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उत्तरी राज्यों में कोरोना पॉजिटिव मिले ग्रामीणों में से 69 फीसदी ने किया स्वयं उपचार, जानिए क्या कहता है ग्रामीण सर्वे

ग्रामीण भारत में कोरोना वायरस के प्रसार के बारे में जानकारी के लिए गाँव कनेक्शन के सर्वे में कई रोचक आंकड़े निकल कर सामने आये हैं। सर्वे में सामने आया कि उत्तरी राज्यों में कोरोना संक्रमित पाए गए ज्यादातर ग्रामीणों ने सरकारी या निजी अस्पताल में इलाज कराने के बजाए घर पर ही रहकर स्वयं उपचार किया। पढ़िए रिपोर्ट ...

Kushal MishraKushal Mishra   11 Jan 2021 2:51 PM GMT

उत्तरी राज्यों में कोरोना पॉजिटिव मिले ग्रामीणों में से 69 फीसदी ने किया स्वयं उपचार, जानिए क्या कहता है ग्रामीण सर्वेगाँव कनेक्शन सर्वे में सामने आया कि उत्तरी राज्यों में ज्यादातर ग्रामीणों ने कोरोना पॉजिटिव आये घर के सदस्य का स्वयं उपचार किया। फोटो : गाँव कनेक्शन

ग्रामीण भारत में कोरोना वायरस के प्रसार के बारे में पता लगाने के लिए देश के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया प्लेटफार्म गाँव कनेक्शन के सर्वे में कई दिलचस्प निष्कर्ष सामने आये हैं। इस सर्वे में सामने आया कि उत्तरी राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना पॉजिटिव मिले लोगों में से 69 फीसदी ने कोरोना वायरस के इलाज के लिए अस्पताल में जाने की बजाए घर पर रहकर स्वयं उपचार किया।

स्वयं उपचार लेने वाले कोरोना पॉजिटिव आए इन राज्यों के ग्रामीणों का आंकड़ा अन्य किसी क्षेत्रीय राज्यों से कहीं ज्यादा था। पूर्वी-उत्तरी राज्यों में स्वयं उपचार करने वाले ग्रामीणों का यह आंकड़ा जहाँ 11 फीसदी था, वहीं पश्चिमी राज्यों में यह आंकड़ा सिर्फ सिर्फ चार फीसदी था, जबकि दक्षिणी राज्यों में कोरोना पॉजिटिव मिलने वालों में से करीब 8 फीसदी ग्रामीणों ने स्वयं उपचार किया। सबसे ज्यादा उत्तरी राज्यों में कोरोना पॉजिटिव आए ग्रामीणों में से 69 फीसदी ने स्वयं उपचार किया।

स्वयं उपचार करने वालों का यह आंकड़ा आखिर उत्तरी राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में ही क्यों सबसे ज्यादा रहा और अन्य क्षेत्रीय राज्यों में कम? आखिर क्यों कोरोना के इलाज के लिए उन्होंने अस्पताल जाने के बजाए खुद ही इलाज करना बेहतर समझा? गाँव कनेक्शन ने ग्रामीणों से बातचीत कर इनके पीछे छिपे कारणों को जानने की कोशिश की।

झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम के गोलमुरी तहसील के कालीमाटी गांव की रहने वाली पूजा स्वर्णकार आशा वर्कर हैं। पिछले साल अगस्त में पूजा के परिवार में पति और उनकी बेटी समेत पूजा कोरोना वायरस से संक्रमित पाई गयी थीं।

आशा वर्कर पूजा स्वर्णकार 'गाँव कनेक्शन' से बताती हैं, "बुखार आने पर हम तीनों टेस्ट कराने के लिए हॉस्पिटल गए थे, तीनों कोरोना पॉजिटिव आये तो उस समय अस्पताल से ही हम लोगों को 14 दिन होम क्वारंटाइन के लिए बोला गया। हमें कुछ दवाएं भी दी गयीं। मगर हम लोग घर पर रहे और खुद से ही काढ़ा और दूसरी घरेलू दवाएं खाते-पीते रहे, हम लोगों ने घर पर खुद से ही पूरा ट्रीटमेंट किया।"

क्या अस्पताल से हालचाल लेने के लिए आप लोगों को फ़ोन कर पूछा गया था ? के सवाल पर पूजा स्वर्णकार कहती हैं, "कोविड से जुड़े कॉल सेण्टर के लोग हमें फ़ोन कर पूछते क्योंकि सरकार की ओर से हमें दवाएं भी मिली थीं, मगर ज्यादातर हम लोगों ने घरेलू उपचार किया और साथ ही रहे, फिर दूसरी बार जब डॉक्टर के पास गए और उन्होंने दोबारा टेस्ट किया तो हम लोग नेगेटिव आये।"

