राजा रवि वर्मा... दीवारों पर चित्र उकेरने से केसर-ए-हिंद तक का सफर

Anusha MishraAnusha Mishra   29 April 2017 9:08 AM GMT

राजा रवि वर्मा... दीवारों पर चित्र उकेरने से केसर-ए-हिंद तक का सफरराजा रवि वर्मा

लखनऊ। राजा रवि वर्मा, एक ऐसे चित्रकार जिन्होंने यूरोपियन तकनीकों के साथ भारतीय संवेदनाओं के मिलकार ऐसी पेंटिंग बनाईं कि वह इतिहास के महान चित्रकारों में शामिल हो गए। उन्होंने भारतीय सौंदर्य और कला परंपरा को यूरोपियन तकनीको में शामिल करके उन्होंने ऐसी पेटिंग्स बनाईं की वह यूरोपियन कला के एक नए आविष्कार के रूप में जानी जाने लगीं।

उन्होंने पत्थर के छापों से ऐसी पेंटिंग जिससे आम जन को भी आसानी से उससे जुड़ गया और वह भी इस कला की ओर आकर्षित होने लगा। लोग अपने घरों पर पत्थर के छापों का उपयोग करके चित्र बनाने लगे। उनके चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता थी हिंदू महाकाव्यों और धर्मग्रंथों पर बनाए गए उनके चित्र जिससे लोग उनकी पेटिंग के साथ-साथ उनसे भी जुड़ने लगे।

इंसाफ के लिए गुहार लगाते हुए द्रौपदी का चित्र

देश-दुनिया से जुड़ी सभी बड़ी खबरों के लिए यहां क्लिक करके इंस्टॉल करें गाँव कनेक्शन एप

राजा रवि वर्मा का जन्म 29 अप्रैल 1848 को केरल के शहर किलिमानूर में हुआ था। उन्हें बचपन से ही चित्रकारी का इतना शौक था कि अपने घर की दीवारों पर ही उन्होंने चित्रकारी शुरू कर दी। इन चित्रों में वे अपने दैनिक जीवन में घटने वाली घटनाओं को आधार बनाते थे। उन्हें एक बड़ा चित्रकार बनाने में उनके चाचा राजा वर्मा का अहम योगदान था।

चित्रकारी की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें उनके चाचा ने ही दी थी। जब राजा रवि वर्मा 14 साल के थे तब उनके चाचा उन्हें तिरुवनंतपुरम के राजमहल में ले गए जहां उन्हें तैल चित्र यानि ऑयल पेटिंग की शिक्षा दी गई। 1868 में राजा रवि वर्मा थियडोर जेनसन नाम के डच चित्रकार से मिले और उनसे पाश्चात्य कला व ऑयल पेटिंग की शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद उन्होंने मैसूर्, बड़ौदा व देश के कई अन्य शहरों में जाकर भी उन्होंने चित्रकारी के गुण सीखे। शुरुआत में उन्होंने तंजौर कला सीखी और यूरोपियन कला में महारत हासिल की।

मिले कई पुरस्कार

उनके चित्रों के प्रदर्शनी में शामिल होने की शुरुआत हुई 1873 से जब चेन्नै में अयोजित प्रदर्शनी में 'चमेली के फूलों से केशालंकार करती नायर स्त्री' नामक पेंटिंग को प्रथम पुरस्कार मिला। इसी साल वियना में अयोजित एक चित्र प्रदर्शनी में भी यही चित्र पुरस्कृत हुआ। अगले वर्ष उनका एक और चित्र 'तमिल महिला की संगीत साधना' 1874 में चेन्नै की प्रदर्शनी में पुरस्कृत हुआ। यही चित्र 'दारिद्रय' शीर्षक से तिरुवनन्तपुरम की श्री चित्रा कला दीर्घा में प्रदर्शित है। 1876 ई में 'शकुन्तला की प्रेम दृष्टि' नामक चित्र चेन्नै प्रदर्शनी में पुरस्कृत हुआ। पांव में लगे कांटे को निकालने के बहाने दुष्यंत को मुडकर देखती 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' की शकुन्तला का चित्र उनके सर्वाधिक प्रसिद्ध चित्रों में एक है। ब्रिटिश प्राच्यविद् मेनियर विलियंस ने अपने शकुन्तलानुवाद के मुखपृष्ठ के लिये इसी चित्र का चुनाव किया था।

‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ की शकुन्तला का चित्र

आधुनिक भारतीय चित्रकला के प्रवर्तक

ऐसे कहते हैं कि राजा रवि वर्मा आधुनिक भारतीय चित्रकला के प्रवर्तक थे। उन्होंने चित्रकला को आधुनिक प्रौद्योगिकी से जोड़ा और भारतीय चित्रकला के इतिहास में एक नये अध्याय का प्रारंभ किया। 1894 में उन्होंने विदेश से एक कलर ओलियोग्राफिक प्रेस खरीदकर मुम्बई में स्थापित की। इस प्रेस में उन्होंने चित्रों के सस्ते संस्करण मुद्रित किये। इस प्रकार उन्होंने अपने चित्रों को मुद्रित कर सस्ते दाम पर जनसामान्य को उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण काम किया। 1972 में उनके प्रेस में आग लग गई और इस आग में उनके द्वारा बनाए गए चित्र जल गए।

रावण के सीता हरण के वक्त जटायू के संघर्ष का चित्र

1904 में, ब्रिटिश सम्राट की ओर से वाइसराय लॉर्ड कर्जन ने वर्मा को कैसर-ए-हिंद गोल्ड मेडल प्रदान किया। 2 अक्टूबर 1806 में 58 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया लेकिन इतने कम समय में उनके द्वारा बनाए गए चित्र आज भी भारतीय चित्रकारी में सर्वोच्च स्थान रखते हैं।

ताजा अपडेट के लिए हमारे फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए यहां, ट्विटर हैंडल को फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें।

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top