केदारनाथ त्रासदी के 5 साल: कहर सा वो दिन

16 जून 2013 को केदारनाथ में मौजूद हर शख्स सुबह से ही डरा हुआ था। बरसात पिछले 3 दिन से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। इस इलाके में कई सालों से रह रहे लोगों ने भी आसमान से इतना पानी एक साथ बरसते कभी नहीं देखा था। शाम को मंदिर की आरती से ऐन पहले जो हुआ उसे याद कर आज भी दिल दहल उठता है

केदारनाथ त्रासदी के 5 साल: कहर सा वो दिन




तारीख - 17 जून, 2013

समय – सुबह करीब 6।30 बजे

उसके मोबाइल फोन की घंटी बजी। इतनी सुबह अमूमन उसे कोई फोन नहीं आता था।

इस वक्त आखिर कौन हो सकता है? उसने सोचा।

फोन उठाया तो दूसरी ओर चीख पुकार मची हुई थी।

एक बेहद घबराई आवाज़ उसके कानों में पड़ी।

"सर यहां पानी बहुत बढ़ रहा है। हर ओर पानी भर चुका है। प्लीज़ मुझे यहां से निकाल लीजिए। जल्दी करो सर नहीं तो मैं मर जाऊंगा।"

हेरिटेज एविएशन के रोहित माथुर को केदारनाथ के इलाके में तीर्थयात्रियों के लिए हेलीकॉप्टर सेवा चलाते 5 साल से अधिक वक्त हो गया था लेकिन अपने किसी साथी की ऐसी घबराई आवाज़ अब तक नहीं सुनी थी। ये फोन केदारनाथ में काम कर रहे एक ग्राउंड स्टाफकर्मी कल्पेश्वर शुक्ला का था। शुक्ला 3 दिनों से खराब मौसम के कारण केदारनाथ में फंसा हुआ था और अभी उसकी आवाज़ में भयानक डर और बिलबिलाहट थी।

'हमें निकालिए सर.. जल्दी कीजिए …' केदार घाटी में पिछले 40 घंटों से लगातार बारिश हो रही थी और यहां बहने वाली मंदाकिनी अपने सामान्य स्तर से कई फीट ऊपर बह रही थी।

"शुक्ला की आवाज़ में ज़बरदस्त डर था और उस वक्त मैं समझ नहीं पाया कि आखिर वो इतना घबराया हुआ क्यों है? मैंने उसे भरोसा दिलाया कि जैसे ही मौसम ठीक होता है उसे निकालने के लिए हेलीकॉप्टर तुरंत उड़ाएंगे" ये बात रोहित ने मुझे अपने हेलीकॉप्टर सर्विस के बेस शेरसी में बताई। यहीं से रोहित की कंपनी हेरिटेज एविएशन केदारनाथ के लिए हवाई सेवा चलाती है। लेकिन केदारनाथ से कोई 25 किलोमीटर दूर शेरसी में मौसम खराब होने के बावजूद रोहित और उनके साथियों को ये अंदाज़ा नहीं हुआ कि केदारनाथ में मौत का तांडव चल रहा था। बारिश रुकने के बाद अगले दिन जब रोहित और उनके साथी केदारनाथ के लिए उड़े तो उन्हें पता चला कि आखिर हुआ क्या है।


कल्पेश्वर शुक्ला कभी वापस नहीं आया

कल्पेश्वर शुक्ला कभी वापस नहीं आया। केदारनाथ में आई बाढ़ उसे निगल गई। उसकी तरह हज़ारों लोगों का यही हाल हुआ जिन्हें या तो मंदाकिनी बहा ले गई या फिर वो पहाड़ों के नीचे दब गए। उस दिन तो जैसे पूरा केदारनाथ जलसमाधि ले चुका था। जो कुछ भी पानी के रास्ते में आया उसे मौत बहा ले गई।

केदारनाथ समुद्र सतह से 11,800 फुट की ऊंचाई पर बसा हुआ है और इसके पीछे हिमालय की पूरी एक पर्वत श्रृंखला दिखाई देती है। इतनी ऊंचाई पर पेड़ पौधे तो होते नहीं लेकिन 1000 साल से भी अधिक पुराना ये मंदिर कई नदियों और झीलों से गिरा हुआ है। इस इलाके के एक चौथाई हिस्से पर ग्लेशियर ही हैं। अगर आप केदारनाथ मंदिर के सामने उसे देखते हुए खड़े हो जाएं तो आपको मंदाकिनी अपने बाईं ओर बहती मिलेगी। मंदाकिनी नदी केदारनाथ मंदिर के पीछे दिख रहे चौराबरी ग्लेशियर से ही निकलती है। इन्हीं ग्लेशियरों के बीच एक झील है जिसे चौराबरी लेक या गांधी सरोवर भी कहा जाता है।

