गाँव कनेक्शन गाँवों को जोड़ रहा है, वो छिपाते रहेंगे आप छापते रहिए : रवीश कुमार

गाँव कनेक्शन गाँवों को जोड़ रहा है, वो छिपाते रहेंगे आप छापते रहिए : रवीश कुमाररवीश कुमार गाँव और किसानों के मुद्दे उठाते हैं।

टीवी पत्रकारिता में अपनी अलग छवि के लिए पहचाने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार गाँव कनेक्शन के पांच साले होने पर बधाई देते हुए कहते है कि " पांच साल से गाँव कनेक्शन छपता आ रहा है, बड़ी बात है। आम तौर पर ऐसे प्रयास लंबी दूरी तय नहीं कर पाते हैं। पांच साल का फ़ासला पच्चीस साल के बराबर है। इसकी टीम ने कम संसाधनों में बने रहने का हौसला क़ायम रखा है। मीडिया में अपवाद स्वरूप प्रयोग ही रह गए हैं। जो मुख्यधारा है वह महानगरों की तरह अहंकार का शिकार है। किसी तरह बचे रहने का जुगाड़ हो चुका है। गाँव कनेक्शन गाँवों को जोड़ रहा है। वो छिपाते रहेंगे आप छापते रहिए। पूरी टीम को बधाई।"

रवीश कुमार का गांव से गहरा नाता है। रवीश कुमार का जन्म बिहार के पूर्व चंपारन जिले के मोतीहारी में गांव जितवारपुर में 5 दिसंबर 1974 को हुआ। उन्होंने लोयोला हाई स्कूल, पटना से पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए देश की राजधानी दिल्ली गए। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद भारतीय जन संचार संस्थान से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया।

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रवीश कुमार इस समय एनडीटीवी इंडिया के वरिष्ठ कार्यकारी संपादक है। एनडीटीवी पर इनका शो ‘प्राइम टाइम काफी पसंद किया जाता है। इससे पहले रविश की रिपोर्ट के माध्यम से उन्होंने पत्रकारिता में अपनी नई पहचान बनाई। रवीश कुमार NDTV India से लगभग 15 साल से जुड़े हैं।

रवीश सरोकार की पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। इनका पत्रकारिता करने अंदाज बिलकुल अलग है। वे अपने भाषा में अक्सर ‘बाबू जी’, ‘मां’, ‘बाग-बगीचे’, ‘खलिहान’, ‘बरहम बाबा’, ‘पोखर’, ‘छठी माई’, ‘नारायणी नदी’, ‘गौरैया’ आदि का जिक्र करते रहते हैं। इसके आलावा रवीश अपने ब्लॉग 'कस्बा' पर भी अपने बात की लिखते हैं।

गाँवों से रवीश कुमार को कितना प्यार है ये उनकी ये कविता से समझा जा सकता है...

हर शहर को गांव सा भूल गया हूं

जाने कितने शहरों से गुज़र चुका हूं

अपने गांव से बहुत दूर निकल चुका हूं

लौटना मुश्किल है अब किसी शहर में

हर पुराने शहर को गांव सा भूल गया हूं

रहता हूं जिस मकान में, दाम पूछता हूं

रविवार के अख़बार में खरीदार ढूंढता हूं

आने से पहले ही हो जाती है उससे बातें

आते ही कभी घड़ी कभी मोबाइल देखता हूं

अस्थायी मकानों के बीच किस कदर बंट गया हूं

चिट्ठी तो पहुंचे इसलिए स्थायी पता ढूंढता हूं

रवीश कुमार कहते हैं कि दिल्ली शहर में कोई भी यात्रा बिना किसी गाँव से गुज़रे पूरी नहीं हो सकती है। आप बिना दो चार गाँवों को क्रास किए हवाई अड्डा तक नहीं पहुंच सकते हैं। आज भी दिल्ली में तीन सौ से अधिक गाँव हैं। कितने गाँवों का वजूद मिट गया, उसका तो हिसाब नहीं। दिल्ली का इतिहास राजा-महाराजा, बादशाहों-वायसरायों का है। गाँव का क्यों नहीं है?

