेक्शन ने बताया।

जिन राज्यों में सर्वे किया गया उनमें राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ हैं। वहीं केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर- लद्दाख और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भी इस सर्वे में शामिल होने वाले राज्य रहें।

सर्वे के अनुसार, ऐसा लगता है कि लॉकडाउन से केंद्र के मोदी सरकार या राज्यों सरकारों के बारे में ग्रामीण नागरिकों की धारणा कुछ अधिक नहीं बदली। उदाहरण के रूप में, दस में से सात उत्तरदाताओं (73 प्रतिशत) ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान मोदी सरकार का प्रवासी मजदूरों के प्रति रवैया बहुत अच्छा रहा। (29 प्रतिशत ने कहा- बहुत अच्छा और 44 प्रतिशत ने कहा अच्छा रहा।)

सिर्फ 23 फीसदी या हर चार में से एक ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान सरकार की व्यवस्था खराब थी, जिसमें से 9 फीसदी ने बहुत खराब और 14 फीसदी ने खराब कहा।

इसी तरह राज्य सरकारों के बारे में लोगों की धारणा काफी सकारात्मक रही। 76 प्रतिशत लोगों ने कहा कि राज्य सरकार का प्रवासियों के प्रति उनका रवैये काफी अच्छा रहा, जबकि केवल 20 प्रतिशत ने इसे बुरा बताया।

सर्वे की प्रमुख स्टोरी-

1.लॉकडाउन में जेवर, फोन, जमीन तक बेचा, क़र्ज़ लिया, लेकिन सरकार के कामों से संतुष्ट हैं 74% ग्रामीण: गांव कनेक्शन सर्वे

2. लॉकडाउन में पैदल लौटने को मजबूर हुए 23 % प्रवासी मजदूर : गाँव कनेक्शन सर्वे

Read in English- Only 58% pregnant women in rural India confirmed prenatal check-ups, vaccination during the lockdown: Gaon Connection Survey


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