पूजा स्वर्णकार के मुताबिक, उनके गाँव में कुल छह लोग टेस्ट में कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे और तब उन्हें भी होम क्वारंटाइन के लिए बोला गया था।


अस्पताल में जाकर इलाज क्यों नहीं कराया? के सवाल पर पूजा कहती हैं, "गाँव के अस्पताल में क्वारंटाइन होने की भी अच्छी व्यवस्था नहीं थी, जो वहां हम लोगों का इलाज हो सके। इसलिए हम लोग घर पर ही रहकर अपना इलाज किये, खुद से काढ़ा और बुखार की जरूरी दवाएं लेते रहे।"

ग्रामीण भारत में कोरोना वायरस के प्रसार के बारे में पता लगाने और कोविड वैक्सीन को लेकर ग्रामीणों के नजरिये के बारे में जानने के लिए देश के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया प्लेटफार्म गाँव कनेक्शन ने एक से दस दिसम्बर के बीच 16 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 60 जिलों में 6040 ग्रामीणों के बीच फेस टू फेस सर्वे किया। राज्यों का चयन कोरोना संक्रमण के प्रसार पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार किया गया। सर्वे का मार्जिन ऑफ एरर 5 फीसदी है और सर्वे की विस्तृत रिपोर्ट www.ruraldata.in पर पढ़ सकते हैं।

सर्वे में एक चौथाई से ज्यादा करीब 26 फीसदी (1567) ग्रामीणों ने कहा कि उनके परिवार में किसी न किसी सदस्य का कोविड-19 टेस्ट किया गया, जबकि सर्वे में शामिल कुल ग्रामीण परिवारों में 15 फीसदी (919) परिवारों का कोई सदस्य कोरोना संक्रमण का शिकार हुआ।

कोरोना महामारी से जुड़े एक सवाल में जब ग्रामीण उत्तरदाताओं से पूछा गया कि आप कोरोना पॉजिटिव मिले घर के सदस्य को इलाज के लिए कहाँ ले गए? तो 66.5 फीसदी ग्रामीणों ने कहा कि सरकारी अस्पताल ले गए, जबकि 11.2 % ग्रामीण उत्तरदाताओं ने कहा कि निजी अस्पताल ले गए। इसके अलावा 4.9 फीसदी ग्रामीण कोरोना पॉजिटिव अपने घर के सदस्य को झोलाछाप डॉक्टर के पास ले गए, तो 7.2 फीसदी आयुर्वेद डॉक्टर के पास वहीं 10.2 फीसदी ग्रामीणों ने कहा कि कोरोनो पॉजिटिव मिले घर के सदस्य का स्वयं उपचार किया।

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गौर करने वाली बात यह है कि स्वयं उपचार करने वाले ग्रामीणों का यह आंकड़ा उत्तरी राज्यों में सबसे ज्यादा रहा। उत्तरी राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा) में 69 फीसदी ने स्वयं उपचार किया तो पूर्वी-उत्तर पूर्वी राज्यों (ओडिशा, असम, पश्चिम बंगाल और अरुणाचल प्रदेश) में यह आंकड़ा करीब 11 फीसदी रहा। इसके बाद दक्षिणी राज्यों (केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक) में यह आंकड़ा करीब आठ फीसदी और पश्चिमी राज्यों (महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश) में करीब 4.3 फीसदी रिकॉर्ड किया गया।

झारखण्ड के जमशेदपुर जिले में ग्रामीण इलाकों से सटे बिरसा नगर बस्ती में रहने वाली सीमा दुबे की 50 वर्षीय सास शशि कला दुबे भी अक्टूबर में कोरोना संक्रमण का शिकार हुईं। उनके परिवार में कुल पांच लोग रहते हैं।

शशि कला 'गाँव कनेक्शन' से बताती हैं, "अक्टूबर में मेरी सास का एक प्राइवेट अस्पताल में पथरी का ऑपरेशन होना था, मगर डॉक्टर ने पहले कोविड टेस्ट के लिए बोला। तब टेस्ट में मेरी सास की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गयी, मगर हम लोग इस हालात में नहीं थे कि अस्पताल में उन्हें अकेला छोड़ सकें, इसलिए हम लोग डॉक्टर्स से परमिशन लेकर उन्हें घर पर ही लेकर आ गए।"

