49 फीसदी किसान नहीं जानते, क्या है एफपीओ ? इनमें आधे से ज्यादा छोटे और सीमांत किसान : गाँव कनेक्शन सर्वे

देश के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन ने कई राज्यों में किसानों के बीच सर्वे कराया। द इंडियन फार्मर परसेप्शन ऑफ न्यू एग्री लॉज़ की रिपोर्ट, बता रही है एफपीओ यानी किसान उत्पादक संगठनों के बारे में देश के आम किसानों की राय।

Kushal MishraKushal Mishra   25 Oct 2020 5:58 AM GMT

49 फीसदी किसान नहीं जानते, क्या है एफपीओ ? इनमें आधे से ज्यादा छोटे और सीमांत किसान : गाँव कनेक्शन सर्वेगाँव कनेक्शन सर्वे में 49 फीसदी किसानों ने कहा कि उन्हें एफपीओ के बारे में नहीं है जानकारी।

देश में लागू हुए कृषि कानूनों में केंद्र सरकार एफपीओ को भी खासा बढ़ावा दे रही है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अगस्त में किसानों के लिए एक लाख करोड़ रुपए का एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड का भी ऐलान किया। इसमें देश में 10,000 नए एफपीओ बनाने के लिए वित्तीय सुविधाएँ दी जायेंगी। अब सरकार का तर्क है कि इन कानूनों के जरिये एफपीओ से जुड़े छोटे और सीमांत किसानों को बाजार में अपनी उपज की बेहतर कीमत मिल सकेगी।

एफपीओ यानी किसान निर्माता संगठन (FPO), किसानों का एक ऐसा समूह जो अपने-अपने क्षेत्र में फसल उत्पादन के साथ कृषि से जुड़ी तमाम व्यावसायिक गतिविधियां चलाता है। एफपीओ से किसानों को न सिर्फ अपनी फसल बेचने की सुविधा मिलती है, बल्कि कृषि उपकरण के साथ-साथ खाद, बीज, उर्वरक जैसे तमाम उत्पाद भी अच्छी गुणवत्ता और उचित मूल्य में मिल जाते हैं।

देश में 27 सितम्बर को लागू हुए तीन नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों की राय जानने के लिए गाँव कनेक्शन के रूरल इनसाइट विंग ने 16 राज्यों के 5,022 किसानों से आमने-सामने बातचीत कर रैपिड सर्वे कराया। यह सर्वे तीन से नौ अक्टूबर के बीच किया गया। इस सर्वे में सामने आया कि 49 फीसदी किसान एफपीओ के बारे में जानते ही नहीं है। इनमें भी आधे से ज्यादा छोटे और सीमांत किसान रहे। यह हाल तब है जब देश में 86 फीसदी छोटे और सीमांत किसान हैं।

एफपीओ के बारे में जानकारी के सवाल पर सामने आया कि सिर्फ 32 % किसान ही एफपीओ के बारे में जानते हैं, जबकि 19 फीसदी किसान ऐसे थे जो एफपीओ के बारे में कुछ भी कह नहीं सके।

सर्वे में यह भी सामने आया कि एफपीओ के बारे में जानकारी पश्चिम के राज्यों (महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश) के (39 %) किसानों में सबसे ज्यादा देखने को मिली, जबकि सबसे कम जानकारी उत्तरी राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड) के (20%) किसानों में है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में 27 सितंबर 2020 की तारीख इतिहास में दर्ज हो गयी। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर के बाद कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए तीन नये कृषि बिल उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020, मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक देश में कानून बनकर लागू हो गये।

हालाँकि इन कानूनों का कई राज्यों में किसान संगठनों का विरोध जारी है, जबकि पंजाब सरकार ने तो 20 अक्टूबर को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर तीन नए संशोधित बिल पास कर दिए हैं और राजस्थान की सरकार भी अब ऐसा ही करने की तैयारी में हैं। जबकि एनडीए सरकार किसानों को ये समझाने कि कोशिश में है कि ये कृषि कानून उनके हित में हैं और इससे कृषि का भविष्य बदल जाएगा।

