कहां चूक हुई जो लोगों को गले की फांस लग रहा है आधार

कहां चूक हुई जो लोगों को गले की फांस लग रहा है आधारआधार कार्ड

लखनऊ। कुछ साल पहले केंद्र सरकार ने भारत के नागरिकों के लिए एक पहचान पत्र के रूप में आधार कार्ड बनवाना सुनिश्चित किया था लेकिन अब यह सिर्फ पहचान पत्र न रहकर लोगों के लिए गले की फांस बनता जा रहा है। केंद्र सरकार ने ज़्यादातर सराकरी सुविधाएं लेने के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य बता दिया है। जबसे आधार कार्ड आस्तित्व में आया तब से लेकर इसकी अनिवार्यता पर बहसें लगातार जारी हैं।

आधार कार्ड को बैंक खातों से लेकर बच्चों का एडमिशन कराने तक के लिए ज़रूरी बनाया जा रहा है। हाल ही में आधार कार्ड की अनिवार्यता को निजता पर हमला बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी डाली गई थी और सोशल मीडिया पर भी इसको लेकर कैंपेन चलाया गया था। बीच - बीच में कई बार सुप्रीम कोर्ट ये भी कह चुका है कि आधार कार्ड को हर सुविधा देने के लिए ज़रूरी नहीं बनाया जा सकता, फिर भी इससे जुड़े नए नियम लगातार बनते ही जा रहे हैं।

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क्यों लाया गया था आधार

28 जनवरी 2009 को विशेष पहचान प्राधिकरण की स्थापना हुई। इसके दो मकसद थे - एक यह कि लोगों के पास एक स्थाई पहचान पत्र नहीं है और दूसरा यह कि इसे योजनाओं से जोड़ा जाएगा ताकि एक व्यक्ति अगर एक योजना का लाभ एक से ज़्यादा बार ले रहा है तो उसे पहचाना जा सके। इस प्राधिकरण ने हमेशा यही कहा कि आधार पंजीयन अनिवार्य नहीं है पर संबंधित विभाग अपनी योजना का लाभ देने के लिए इसे एक शर्त के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। हुआ भी यही। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून के तहत खाते खोलने के लिए इसे अनिवार्य कर दिया गया।

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पेट्रोलियम मंत्रालय गैस सेवा के तहत आधार जमा करना ज़रूरी हो गया है। बैंक में खाता खुलनवाने के लिए अब आधार आवश्यक है। राष्ट्रीय बीमा योजना में भी इसका प्रावधान है। सस्ता राशन लेने के लिए आधार ज़रूरी हो गया है। अपने पैन कार्ड को भी 31 अगस्त तक आधार कार्ड से लिंक कराना ज़रूरी है वरना आपका पैन कार्ड निरस्त हो जाएगा। ख़बर यह भी है कि अब सरकार संपत्ति ख़रीदने के लिए भी आधार कार्ड को अनिवार्य बनाने जा रही है।

अभी तक बन चुके हैं इतने आधार कार्ड

साल 2010 में नेशनल आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया विधेयक राज्यसभा में पेश किया गया। तब इस विधेयक को वित्त विभाग की संसद की स्थाई समिति ने खारिज कर दिया था लेकिन प्राधिकरण को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत के अनुसार, वर्ष 2009 में इसके लिए 120 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान था जो वर्ष 2010 - 2011 में बढ़ाकर 1900 करोड़ कर दिया गया। दिसंबर 2012 तक प्राधिकरण 2300।56 करोड़ रुपये खर्च कर चुका था। 31 मार्च 2017 तक प्राधिकरण ने आधार कार्ड पर 8793।9 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। प्राधिकरण की वेबसाइट के मुताबिक, 11 जुलाई 2017 तक 1,167,590,526 लोग इसमें पंजीयन करा चुके हैं। इसके 164 एक्टिव रजिस्ट्रार हैं, 704 एक्टिव पंजीकरण एजेंसी हैं, 623,596 प्रमाणित ऑपरेटर और पर्यवेक्षक व 48,434 रजिस्टर्ड पंजीकरण स्टेशन हैं।