क्या डॉक्टर्स की ओर उन्हें जरूरी दवाएं उपलब्ध कराई गयीं? के सवाल पर सीमा बताती हैं, "हम लोगों को विटामिन सी और एंटीबायोटिक दवाओं को खरीदने के लिए बोला गया, जो हम लोगों ने बाहर से ही खरीदीं और घर पर ही मैंने सास को अलग कमरे में कर खुद से ही इलाज किया। सुबह गर्म पानी, गिलोय का जूस, ताजे फल और खाने में पौष्टिक खाना दिया, एक-दो बार डॉक्टर्स का फ़ोन भी आया मगर जरूरत पड़ने पर ही हम लोगों ने दवाएं दीं। इसके 14 दिन बाद जब हम लोगों ने पूरे परिवार का दोबारा टेस्ट कराया तो रिपोर्ट नेगेटिव आई।"

ऐसे में बड़ी संख्या में ग्रामीण ऐसे भी रहे जिन्होंने टेस्ट में कोरोना पॉजिटिव पाए गए घर के सदस्य का इलाज स्वयं से किया। बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने देसी और घरेलू नुस्खों को ज्यादा तवज्जो दी और जरूरत पड़ने पर दवाओं का सहारा लिया।

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कोरोना महामारी को लेकर गाँव कनेक्शन सर्वे के दौरान ग्रामीणों से यह भी पूछा गया कि क्या शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाले उत्पादों (च्यवनप्राश, गिलोय, काढ़ा, विटामिन की गोलियां आदि) पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं? इस सवाल के जवाब में 49 फीसदी ग्रामीण उत्तरदाताओं ने माना कि हाँ, वे प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाले उत्पादों पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं।

कई ग्रामीणों द्वारा कोरोना संक्रमित घर के सदस्य का स्वयं उपचार करने को लेकर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के अजबपुर ग्राम पंचायत के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सा प्रभारी डॉ. कमल कुशवाहा 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "कोरोना संक्रमण को लेकर अस्पतालों में सभी व्यवस्थाएं की गईं और सरकार की गाइडलाइन्स के अनुसार अस्पतालों में तीन तरह के वार्ड भी बनाये गए जहाँ संक्रमण की व्यापकता के अनुसार मरीजों का इलाज किया जाता रहा।"

"यह सुविधा ग्रामीण स्तर पर सीएचसी लेवल पर भी रही, मगर कई ग्रामीणों ने हॉस्पिटल में इलाज करना उचित नहीं समझा क्योंकि 14 दिन के लिए क्वारंटाइन कर दिए जायेंगे। कई ऐसे केस भी सामने आये कि हॉस्पिटल में क्वारंटाइन किये जाने पर अकेले पड़ने पर कई लोग डिप्रेशन में चले गए और कई की मौत भी हो गयी, मगर ग्रामीण स्तर पर ज्यादातर लोगों ने घर पर ही कोरोना संक्रमित मरीज का स्वयं उपचार किया," डॉ. कमल कुशवाहा बताते हैं।

हालांकि डॉ. कमल कुशवाहा यह भी कहते हैं कि इसके बावजूद प्रशासन की ओर से कोरोना संक्रमित मरीजों की तबियत को लेकर बराबर ट्रैकिंग होती रही और उन्हें होम क्वारंटाइन के बावजूद जरूरी दवाएं भी उपलब्ध कराईं गयीं, मगर इस बीच ज्यादातर ग्रामीणों ने घरेलू उपचार किये, भले ही दवाइयां नहीं खाईं, मगर काढ़ा पिया।

प्रदेश की बड़ी आबादी को देखते हुए ग्रामीण स्तर पर कोरोना टेस्टिंग कितनी प्रभावी रही? के सवाल पर डॉ. कमल कुशवाहा बताते हैं, "अगर मैं इटावा जिले की ही बात करूँ, तो सिर्फ इटावा में ही कोरोना टेस्टिंग को लेकर 15 टीमें रहीं। इनमें से दो शहरों में और बाकी 13 टीमों ने ब्लाक वाइज लोगों की टेस्टिंग की। टेस्टिंग के लिए सरकार ने बाकायदा 15-15 दिन का कैलेंडर बनाया और हर दिन हमें टेस्टिंग के लिए अलग-अलग पेशे से जुड़े लोगों की टेस्टिंग करनी थी। इस बीच उन लोगों का भी टेस्ट किया गया जिन्हें वास्तव में टेस्टिंग की उतनी आवश्यकता नहीं थी। ऐसे में बड़ी संख्या में टेस्ट किये गए।"

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