केंद्र सरकार का तर्क है कि इन कानूनों से एफपीओ से जुड़े छोटे और सीमांत किसानों को भी फायदा मिल सकेगा, साथ ही एफपीओ छोटे किसानों को जोड़कर उनकी उपज को बाजार में बेहतर कीमत दिलाने की दिशा में कार्य करेंगे।

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दूसरी ओर नौ अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के किसानों के लिए एक लाख करोड़ रुपये की वित्तीय सुविधाओं का बड़ा ऐलान किया। एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर नाम से बनाए गए इस फंड के जरिये कृषि क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कदम उठाए जायेंगे। इस फंड की अवधि 10 साल के लिए तय की गयी है जिसमें पहले साल 10 हजार करोड़ रुपये, और अगले हर एक तीन वित्त वर्षों में 30-30 हजार करोड़ रुपये के ऋण वितरित किये जायेंगे।

सरकार का तर्क है कि एग्री इंफ़्रा फंड के जरिये एक लाख करोड़ रुपये बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा देश के प्राइमरी एग्री क्रेडिट सोसाइटीज, कृषि उद्यमियों, एग्री-टेक समेत किसान निर्माता संगठनों यानी एफपीओ को भी ऋण के रूप में उपलब्ध कराए जाएंगे, इससे ग्रामीण भारत के कृषि क्षेत्रों में निजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

सरकार के प्रयासों के बावजूद गाँव कनेक्शन सर्वे से सामने आया कि 49 फीसदी किसान किसान निर्माता संगठनों (FPO) के बारे में जानते ही नहीं हैं।

हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की कसौली तहसील के गदियार गांव के रहने वाले राजिंदर कुमार कौशल साल 2016 से बनासर किसान समृद्धि नाम से एफपीओ चला रहे हैं और अपने क्षेत्र में टमाटर और अदरक उत्पादक किसानों के साथ काम करते हैं। राजिंदर के एफपीओ से 350 किसान जुड़े हैं और उनमें 80 प्रतिशत सीमांत किसान हैं।

एफपीओ को लेकर किसानों में जागरुकता के सवाल पर राजिंदर 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "असल में जागरुकता भी नहीं है और छोटे और सीमांत किसानों को समझाना भी बहुत मुश्किल है, हम अपने ही क्षेत्र की बात करें तो साल भर पहले भी हमारी एफपीओ के साथ 350 किसान जुड़े थे, और अभी भी उतनी ही संख्या है।"

राजिंदर के मुताबिक हाल में हम अपने एफपीओ के जरिये बिग बास्केट कंपनी के साथ टमाटर की उपज को लेकर करार करने में सफल रहे और हमारे साथ जुड़े किसानों को बाजार से 10 रुपये ज्यादा ही फायदा मिला, जब और किसानों ने यह देखा तो कई किसान एफपीओ से जुड़ने के लिए आये।

राजिंदर कहते हैं, "कहने का मतलब है कि किसानों को फायदा दिखा तो वो आये, इसमें कोई दो राय नहीं है कि एफपीओ छोटे और सीमांत किसानों के लिए बेहतर जरिया है उनकी फसल के अच्छे दाम दिलाने में, अगर कृषि कानूनों के जरिये सरकार एफपीओ को बढ़ावा देती है तो इससे निश्चित रूप से किसानों को फायदा पहुंचेगा।"

गाँव कनेक्शन सर्वे में यह भी सामने आया कि आधे से ज्यादा (51 फीसदी) ऐसे छोटे और सीमांत किसान रहे जिन्हें एफपीओ के बारे में कोई जानकारी नहीं है, जबकि मध्यम और बड़े किसानों के बीच भी यह आंकड़ा 45.4 फीसदी रहा। छोटे किसानों में 29.2 फीसदी और मध्यम और बड़े किसानों में सिर्फ 39.1 फीसदी किसान ही एफपीओ के बारे में जानते थे।

सिर्फ इतना ही नहीं, गाँव कनेक्शन ने अपने सर्वे में किसानों से यह भी जानने की कोशिश की कि क्या आप किसी दूसरे ऐसे किसान को जानते हैं जो एफपीओ या किसी समूह का हिस्सा है?