राइट टू प्राइवेसी का मुद्दा

जन कल्याणकारी योजनाओं में आधार को अनिवार्य बनाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। 18 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई शुरू की। इस मामले में 9 जजों की बेंच में सुनवाई की। केंद्र सरकार के मुताबिक सिर्फ 30 सिंतबर 2017 तक ही जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ जनता बिना आधार कार्ड के उठा सकेगी। इसके बाद आधार कार्ड अनिवार्य हो जाएगा लेकिन 24 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में नौ जजों की बेंच ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताते हुए स्पष्ट कर दिया है कि इस फैसले के बाद अब आधार मामले में सुनवाई होगी साथ ही आधार, पैन आदि से जुड़ी निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं हो पाएगी।

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इससे पहले हुई मामले की सुनवाई के दौरान जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं तब अटर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि खड़ग सिंह और एमपी शर्मा से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो अलग-अलग बेंच ने कहा हुआ है कि 'निजता का अधिकार' मौलिक अधिकार नहीं है। 1950 में 8 जजों की संवैधानिक बेंच ने एमपी शर्मा से संबंधित वाद में कहा था कि 'निजता का अधिकार' मौलिक अधिकार नहीं है। वहीं 1961 में खड़ग सिंह से संबंधित वाद में सुप्रीम कोर्ट की 6 जजों की बेंच ने भी 'निजता का अधिकार' को मौलिक अधिकार के दायरे में नहीं माना था लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे मौलिक अधिकार घोषित कर दिया है।

पहले भी हुए हैं कई आदेश

23 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में कहा था कि आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं किया जाए। कोई भी अथॉरिटी किसी पब्लिक सर्विस या सरकारी बेनिफिट के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य न करे।

24 मार्च, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कोई भी शख्स किसी भी सरकारी लाभ या योजना से आधार कार्ड न होने के नाम पर वंचित नहीं किया जा सकता। 16 मार्च 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा कहा था कि केंद्र सरकार की ये ड्यूटी है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन हो और आधार कार्ड किसी भी सरकारी बेनिफिट के लिए अनिवार्य न किया जाए।

11 अगस्त 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि आधार कार्ड किसी भी सरकारी वेलफेयर स्कीम के बेनिफिट के लिए अनिवार्य नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि आधार किसी भी सोशल बेनिफिट के लिए अनिवार्य नहीं होगा। कोर्ट ने कहा था कि सरकार को इस बात की लिबर्टी है कि वह पीडीएस, केरोसिन और एलपीजी वितरण में आधार का इस्तेमाल कर सकती है लेकिन यह साफ किया कि इन मामलों में भी आधार अनिवार्य नहीं होगा।

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9 जून 2017 को आईटी रिटर्न के लिए आधार की अनिवार्यता संबंधी आईटी ऐक्ट की धारा-139 एए की संवैधानिक वैलिडिटी को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया और कहा है कि ये संविधान के अनुच्छेद-14 और 19 का उल्लंघन नहीं करता, जस्टिस एके सिकरी की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि आईटी ऐक्ट में बदलाव कर 139 एए का प्रावधान किया गया है जिसके तहत आईटी रिटर्न के लिए आधार की अनिवार्यता की बात है और पैन से आधार के लिंक करने का प्रावधान है।

बिना अनुमति के नहीं मिलेगा डाटा

24 मार्च 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने यूआईडीएआई को निर्देश दिया कि वो किसी भी व्यक्ति से जुड़ी कोई भी जानकारी बिना उस व्यक्ति की अनुमति के किसी जांच एजेंसी को नहीं दे सकता। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2013 में गोवा के एक स्कूल में हुए रेप के मामले में दिया। जनवरी 2013 में गोवा के एक स्कूल के टॉयलेट में एक बच्चे का रेप हो गया।

