70 प्रतिशत किसान परिवारों का खर्च आय से ज्यादा, कर्ज की एक बड़ी वजह यह भी, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

70 प्रतिशत किसान परिवारों का खर्च आय से ज्यादा, कर्ज की एक बड़ी वजह यह भी, पढ़ें पूरी रिपोर्टआंकड़े चौंकाने वाले हैं।

लखनऊ। देश के कई राज्यों में आंदोलन चल रहे हैं। आए दिन किसानों की आत्महत्या, कर्ज और खेती से घाटे की ख़बर आ रही हैं, जो ये बताती हैं, देश का किसान परेशान है, खेती घाटे का सौदा है। लेकिन इसी बीच कुछ आंकड़े सामने आए हैं, जो अलग कहानी कहते हैं।

भारत में रहने वाले 9 करोड़ किसान परिवार हर महीने औसतन अपनी आय से ज्यादा खर्च करते हैं। ये एक बड़ा कारण है किसानों को कर्जदार बनाने के लिए। किसानों की होने वाली मौतों में से आधे से ज्यादा का कारण कर्ज ही होता है। इंडिया स्पेंड ने सरकारी आंकड़ों के आधार पर इस पूरे मामले का विश्लेषण किया है।

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आर्थिक रूप से कमजोर ऐसे किसान परिवारों की संख्या साउथ में सबसे ज्यादा है। इन किसानों के अन्य कई प्रकार के भी कर्ज होते हैं जैसे परिवार का हेल्थ इंश्यूरेंस आदि। अतिरिक्त ऋण के कारण परेशानी बढ़ती है। इस कारण किसान अपनी खेती में निवेश नहीं कर पाता। स्वास्थ्य कारणों के लिए बकाया ऋण एक दशक से 2012 तक दोगुने हो गए हैं, और इसी अवधि के दौरान कृषि व्यवसाय के लिए ऋण लगभग आधा हो गया।

इन आंकड़ों से भारत के कृषि संकट की प्रकृति को समझने में मदद मिलती है। हाल के ही दिनों में कई राज्यों में किसानों ने कर्जमाफी और फसलों के उचित के दामों के लिए प्रदर्शन किया था।

6.26 करोड़ ऐसे किसान परिवार जिनके पास एक हेक्टेयर या उससे कम खेती है, वे आपनी आय से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। ये रिपोर्ट 2013 की स्थिति के अनुसार जारी की गई है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) सर्वेक्षण के मुताबिक आंकड़े जारी किए है। वहीं 10 से अधिक हेक्टेयर भूमि वाले 3.5 लाख (0.3.9%) घरों में औसत मासिक आय 41,338 रुपए और व्यय 14,447 रुपए थी। ऐसे में 26,941 रुपए बचते थे।

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एनएसएस के आंकड़े के अनुसार देश में सभी परिचालन वाले लगभग 85% खेतों का आकार दो हेक्टेयर से छोटा है। 8 जून को जारी इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार एक तिहाई भारतीय छोटे और सीमांत किसान संस्थागत ऋण तक नहीं पहुंच पाते। ये भी बड़ा कारण कि किसानों को ऋण छूट का लाभ नहीं मिल पाता।

दक्षिणी भारत के घरों में सबसे ऋणी हैं

कर्ज लेने वाले कृषि परिवारों की बात करें तो आंध्र प्रदेश में कर्ज़दार कृषि घर (93%), तेलंगाना (89%) और तमिलनाडु (82.1%) का सबसे ज्यादा हिस्सा है। जबकि राष्ट्रव्यापी आंकड़ा 52% है। 2015 में 55% किसान आत्महत्याओं के पीछे का प्रमुख कारण ऋण था। 1995 से अब तक 300,000 से ज्यादा भारतीय किसान आत्महत्या कर चुके हैं। ये रिपोर्ट इंडियास्पेंड ने 2 जनवरी, 2017 को जारी की थी।

बढ़ती हुई स्वास्थ्य देखभाल की लागत में कर्ज का बोझ बढ़ गया है

अल्प कृषि आय के अलावा बढ़ती स्वास्थ्य देखभाल की लागत ने किसानों को और कर्जदार बना दिया है। नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवेलपमेंट (नाबार्ड) द्वारा एनएसएसओ डेटा के 2015 के विश्लेषण के अनुसार, स्वास्थ्य कारणों के लिए बकाया ऋण 2002 में 3% से दोगुनी होकर 2012 में 6% तक पहुंच गया। इस बीच कृषि व्यवसाय के लिए ऋण एक दशक में आधे से गिरकर 2002 में 58% से 2012 में 29% तक पहुंच गए। इंडियास्पेंड ने 21 जुलाई 2015 को इसके संबंध में एक जारी किया था।