सर्वे में सामने आया कि 58 फीसदी ऐसे किसान थे जो ऐसे किसी दूसरे किसान को नहीं जानते थे। जबकि 19 फीसदी किसानों ने कहा कि हाँ, एफपीओ या किसी समूह का हिस्सा रहे ऐसे किसी दूसरे किसान के बारे में वे जानते हैं। वहीं एक बड़ा प्रतिशत (23%) ऐसे भी रहा जो इस बारे में कुछ भी कह नहीं सके।

सर्वे में सिर्फ 19 प्रतिशत किसानों ने कहा कि किसी समूह का हिस्सा रहे ऐसे किसी दूसरे किसान के बारे में जानते हैं।

सर्वे के नतीजों में सामने आया कि किसी समूह का हिस्सा रहे ऐसे किसी दूसरे किसान के बारे में न जाने वाले ऐसे किसानों में 55.4 फीसदी किसान छोटे और सीमांत किसान थे, जबकि मध्यम और बड़े किसानों में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा था। बड़े किसानों में 64.8 फीसदी किसान ऐसे किसी दूसरे किसान के बारे में नहीं जानते थे जो एफपीओ या किसी समूह का हिस्सा हों।

हालांकि देश में छोटे और सीमांत किसानों को लाभ पहुँचाने के लिए किसान निर्माता संगठन (FPO) को बढ़ावा दे रही केंद्र सरकार के प्रयासों के बावजूद एफपीओ के गठन और उसके क्रियान्वयन को लेकर भी कई मुश्किलें सामने आ रही हैं।

हरियाणा के रोहतक जिले में महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर मोहित रांगी ने हाल में कृषि क्षेत्र में किसान उत्पादक संगठनों को लेकर काफी काम किया। मोहित के मुताबिक, कई एफपीओ किसानों को उनकी उपज की अच्छी कीमत दिला रहे हैं, मगर कई बार एफपीओ को लेकर किसानों के अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं।

पिछले कुछ सालों में किसान निर्माता संगठनों का कृषि बाजार में ज्यादा जोर बढ़ गया है। मगर एफपीओ से जुड़े किसानों के भी खट्टे-मीठे अनुभव देखने को मिले हैं। राजस्थान के अलवर जिले में एक एफपीओ किसानों के साथ आंवले की खेती पर काम रहा था, किसानों का 20 रुपये किलो के हिसाब से आंवला बिक भी रहा था और किसानों को मंडी से ज्यादा ही कीमत मिल रही थी, मगर आज यह एफपीओ बंद हो चुका है।

मोहित रांगी, पीएचडी स्कॉलर, महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी, रोहतक

मोहित 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "पिछले कुछ सालों में किसान निर्माता संगठनों का कृषि बाजार में ज्यादा जोर बढ़ गया है। मगर एफपीओ से जुड़े किसानों के भी खट्टे-मीठे अनुभव देखने को मिले हैं। राजस्थान के अलवर जिले में एक एफपीओ किसानों के साथ आंवले की खेती पर काम रहा था, किसानों का 20 रुपये किलो के हिसाब से आंवला बिक भी रहा था और किसानों को मंडी से ज्यादा ही कीमत मिल रही थी, मगर आज यह एफपीओ बंद हो चुका है।"

"आंवले में फायदे की वजह से उस क्षेत्र में आंवले के कई बाग़ लग गए, फिर निजी व्यापारी आ गए और किसानों से 25 रुपये किलो पर आंवला खरीदने लगे, तो किसान पांच रुपये फायदे के लिए निजी व्यापारियों को बेचने लगे, वहीं कंपनी ने कई सीजन तक एफपीओ से जुड़े किसानों से आंवला ख़रीदा, फिर किसानों के हटने से एफपीओ बंद हो गया," मोहित बताते हैं।

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मोहित के मुताबिक अब उस क्षेत्र में आंवले का उत्पादन बढ़ गया और आपूर्ति कम हो गयी है और अब कंपनियां वहां 17 रुपये किलो के हिसाब से आंवला खरीद रही हैं। आंवले की कीमत गिर चुकी है।

किसानों को उनकी उपज की बेहतर कीमत मिले, इसके लिए देश भर में केंद्र सरकार की ओर से बनाये जा रहे किसान उत्पादक संगठनों को लेकर ही किसान नेता और मध्य प्रदेश में कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष केदार सिरोही सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हैं। सिरोही के मुताबिक, देश के किसान पहले भी समूह में खेती करते आये हैं और सरकार को सहकारिता की ताकत को समझना चाहिए था।

अपने देश में किसान बहुत पहले से सहकारिता में खेती करते आये हैं, सरकार उसकी जगह एफपीओ लेकर आ गयी, एफपीओ में भी किसानों को जोड़कर एक संगठन बनाना है और सहकारिता में भी किसानों की बनी हुई पहले से ही एक संस्था है, फिर हमें क्यों एफपीओ की जरूरत पड़ी?