दो प्रमुख सहायक नदियां मधुगंगा और दूधगंगा भी मंदाकिनी से यहीं मिलती हैं, और ये संगम केदारनाथ मंदिर से बहुत दूर नहीं हैं। ये दोनों ही सहायक नदियां केदारनाथ के बाईं ओर बने एक सरोवर से आती हैं जिसे वासुकी ताल कहा जाता है। एक और जलधारा मंदिर के दाहिनी ओर पहाड़ों से निकल कर आती है जिसे सरस्वती के नाम से जाना जाता है। केदारनाथ पहुंच कर सरस्वती का संगम भी मंदाकिनी में हो जाता है। केदारनाथ मंदिर के दाहिनी ओर थोड़ी दूरी पर बसा है भैंरोनाथ मंदिर।

केदारनाथ में आई प्राकृतिक आपदा के बाद तुरंत किसी को भी समझ नहीं आया कि आखिर इतना बड़ा संकट किस वजह से आ गया। कयास तो बहुत लगाए गए लेकिन पुख़्ता वजह किसी को पता नहीं थी। मैं घटना के कई हफ्तों बाद तक कई लोगों से इस बारे में बात करते रहा। आपदा के वक्त केदारनाथ में मौजूद रहे चश्मदीदों के अलावा देश के जाने माने इतिहासकार, वैज्ञानिक, भूगर्भशास्त्री और आपदा विशेषज्ञ सबके साथ मैंने बात की। आज हमारे पास कुछ तर्कपूर्ण विश्लेषण हैं जो ये बताते हैं कि उस दिन कैसे ये सब हो गया। लेकिन बारीकियों में जाएं तो अब भी वैज्ञानिक और भूगर्भशास्त्री किसी एक नतीजे पर नहीं पहुंचे पाए हैं। जो भी विश्लेषण उपलब्ध है उसे समझने के लिए उस दिन केदारनाथ में मची तबाही में क्या-क्या हुआ इसे क्रमवार जानना भी ज़रूरी है। केदारनाथ ही नहीं नदी के बहाव के साथ आगे बढ़ते हुए रामबाड़ा, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, चंद्रापुरी, अगस्त्यमुनि और श्रीनगर जैसे इलाकों में भी कुदरत ने जमकर तबाही मचाई। इस पूरे इलाके में बरबादी तो केदारनाथ में आई बाढ़ से पहले ही शुरू हो गई थी। उत्तराखंड में कई जगह बड़े-बड़े भूस्खलन हुए, रास्ते कट गए और पुल टूट गए। ये तबाही किसी एक दिन आई बाढ़ से नहीं हुई बल्कि दो-तीन दिन तक अलग-अलग जगह पूरे राज्य में तांडव होता रहा। केदारनाथ में हुई बरबादी तकरीबन 24 घंटे की टाइमलाइन पर बिखरी हुई है।

रविवार, 16 जून - केदारनाथ में मौजूद हर शख्स सुबह से ही डरा हुआ था। बरसात पिछले 3 दिन से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। इस इलाके में कई सालों से रह रहे लोगों ने भी आसमान से इतना पानी एक साथ बरसते कभी नहीं देखा था। लगातार हो रही बरसात का असर अब दिखने लगा था। 16 तारीख की सुबह भैंरोनाथ के मंदिर वाली पहाड़ी टूटने लगी। वहां से भूस्खलन शुरू हो गया और केदारनाथ से भैंरो मंदिर जाने वाला मार्ग बंद हो गया।




केदारनाथ में पिछले कुछ दिनों से एक धरना और हड़ताल चल रही थी। ये हड़ताल यहां कुछ प्राइवेट कंपनियों की ओर से दी जाने वाली हेलीकॉप्टर सेवा के विरोध में थी। ये हेलीकॉप्टर सेवा उन लोगों के लिए थी जो गौरीकुंड से केदारनाथ तक का रास्ता पैदल या घोड़ों और पालकियों की मदद से तय करना नहीं चाहते। घोड़े वालों का कहना था कि हेलीकॉप्टर सेवा चलने से उनका नुकसान हो रहा है। कुछ स्थानीय नेताओं ने इस हड़ताल में पर्यावरण का मुद्दा भी जोड़ दिया और ये शिकायत की कि हेलीकॉप्टरों से घाटी में शोर बढ़ रहा है और इससे यहां के संवेदनशील इलाके में वन्य जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

16 जून को जब पहली बार केदारनाथ में बाढ़ आई तो सबसे पहले ये हेलीपैड ही खत्म हुआ जिस पर धरना चल रहा था। पूरा का पूरा हेलीपैड धंस गया और नदी उसे मिनटों में बहा ले गई। इस समय केदारनाथ के आसपास के इलाके में सारी नदियां उफान पर थीं। वासुकी ताल से आने वाली दूध गंगा और मधु गंगा अपने सामान्य स्तर से कई फुट ऊपर बह रहीं थीं। यही हाल मंदाकिनी और दूसरी नदियों का भी था। दोपहर होते होते इन नदियों का पानी केदारनाथ को देश के बाकी हिस्से से जोड़ने वाले दो पुलों के ऊपर से बहने लगा। हालात बद से बदतर होते जा रहे थे।

