एक युवा जो सिखा रहा है देसी एटीट्यूड, पुरानी शान की तरफ लाैटने के लिए कर रहा प्रेरित

Neetu SinghNeetu Singh   24 Oct 2017 12:54 PM GMT

एक युवा जो सिखा रहा है देसी एटीट्यूड, पुरानी शान की तरफ लाैटने के लिए कर रहा प्रेरितसिद्धार्थ मोहन नायर खादी की डेनिम जींस दिखाते हुए।

लखनऊ। इस आधुनिक युग में भी युवा खादी कपड़े पहनने शुरू करें इसके लिए एक युवा ने खादी कपड़े से आधुनिक तरीके के परिधान बनाने शुरू किये। 26 वर्षीय सिद्धार्थ मोहन नायर पिछले पांच सालों से खुद तो खादी का धोती कुर्ता पहन ही रहे हैं, साथ ही आज के युवाओं को खादी कपड़े पहनने के लिए 'देसीट्यूड' की शुरुआत भी की है।

“एक बार अन्ना हजारे के आन्दोलन से जुड़ने का मौका मिला था, वहां पर स्वदेशी पहनावे के बारे में बहुत सुना था। तभी से मैंने धोती कुर्ता पहनना शुरू कर दिया। आज के युवा भी खादी के कपड़े पहने ऐसा मै चाहता था, पर ये भी जानता था कि इस फैशन के युग में खादी कपड़े लोगों के लिए पहनना बड़ा मुश्किल होगा।” ये कहना है केरल राज्य के पालाकाड जिले में रहने वाले सिद्धार्थ का। वो आगे बताते हैं, “मैं ऐसा कोई बिजनेस शुरू करूंगा मैंने सोचा नहीं था, एक बार अपने लिए खादी की डेनिम जींस बनाकर अपने फेसबुक पर डाली थी। उस पोस्ट को देखकर मेरे दोस्त उसकी मांग करने लगे, मुझे लगा युवा इस तरह के बने परिधान पहनेंगे। दोस्तों ने भी सलाह दी, तभी से मैंने 'देसीट्यूड' की शुरुआत की।”

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सिद्धार्थ मोहन पिछले पांच वर्षों से पहन रहे धोती कुर्ता।

एक समय खादी के कपड़े पहनना शान माना जाता था, लेकिन अब खादी के कपड़े का प्रचलन बहुत कम हो गया है। आज के युवा खादी के कपड़े की महत्ता समझें और ज्यादा से ज्यादा पहनें, इसके लिए सिद्धार्थ ने मार्च 2016 में ऑनलाइन 'देसीट्यूड' नाम का एक पेज बनाया। इस पेज पर खादी की डेनिम जींस और भी कई परिधान डालते रहते हैं। अभी इनके काम की शुरुआत के डेढ़ साल ही हुए हैं, बहुत ज्यादा संख्या में तो नहीं लेकिन हर महीने युवा खादी से बने परिधानों की 15 से 20 की संख्या में ऑडर आ जाते हैं। हर साल जितने कपड़े बिकेंगे जून और जुलाई महीने ये उतने ही पौधे लगायेंगे। पिछली साल इन्होने 180 पौधे लगाये थे। ये अपनी आमदनी का 10 प्रतिशत सामाजिक कार्यों में खर्च करते हैं।

सिद्धार्थ तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से इंजीयनियरिंग की पढ़ाई के बाद दिसंबर 2011 में दिल्ली सिविल परीक्षा की तैयारी के लिए आ गये थे। उसी दौरान इन्हें अन्ना हजारे आन्दोलन से जुड़ने का मौका मिला। इन्होने किरण बेदी के साथ इंटर्नशिप भी की, ये उनकी सोच और लगन से बहुत प्रभावित थे। इन सब अभियानों से जुड़ने के बाद इन्हें वकालत की पढ़ाई करने को सूझी। सिविल की तैयारी के साथ ही इन्होंने वकालत की पढ़ाई भी पूरी कर ली।

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खादी परिधानों का विज्ञापन पलायन लोगों के द्वारा आया जाता है, जिससे उनका उत्साह बढ़े

सिद्धार्थ मोहन गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, “अपना काम शुरू करने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे, मैंने माँ से 30 हजार रुपए लोन लिए और कहा कि जल्द ही वापस कर दूंगा। शुरुआत में 20 हजार के कपड़े खरीदे और 10 हजार रुपए सिलाई के लिए रखे। ऐसे ही 'देसीट्यूड' की शुरुआत की।” वो आगे बताते हैं, “मुझे फैशन का कभी शौक नहीं रहा, मैं सिर्फ देशी चीजों में भरोसा रखता हूँ। 'देसीट्यूड' में डिजायनिंग के जो भी विज्ञापन डालता हूँ, उसमे पलायन किये हुए लोगों को शामिल करता हूँ जिससे उनका उत्साह बढ़े, जिसमे कोई मेकअप या फोटो एडिटिंग नहीं होती है। खादी से बनी डेनिम पूरी तरह से इको फ्रेंडली है, अब लोग डेनिम के अलावा शर्ट, कुर्ता और भी कई परिधानों की मांग कर रहे हैं।”

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सिर्फ जींस ही नहीं और भी कई परिधान बन रहे हैं ।

केरला में जींस को सिलने वाला कोई अच्छा टेलर नहीं मिला इसलिए सिद्धार्थ को मुंबई शिफ्ट होना पड़ा। सिद्धार्थ बताते हैं, “मैं सिर्फ खादी के कपड़े बेचता ही नहीं हूँ बल्कि लोगों को ये भी बताता हूँ कि ये डेनिम कताई के धागों से बनी होती है। इसमे लोगों की मेहनत दिखती है, सबसे जरूरी बात ये कि इससे कई लोगों को रोजगार मिलता है। ये कपड़े हमारे लिए आराम दायक होते हैं और सेहत के लिए अच्छे होते हैं।” वो आगे बताते हैं, “मै हर महीने अपनी आमदनी का 10 प्रतिशत हिस्सा केरला के एक स्वयं सहायता समूह को देता हूँ, ये समूह बच्चियों को सेनेटरी पैड देने का काम करता है। 'देसीट्यूड' में सभी ऑनलाइन ऑडर भारतीय डाक से आते हैं, हमारे काम में हर चीज देशी रहे ये हमारी कोशिश है।”

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