केदार सिरोही, किसान नेता

केदार सिरोही 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "अपने देश में किसान बहुत पहले से सहकारिता में खेती करते आये हैं, सरकार उसकी जगह एफपीओ लेकर आ गयी, एफपीओ में भी किसानों को जोड़कर एक संगठन बनाना है और सहकारिता में भी किसानों की बनी हुई पहले से ही एक संस्था है, फिर हमें क्यों एफपीओ की जरूरत पड़ी?"

"सहकारिता इसलिए फेल हुई क्योंकि सरकार ने उस पर ध्यान नहीं दिया, फंड और टेक्नोलॉजी की कमी से सहकारिता को तवज्जो नहीं दी गयी, जबकि इसका हल था, किसानों के समूह पहले भी थे और कोआपरेटिव सोसाइटी भी किसानों की मदद करतीं, मगर एफपीओ के जरिये अब बड़ी कंपनियों और कॉर्पोरेट जगत को फायदा पहुँचाने की कोशिश की जा रही है, इसका नतीजा भविष्य में देखने को मिलेगा," केदार सिरोही बताते हैं।

इससे इतर देश में एफपीओ यानी किसान उत्पादक संगठनों की बात करें तो राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) और लघु कृषक कृषि व्यापार संघ (SFAC) समेत अन्य संस्थाओं के जरिये किसान उत्पादक संगठनों के गठन और उनको बढ़ावा देने के लिए कार्य किये जा रहे हैं। इनके जरिये अब तक देश में 7,000 से ज्यादा किसान उत्पादक संगठनों का गठन हो चुका है। वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने वर्ष 2024 तक 10,000 नए एफपीओ खोले जाने के लिए निर्देश दिए हैं ताकि किसानों को समूह में अपनी उपज की उचित कीमत मिल सके।

सर्वे के अनुसार, किसी समूह का हिस्सा रहे ऐसे किसी दूसरे किसान के बारे में न जाने वाले ऐसे किसानों में 55.4 फीसदी किसान छोटे और सीमांत किसान रहे।

केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने बैठक में एफपीओ को लेकर दिशा-निर्देशों की एक बुकलेट भी जारी की है। इन दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि हर एक एफपीओ में 50 प्रतिशत छोटे, सीमान्त और भूमिहीन किसान शामिल होंगे। इसके अलावा प्रत्येक एफपीओ के उसके काम के अनुरूप 15 लाख रुपए का अनुदान भी दिया जाएगा। इसके लिए देश भर की सहकारी समितियां एफपीओ के गठन में सहयोग करेंगी ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि में निवेश को बढ़ाया जा सके।

नाबार्ड कोलकाता में उप महा प्रबंधक नवीन राय 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "ऐसा देखने में आता है कि एफपीओ से जुड़े नजरिये को पूरी तरह से लागू करने में समस्याएँ आती हैं, ऐसे में जमीनी स्तर पर खामियां हो सकती हैं, समस्याएँ हो सकती हैं, कई एफपीओ खुलने के कुछ साल बाद बंद हो जाते हैं, मगर नाबार्ड बंद हो चुकीं ऐसी एफपीओ को दोबारा जीवन देने की दिशा में भी काम कर रहा है।"

सरकार की ओर से देश में 10 हजार नए एफपीओ खोले जाने की घोषणा को लेकर उप महा प्रबंधक नवीन राय बताते है, "नए किसान उत्पादक संगठन खोले जाने की दिशा में सरकार के कार्यक्रम में एफपीओ को लेकर किसानों के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान तैयार किया जा रहा है, इसमें नाबार्ड के जिला विकास प्रबंधक भी किसान गोष्ठियों, कृषि बैठकों और तमाम तरीकों से नए किसानों को एफपीओ से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि नए छोटे और सीमान्त किसानों को फायदा मिल सके।"

