भोपाल गैस त्रासदी: 'जो हवा के विपरीत भागे, बच गए, उसी दिशा में भागे वो नहीं बचे'

Manish MishraManish Mishra   2 Dec 2018 8:30 AM GMT

भोपाल गैस कांड पर गाँव कनेक्शन की विशेष सीरीज-दस कहानियां

भोपाल (मध्य प्रदेश)। "जब भगदड़ मची तो जो हवा हवा के विपरीत भागे वो बच गए, और जो हवा के विपरीत भागे नहीं बचे," एक् छोटे से कमरे में बैठे आजाद मियां ने बताया।

आजाद मियां (79 वर्ष) यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में काम करते थे, और दिन की शिफ्ट होने से रात में घर पर ही थे। उन्हें पता था कि जब कोई कोई दुर्घटना हो तो क्या करना है।

जैसे ही गैस उन्होंने सूंघी उन्हें अनहोनी का अंदाजा हो गया। उसके बाद उन्होंने इधर-उधर भाग रहे लोगों को बस्ती से लोगों को सुरक्षित निकालना शुरू किया।

"02 दिसंबर, 1984 की रात 11.50 बजे ऐसा लगा कि किसी ने कुछ जला दिया है। हमें पता चल गया कि ऐसी दुर्घटना हुई है। लोग खांस रहे थे, भाग रहे थे, आंसू निकल रहे थे। जब फैक्ट्री का सायरन बजा तो दूसरों को पता चला कि गैस लीकेज हो गई है," आजाद मियां ने बताया।

जब अफरा-तफरी शुरू हुई तो हमने बस्ती वालों से कहा कि पहले हवा का रुख देखो जिधर हवा थी उसके विपरीत हम बस्ती वालों को लेकर गए। इस तरह के हादसों में क्या करना चाहिए, इसकी चेतावनी मालूम थी," एक छोटे से कमरे में बैठे कुर्सी पर बैठे आजाद मियां ने बताया।


उस अफरा-तफरी के दौरान जिन्होंने आजाद मियां की बात मानी वो आज जिंदा हैं। "हमने लोगों से कपड़े गीले करके विपरीत दिशा में भागने को कहा। गैस कोई भी हो वो ज़मीन से दो फिट ऊपर ही चलेगी। इसके लिए हमने लोगों से औंधे मुह जमीन पर लेटने को कहा। कुछ लोगों के बीवी-बच्चे बिछड़ गए, जिन्होंने हमारी बात मान ली वो बच गए," एक अंधेरे कमरे बैठे आजाद मियां ने कहा।

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एक कमरे में आजाद मियां की पूरी ग्रहस्थी जमा है, उनकी पत्नी को हार्ट की समस्या है। काम भी नहीं कर सकते। जैसे-तैसे ज़िंदगी चल रही है।

अपनी लाल आंखों की ओर इशारा करते हुए आजाद मियां कहते हैं, "हमारी आंखें खराब हो गईं, सांस फूलती है, कोई काम नहीं कर सकते। हम जिंदा लाश हैं।"

भोपाल में गैस हादसे को याद करते हुए आजाद मियां की अवाज भर्राने लगती है। उन्होंने बताया, "हादसे के बाद शुरूआत के चार दिन काफी ज्यादा लोग मरे। दो दिसंबर की रात और तीन दिसंबर को ज्यादा लोग खत्म हुए। लाशें वैसे पड़ी थीं जैसे लकड़ी होती है, बिल्कुल सख्त। उसके बाद कम कर कर के ये सिलसिला चलता ही रहा।"

इस हादसे में लोगों की जानें इसलिए भी ज्यादा गईं कि उन्हें पता ही नहीं था कि क्या करना है। "फैक्ट्री में काम करने वाला कोई कर्मचारी नहीं मरा, उन्हें पता था कि ऐसी स्थिति में क्या करना होता है। जैसे ही सायरन बजा सभी भाग खड़े हुए। मरे वो जिन्हें ये नहीं पता था कि करना क्या है और किधर जाना है," आजाद मियां कहते हैं।


फैक्ट्री में होने वाले काम के बारे में बताते हुए आजाद मियां ने कहा, "ये तो हमें मालुम है कि किसका जॉब कहां रहता है, इतना बड़ा हादसा सिर्फ एक आदमी की लापरवाही से हुआ। जब कोई चीज टैंक में भरेंगे तो वह भरती रहेगी जब तक रोका नहीं जाएगा। जिनकी ड्यूटी थी वह गैस मशीन चला के इधर-उधर घूम रहे थे। जब सायरन बजा तब वापस आए।"

उन्होंने आगे बताया, "इससे पहले भी यूनियन कार्बाइड में एक दुर्घटना हुई थी और एक कर्मचारी की मौत हुई थी, लेकिन उसे दबा दिया गया। ये बड़ा हादसा हो गया तो पूरे विश्व में भोपाल को लोग जान गए।"

जब ये फैक्ट्री बनने लगी तो आसपास लेबर क्लास की बस्ती बसने लगी। अगर कंपनी कोई चेतावनी देती कि कितना खतरनाक काम हो रहा है और बताती तो लोग क्यूं बसता। पहले ये इंडस्ट्रियल एरिया था, बस्ती बनने के बाद वो नहीं रहा।

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अपनी जान बचाकर भागे आजाद मियां को बेटे का प्यार वापस फिर बस्ती खींच लाया। "जब हमारा बच्चा छूट गया था, तो दोबार उसको लेने आए। गैस का रिसाव तभी बंद हुआ जब पूरी निकल गई।

इस हादसे के 34 साल बाद अभी भी लोग बीमारियों से मर रहे हैं। "अभी हाल ही में हमारे भतीजे की किडनी फेल होने से मौत हुई है। भोपाल हास्पिटल में इलाज भी चला पांच साल। उसक तीन लड़कियां हैं," आजाद मियां ने बताया।

गांव कनेक्शन से बात करते आजाद मियां

बहुत जहरीली थी गैस

आजाद मियां बताते हैं, "फैक्ट्री में खाद बनाई जाती थी, उसमें ये केमिकल मिलाया जाता था। जो पहले अमरीका से आता था, बाद में यहीं बनने लगा," आगे बताया, "जो गैस निकली थी वो 100 प्रतिशत मात्रा की थी, जब खाद बनाते थे उसमें इस केमिकल को 5 से 10 प्रतिशत तक ही मिलाया जाता था। अब समझिए कितना जहरीला होगा?"

'जो हक मिलना चाहिए था, नहीं मिला'

हादसे के बाद अमेरिकी कंपनी ने कहा था कि हम सर्वे करके खुद पैसा देंगे लेकिन उस समय की केन्द्र सरकार ने अपने हाथ में ले लिया, इससे क्या हुआ कि जो हक मिलना चाहिए था वो नहीं मिला। नीचे के लोगों ने खेल कर दिया। और सही तरीके से मुआवजा नहीं बांटा।


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