केदारनाथ त्रासदी के 5 साल : वो मंजर जो भुलाए नहीं भूलता

2013 में 16 जून की शाम और 17 जून की सुबह एक सैलाब केदारपुरी में एक भीषण तबाही मचा गया। हज़ारों लोगों की जानें गई और बहुत सारे तो अभी भी लापता हैं। ये ऐसी त्रासदी थी जिसमें केदार घाटी तकरीबन पूरी तरह तबाह हो गई। भारी बरसात और केदारनाथ से 6 किलोमीटर ऊपर चौराबरी झील के फटने से आया पानी इस विनाशलीला की मुख्य वजह रहा।

केदारनाथ त्रासदी के 5 साल : वो मंजर जो भुलाए नहीं भूलता

केदारनाथ आपदा को 5 साल पूरे हो गये हैं। 2013 में 16 जून की शाम और 17 जून की सुबह एक सैलाब केदारपुरी में एक भीषण तबाही मचा गया। हज़ारों लोगों की जानें गई और बहुत सारे तो अभी भी लापता हैं। ये ऐसी त्रासदी थी, जिसमें केदार घाटी तकरीबन पूरी तरह तबाह हो गई। भारी बरसात और केदारनाथ से 6 किलोमीटर ऊपर चौराबरी झील के फटने से आया पानी इस विनाशलीला की मुख्य वजह रहा।

भैरो मंदिर से केदारनाथ मंदिर का विहंगम नजारा। फोटो- गांव कनेक्शन

राहत कार्य में सबसे पहले जुटने वाले प्राइवेट हेलीकॉप्टर कंपनियों के पायलट थे। उनके साथ जान पर खेले केदार घाटी के स्थानीय लोग। हालांकि उस साल उत्तराखंड की सारी नदियां उफान पर थीं लेकिन अमूमन सौम्य रहने वाली मंदाकिनी अपने सबसे रौद्र रूप में दिखी। केदारनाथ से लेकर रुद्रप्रयाग और श्रीनगर तक बर्बादी हुई। बद्रीनाथ से आने वाली अलकनंदा भी भीषण उफान में थी । केदारनाथ के अलावा गंगोत्री, बदरीनाथ और यमुनोत्री के इलाकों में भी तबाही हुई । उत्तरकाशी में बीसियों घर और दुकानें ताश के पत्तों की तरह भागीरथी नदी में जा गिरी।

आज 5 साल बाद गांव कनेक्शन उस आपदा में मारे गये लोगों को याद करता है । ये वक्त उस बड़ी लड़ाई का भी है जो हिमालय को बचाने की है। वहां पर्यावरण के विनाश और बर्बादी को रोकने की।विकास के नाम पर ठेकेदारों और नेताओं की लूट पर काबू करने की। स्थानीय लोगों को जंगलों, झरनों और पानी का अधिकार देने की। वहां ग्रामीणों को लिये ऐसे कृषि और रोज़गार के साधन मुहैया कराने की ज़रूरत है जिससे उनका जीवन खुशहाल हो और पहाड़ फिर से बस सकें। 70 के दशक में नारा था "हिमालय बसाओ" आज हिमालय से पलायन रोकने और बसाने की ज़रूरत है, लेकिन पहाड़ को तोड़कर नहीं बल्कि उसे जोड़ कर।

आंखों देखी- 6 दिन तक एक स्कूल में फंसे रहे यात्री की जुबानी

केदारानाथ देश के चार धाम में से एक हैं। देश विदेश से लाखों यात्री हर साल बाबा केदारनाथ के दरबार पहुंचते हैं। 2013 में यूपी के बाराबंकी जिले से भी यात्रियों से भरी 3 बसे चार धाम यात्रा के लिए निकली थीं। सूरतगंज ब्लॉक के टांड़पुर गांव में रहने वाले रामसांवले शुक्ला अपनी पत्नी राजकुमारी शुक्ला के साथ तीर्थ यात्रा पर निकले थे। उनकी यात्रा का अगला पड़ाव केदारनाथ घाटी थी। लेकिन 16 जून की शाम से बारिश शुरु हो गई। वो बताते हैं,

हम लोग केदारनाथ से करीब 1-2 घंटे की दूरी पर थी, लेकिन बारिश के चलते पहाड़ टूटने (लैंड स्लाइडिंग) होने लगी। सड़क संकरी थी, लंबा जाम लग गया था। पहले तो बताया गया ये सब यहां चलता ही रहता। हम सबको उत्तरकाशी की एक तहसील में रोक दिया गया था, वहां एक स्कूल में हजारों यात्री पहले से शरण लिए थे। जैसे-जैसे बड़े हादसे की जानकारी हुई डर लगने लगा था।"


वो आगे बताते हैं, रात में हम लोगों ने देखा कि पानी का सैलाब आ रहा था, बड़े-बड़े घर गिर गए थे, पानी के साथ सामान, टीन, गैस सिलेंडर बहते देखे। कुछ समय बाद बिजली चली गई थी, फोन भी काम नहीं कर रहे थे, 17 तारीख को काफी देर बाद पता चला कि बाबा केदारनाथ के यहां बहुत नुकसान हुआ है। हम लोग 6 दिन तक वहीं फंसे रहे। कुछ खानेपीने का सामान हमारे पास था, सरकार की तरफ से सुबह शाम नास्ता और खाना मिलता था। कई बार लगा की शायद घर न पहुंच पाएं। साथ के कई यात्री बहुत डर गए थे, बस भगवान का स्मरण करते रहे। कई दिन बाद सड़के बनीं, जाम खुला। बहुत नुकसान हुआ था।'

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