भूखा पेट पहले खाने की व्यवस्था करता है। भविष्य के लिए बीमा कहां से करवाएगा। सरकार ही तो बीमा प्रचार-प्रसार करवाती है। किसानों की स्थिति बद से बदतर है। किसान के बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंच पा रहे, अन्य जगह खर्च कहां से होगा। सरकार को चाहिए कि वो इस ओर ध्यान दे।
प्रभात सिंह, राष्ट्रीय महासचिव जय किसान आंदोलन, संस्थापक सदस्य स्वराज इंडिया, नई दिल्ली

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लाखों ग्रामीण भारतीयों में लगभग 48% ग्रामीण रात में चिकित्सा कारणों के कारण सफर करते हैं। जबकि शहरी क्षेत्रों के लिए ये आंकड़ा 25% है। भारत में गांवों में रहने वाली लगभग आधी आबादी निजी स्वास्थ्य सेवा का उपयोग करती है, जो कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के मुकाबले चार गुना ज्यादा महंगी होती है। भारत के सबसे गरीब 20% भारतीयों के औसत मासिक व्यय से 15 गुना ज्यादा हो सकती है। इंडियास्पेंड की 16 जुलाई 2016 को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार।

भारत में किसानों की आत्महत्या रिपोर्टिंग की पहल करने वाले रमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता पी साइनाथ रमन ने कहा कि "मैं उन किसानों के घर गया जिन्होंने कर्ज के कारण आत्महत्या कर ली। वहां मैंने पाया कि उनकी आत्महत्या का एक बड़ा कारण स्वास्थ्य सेवाओं के कारण लिया गया उनका कर्ज है।"

सरकार ही तो कहती है कि खुले में शौच न जाएं, बच्चों को पढ़ाएं, स्वास्थ्य का ध्यान दें। ऐसे में इसमें गलत क्या है। आय कोई भी हो, जरूरी खर्च तो किसान करेगा ही न। उसके लिए किसानों को कर्ज लेना पड़ता है।
केदार सिरोही, किसान नेता, आम किसान यूनियन, मध्य प्रदेश

कर्जमाफी समाधान नहीं

हाल ही में, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र ने क्रमशः 36,359 करोड़ रुपए और 30,000 करोड़ रुपए के ऋण माफ करने की घोषणा की है। भारत में 3.1 लाख करोड़ रुपए (49.1 अरब डॉलर) का कर्ज माफी है। ये 2016-17 में देश के सकल घरेलू उत्पाद का 2.6 फीसदी है। हालांकि, कृषि ऋणग्रस्तता पर 2007 विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट के मुताबिक, ऋणग्रस्तता एक लक्षण है और भारत के कृषि संकट का मूल कारण नहीं है। अर्थशास्त्री आर राधाकृष्ण द्वारा आयोजित समूह ने बताया कि औसत कृषि घरों में उधार लिया गया "अत्यधिक" नहीं था, और कारकों पर दोष लगाया जैसे कि "कृषि में स्थिरता, उत्पादन और बाजार जोखिम बढ़ाना, संस्थागत वैक्यूम और वैकल्पिक आजीविका के अवसरों की कमी" आदि।।

अपने 2016 के बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का वादा किया था। उन्होंने कहा था कि हम अपने किसानों का देश के खाद्य सुरक्षा की रीढ़ बनने के लिए आभारी हैं। हमें खाद्य सुरक्षा से परे सोचने की जरूरत है और हमारे किसानों को आय सुरक्षा की भावना देनी होगी। इसलिए, खेती और गैर-कृषि क्षेत्रों में सरकार 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लिए अपने हस्तक्षेप को दोबारा तैयार करेगी।"

इसके बाद, मानव संसाधन विकास मंत्री केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कृषि क्षेत्र को दोहरी करने के लिए सात सूत्री रणनीति की रूपरेखा तैयार की जिसमें सिंचाई को बढ़ाने, बेहतर गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराने और बाद में घाटे के नुकसान को रोकने के लिए उपाय शामिल थे (मिंट ने 17 जून, 2017 को रिपोर्ट में बताया था)।

इन प्रयासों में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 30 मार्च, 2016 को कहा था। इनमें बीज इनपुट, उर्वरक और सिंचाई जैसे कृषि इनपुट की बढ़ती लागत, सरकारी खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की अप्रासंगिकता, मार्केटिंग बुनियादी ढांचे का अभाव जैसे गोदामों और ठंडे बस्ते, और तथ्य यह है कि 85% किसानों के पास बीमा नहीं है। इस रिपोर्ट से ये जाहिर है कि भारत के कृषि संकट में बहु-आयामी समाधान है जो इन सभी चुनौतियों से निपटता है, कर्जमाफी केवल एक हिस्सा है।

मैं तो ऐसे किसी किसान को नहीं जानता जो अपने स्वास्थ्य पर खर्च करता हो। इंमरजेंसी होने पर खर्च तो करना ही होगा। किसान भी तो इंसान होते हैं। अपना और अपने बच्चों को ख्याल तो रखेंगे ही। जरूरी कामों के लिए कर्ज लेना पड़ता है।
इंद्र सिंह, किसान, मंदसौर, मध्य प्रदेश

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