नए किसान उत्पादक संगठन खोले जाने की दिशा में सरकार के कार्यक्रम में एफपीओ को लेकर किसानों के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान तैयार किया जा रहा है, इसमें नाबार्ड के जिला विकास प्रबंधक भी किसान गोष्ठियों, कृषि बैठकों और तमाम तरीकों से नए किसानों को एफपीओ से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि नए छोटे और सीमान्त किसानों को फायदा मिल सके।

नवीन राय, उप महा प्रबंधक, नाबार्ड कोलकाता

बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के तीन लाख 30 हजार किसानों के साथ काम रही देहात संस्था किसानों को बीज खाद, तकनीकी और उपज खरीदने का काम करती है यानी एक तरह की समझौता खेती है।

जमीनी स्तर पर एफपीओ से जुड़ी खामियों को लेकर 'देहात' के सहायक उपाध्यक्ष हिमांशु पाण्डेय 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "ऐसे देखने में आता है कि त्वरित फायदे के लिए आढ़तियों और अधिकारियों ने एफपीओ खोल लिए, मगर ऐसे एफपीओ के पास कभी भी किसानों का संख्या बल नहीं रहेगा, किसान नहीं जुड़ेंगे और न ही कंपनियां, मगर ज्यादातर एफपीओ आज न सिर्फ छोटे किसानों को अच्छी कीमत दिला पा रहे हैं, बल्कि किसानों को कई सुविधाएँ भी मिल रही हैं।"

हिमांशु कहते हैं, "नए कृषि कानूनों के जरिये अब जहाँ एफपीओ से जुड़े किसान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का फायदा उठा सकेंगे, बल्कि उनके लिए बाजार के कई विकल्प भी खुल गए हैं। अन्य कंपनियों को भी एफपीओ के जरिये समूह में किसान मिल सकेंगे, ऐसे में ये कंपनियां बड़ी मात्रा में उपज ले सकेंगी। एफपीओ से जुड़े किसान मंडी के बाहर भी अपनी उपज बेहतर दामों में बेच सकेंगे, तो निश्चित रूप से छोटे किसानों को फायदा मिलेगा।"

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बिहार के पूर्वी चंपारण के ब्लॉक पहाड़पुर के रघुनाथपुर गांव के रहने वाले जयशिव कुमार तिवारी अत्युत्तम एग्रो प्रोड्यूसर के नाम से साल 2017 से एफपीओ चला रहे हैं और चावल, गेहूं, मक्का, हल्दी, मसूर जैसी फसलों के किसानों के साथ काम कर रहे हैं। इस एफपीओ से अब तक आस-पास के गांव के करीब 850 किसान जुड़े हुए हैं।

जयशिव कुमार बताते हैं, "एफपीओ के लिए हमें सरकार से मदद मिली तो आज हमारे किसानों को भी फायदा मिल रहा है। पहले किसान दुकान से खेती का सारा सामान लेते थे, जो महंगा था, मगर अब अपने किसानों को डीलरों से मंगा कर धान, गेहूं, मक्का जैसी फसलों के अच्छे बीजों को सही दाम में उपलब्ध कराते हैं। इसके अलावा हमने किसानों की उपज को बिचौलियों से बचाकर बाहर बेचने की तैयारी की। इससे किसानों को अब सही कीमत मिलने लगी है।"

फिलहाल गाँव कनेक्शन सर्वे के नतीजे बताते हैं कि करीब आधे किसानों को एफपीओ यानी किसान उत्पादक संगठनों के बारे में जानकारी ही नहीं है। ऐसे में नए कृषि कानूनों से कैसे छोटे और सीमान्त किसानों को फायदा मिल सकेगा, यह भविष्य में ही पता चल सकेगा। रैपिड सर्वे में मार्जिंन ऑफ एरर 5 फीसदी है। सर्वे से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट The Rural Report-2: THE INDIAN FARMER'S PERCEPTION OF THE NEW AGRI LAWS गांव कनेक्शन की इनसाइट वेबसाइट www.ruraldata.in पर पढ़ सकेंगे।

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