35 साल का रघुबीर सिंह बिष्ट उस दिन केदारनाथ में ही था। श्रीनगर का रहने वाला ये नौजवान यात्रा सीज़न के वक्त हर साल ज़िला पंचायत की ओर से लीज़ पर दिया गया गेस्ट हाउस चलाता और ये उसके व्यापार का बड़ा हिस्सा था। रघुबीर ने उस दिन तबाही के कुछ वीडियो अपने मोबाइल में रिकॉर्ड किए। बाद में रघुबीर ने सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक पर उस दिन का आंखों देखा हाल भी लिखा। जब मैंने रघुबीर से श्रीनगर में मुलाकात की तो उसने बताया कि केदारनाथ में जो कुछ उसने देखा और झेला उसे याद करने के बाद इस बात का भरोसा ही नहीं होता कि वो ज़िंदा है। लेकिन उस दिन उसने अपने होशोहवाश पर काबू रखा और ना केवल अपनी बल्कि कई दूसरे लोगों की जान बचाई। बाद में रघुबीर ने मुझे बताया - 'कई दिन बाद जब पहली बार मैंने अपनी पत्नी से फोन पर बात की तो उस यकीन नहीं हो रहा था कि मैं ज़िंदा हूं। वो बहुत देर तक रोती रही और फोन पर दूसरी ओर मैं मुस्कुराता रहा फिर अचानक मेरी आंखों से आंसू बहने लगे और मुझे लगा क्या मैं वाकई ज़िंदा हूं।'

35 साल का रघुबीर सिंह बिष्ट उस दिन केदारनाथ में ही था।

उस दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी और लोग अपने अपने होटलों और गेस्ट हाउसों के अंदर ही रुके रहे। बाहर निकलना बिल्कुल नामुमकिन था। केदारनाथ में पहली बार ज़बरदस्त बाढ़ 16 तारीख की शाम को आई। शाम को मंदिर में होने वाली आरती से ठीक पहले। ये रविवार का दिन था। बाढ़ अपने साथ बहुत सारा कीचड़ और बालू लेकर आई और मंदिर के पास बना हेलीपैड बह गया। ये शाम 6:50 की बात है। ये इतनी ज़बरदस्त बाढ़ थी कि जहां से पानी गुजरा वहां कुछ बचा ही नहीं। मैंने पानी के कम होने पर बस 3 लोगों को और कुछ जानवरों को बाहर निकलते देखा।

बरसात बिल्कुल नहीं रुक रही थी। लोग होटल के कमरों में इकट्टा होते रहे। ये सब कुछ देखने के बाद वो बाहर रहना नहीं चाहते थे। सारी दुकानें बंद हो चुकी थीं। रघुबीर का गेस्ट हाउस भी स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों से खचाखच भर चुका था। रघुबीर और ये तीर्थयात्री खुशकिस्मत थे कि वो सब मंदिर के बाईं ओर मंदाकिनी नदी के पार (नदी के बहाव के दाईं ओर) मौजूद थे। यहां पानी की मारक क्षमता उतनी नहीं थी जितनी मंदिर की तरफ। रघुबीर के मुझे बताया, " गेस्टहाउस में सारे कमरे खचाखच भर चुके थे। कहीं कोई जगह बची नहीं थी। जहां तक मुझे याद है हर कमरे में 30 से 35 लोग भरे होंगे। तभी एक बहुत ज़ोर की आवाज़ आई। मंदिर की ओर से। हमें कुछ समझ में नहीं आया कि ये हुआ क्या। तब मैंने मंदिर के पास मौजूद अपने एक दोस्त को फोन लगाया और उससे पूछा कि आखिर हुआ क्या है। उसने कहा कि केदारनाथ में नदी के ऊपर बने दो पुल बह गए हैं। यानी हमारा मंदिर के साथ ज़मीनी संपर्क कट गया था। शंकरचार्य की 8 वीं शताब्दी में बनी समाधि भी खत्म हो गई। इसके अलावा शंकराचार्य की दो प्रतिमाएं, एक स्फटिक लिंग और एक हनुमान की मूर्ति भी बह चुकी थी। इस सारे ढ़ांचों के अवशेष इक्का-दुक्का जगह बचे थे। कई सारे आश्रमों का भी कुछ पता नहीं था। तो यही थी रविवार शाम 16 जून को हुई वो तबाही जिसका ज़िक्र मंदिर के पुजारी रवीन्द्र भट्ट ने हमसे तिलवाड़ा में किया था। केदारनाथ मंदिर परिसर मिनटों में पानी से लबालब भर गया था और बीसियों लोग इसमें डूब गए।

(2013 की केदारनाथ आपदा पर हृदयेश जोशी कि पुस्तक "तुम चुप क्यों रहे केदार " के अंश। यह पुस्तक अंग्रेजी में पेंग्विन द्वारा 'Rage Of The River, The Untold Story of The Kedarnath Disaster' के नाम से प्रकाशित हो चुकी है। हृदयेश जोशी एनडीटीवी इंडिया से जुड़े हैं )

यह भी देखें: केदारनाथ त्रासदी के 5 साल : वो मंजर जो भुलाए नहीं भूलता

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