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मीडिया में गाँवों की तस्वीर छोटी होती जा रही है। इस मुद्दे पर रवीश कुमार अपने ब्लॉग कस्बा पर लिखते हैं " टीवी में तो ग्राउंड रिपोर्टिंग खत्म ही हो गई है। इक्का दुक्का संवाददाताओं को ही जाने का मौका मिलता है और दिन भर उन पर लाइव करने का इतना दवाब होता है कि वे डिटेल में काम ही नहीं कर पाते हैं। जब तक वे रिपोर्ट बनाने की नौबत आती है, चैनल को उनकी ज़रूरत ही समाप्त हो चुकी होती है क्योंकि बहस की बकवासबाज़ी का वक्त हो चुका होता है। कुछ रिपोर्टर इसी में अच्छा काम कर जाते हैं और बहुत से यही रोने में अपनी प्रतिभा निकाल देते हैं कि क्या करें ये करें कि वो करें।"

अखबारों में किसानों की उपस्थिति घटती जा रही है। बड़े-बड़े मीडिया घराने किसानों की समस्याओं को तरजीह नहीं देते। इस पर रवीश लिखते हैं "आप इंडियन एक्सप्रेस के हरीश दामोदरन की खेती-किसानी पर रिपोर्ट पढ़ सकते हैं। हरीश जी बहुत ही शानदार रिपोर्टिंग कर रहे हैं। हिन्दी के युवा पत्रकारों को उन्हें फोलो करना चाहिए। हिन्दी के भी पत्रकार करते हैं मगर अखबार का चरित्र ही ऐसा है कि वे भी क्या करें।

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हिन्दी पत्रकारों के बीच अंग्रज़ी अख़बारों की कुलीनता का मज़ाक उड़ाया जाता है लेकिन आप ही बताइये कि इंडियन एक्सप्रेस के THE RURAL पेज की तरह कौन सा हिन्दी अख़बार खेती-किसानों को इस तरह जगह देता है। गांव कनेक्शन जैसा अखबरा पूरी तरह से खेती-किसानी पर ही समर्पित है मगर कितने हिन्दी भाषी पत्रकार उसे पढ़ते हैं या उसकी ख़बरों को साझा करते हैं। सिर्फ रो देने से नहीं होता है। काम भी करना पड़ता है।"

आगे कहते हैं "दिल्ली महानगर के किसी भी पॉश मोहल्ले की तरफ जाइए, उसके पीछे एक गाँव मिलेगा। बहुत दिनों तक ये गाँव दिखते थे मगर अब ये गाँव दिखने भी बंद हो गए हैं। अब बहुत कम लोग पगड़ी बांधे, धोती पहने निकलते दिखाई देते हैं। गाँवों के भीतर का पूरा जीवन शहरी हो गया है। पहले यहां किसान रहते थे अब किरायेदार आ गए हैं। ज़मीन के मालिक मकानों के मालिक हो गए। दिल्ली का कोई भी मीडिया इन गाँवों को गाँव समझ कर कवर नहीं करता है।

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इस देश में गाँव होने का मतलब है किसी शहर के लिए मिट जाना। कोई विकास प्राधिकरण आता है और तीन चार सौ गाँव निगल जाता है। ऐसे में पांच साल से गाँव कनेक्शन छपता आ रहा है, बड़ी बात है। आम तौर पर ऐसे प्रयास लंबी दूरी तय नहीं कर पाते हैं। पांच साल का फ़ासला पच्चीस साल के बराबर है। इसकी टीम ने कम संसाधनों में बने रहने का हौसला क़ायम रखा है। मीडिया में अपवाद स्वरूप प्रयोग ही रह गए हैं। जो मुख्यधारा है वह महानगरों की तरह अहंकार का शिकार है। किसी तरह बचे रहने का जुगाड़ हो चुका है। गाँव कनेक्शन गाँवों को जोड़ रहा है। वो छिपाते रहेंगे आप छापते रहिए। पूरी टीम को बधाई।"

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