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पुलिस ने पूरी तफ्तीश की लेकिन अपराधी का पता नहीं लगा पाई और केस सीबीआई को सौंप दिया गया। सीबीआई ने कहा कि अगर यूआईडीएआई से हमें बायोमेट्रिक डाटाबेस मिल जाए तो हम उससे अपराधी की उंगलियों के निशान मिला सकते हैं। इसके बाद उन्होंने गोवा में नामांकित सभी व्यक्तियों के बायोमेट्रिक डाटाबेस खंगाले और अपराधी को पकड़ लिया लेकिन इसके लिए सीबीआई को गोवा के कोर्ट से आदेश लेना पड़ा। इस बात से ये साबित होता है कि बिना कोर्ट के आदेश के बायोमेट्रिक डाटा किसी एजेंसी को नहीं दिया सकता, फिर भी इसकी हैकिंग का ख़तरा बरकरार है।

कहां-कहां जरूरी होगा आधार

केन्द्र सरकार ने हाल ही में सरकार की करीब एक दर्जन योजनाओं के लाभार्थियों के लिए आधार को अनिवार्य करने का फैसला लिया है। इन योजनाओं में मिड-डे मील स्कीम भी शामिल थी। हालांकि, इस पर बाद में छूट देने का फैसला लिया गया।

अगर आपने मोबाइल नंबर को आधार से नहीं जोड़ा तो वो बंद हो जाएगा। एक साल के अंदर ये प्रक्रिया पूरी होनी है।

सरकार के नए फरमान के मुताबिक सभी मौजूदा मोबाइल सब्सक्राइबर्स का वेरिफिकेशन किया जाएगा और ये वेरिफिकेशन आधार बेस्ड ई-केवाईसी के जरिए होगा।

सभी सर्विस प्रोवाइडरों को विज्ञापन और एसएमएस से सब्सक्राइबर्स को जानकारी देनी होगी। 6 फरवरी 2018 तक वेरिफिकेशन का काम पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया है।

टेलीकॉम विभाग ने इस मुद्दे पर यूआईडीएआई, ट्राई और टेलीकॉम कंपनियों के साथ बैठक की है। टेलीकॉम विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के 6 फरवरी को दिए निर्देश के मुताबिक ये फैसला लिया है। बता दें कि टेलीकॉम कंपनियों को हर हफ्ते रि-वेरिफाइड सब्सक्राइबर्स की जानकारी अपडेट करनी होगी।

पहले कंपनियां वेरिफिकेशन कोड को देखेंगी और ई-वेरिफिकेशन की प्रक्रिया के तहत मोबाइल नंबर पर वेरिफिकेशन कोड भेजा जाएगा।

ई-केवाईसी के लिए अलग से एप्लिकेशन फॉर्म होगा और एप्लिकेशन फॉर्म में आधार नंबर के अलावा डिटेल्स देने होंगे। ई-केवाईसी के बाद सब्सक्राइबर डाटाबेस में अपडेट करना होगा। एक से ज्यादा मोबाइल नंबर होने पर दोबारा वेरिफिकेशन करना होगा।

अमेरिका में मिलता है सोशल सिक्योरिटी नंबर

अमेरिका में रहने वाले हर नागरिक को वहां की सरकार की तरफ से एक नौ डिजिट का सोशल सिक्योरिटी नंबर दिया जाता है। इसको अमेरिकी सरकार का सोशल सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन लोगों को जारी करता है। अभी सरकार तीन तरह के सोशल सिक्योरिटी नंबर वाले कार्ड जारी करती है, जिनमें दो रीस्ट्रिक्‍टेड कैटेगरी में आते हैं। इस कैटेगरी के कार्ड केवल विदेशियों को जारी किए जाते हैं।

इनमें से एक कार्ड उन लोगों को जारी किया जाता है, जो कि नौकरी के लिए अप्लाई नहीं कर सकते हैं। दूसरा कार्ड उन नागरिकों को जारी किया जाता है , जो थोड़े समय के लिए यूएस में काम करने के लिए आते हैं। अमेरिका में बैंक और अन्य फाइनेंशियल संस्थान में बिना एसएसएन कार्ड के किसी भी प्रकार का अकाउंट नहीं खुल सकता है। इसके अलावा इस कार्ड के बिना लोन और क्रेडिट कार्ड के लिए भी लोग अप्लाई नहीं कर सकते हैं। वित्तीय कामकाज के लिए भी एसएसएन नंबर बहुत जरूरी है।

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