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अब छह महीने तक करा सकेंगे गर्भपात, ये शर्त जरूरी

जो महिलाएं अनचाहा गर्भ नहीं चाहती हैं उनके लिए ये खबर काम की है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 में बदलाव के बाद अब महिलाएं 20 सप्ताह (5 महीने) की बजाए 24 सप्ताह (6 महीने) तक गर्भपात करा सकती हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   29 Jan 2020 2:07 PM GMT

अब छह महीने तक करा सकेंगे गर्भपात, ये शर्त जरूरी

लखनऊ। महिलाओं के अधिकार, उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गर्भपात कराने की अधिकतम सीमा 24 सप्ताह (छह महीने) कर दी है।

24 सप्ताह के गर्भपात में एक बात महत्वपूर्ण यह है कि दो रजिस्टर्ड डॉक्टर्स की अनुमति होना चाहिए, जिसमें एक डॉक्टर का सरकारी होना जरूरी है।

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 में बदलाव करते हुए 29 जनवरी 2020 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गर्भपात कराने के लिए अधिकतम सीमा 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह करने की अनुमति दे दी है। मोदी कैबिनेट में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (संशोधन) बिल 2020 को मंजूरी मिल गयी है।

"यह फैसला महिलाओं की मांग थी, डॉक्टर्स की सिफारिश थी, कोर्ट का आग्रह था। आज कैबिनेट ने इसे पास किया है, अब ये संसद में जाएगा। ये फैसला महिलाओं को अधिकार देने का है, उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के ख्याल करने का है।" यह बात केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 में बदलाव के बाद कही।

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 में बदलाव के बाद गांव कनेक्शन ने कई लोगों की राय जानी जिसमें ग्रामीण महिला, स्त्री रोग विशेषज्ञ, वकील, आशा ज्योति केंद्र की प्रभारी और ये माएं भी शामिल हैं जिनकी नाबालिग बच्चियां रेप के बाद मां बनी। इनका गर्भपात सिर्फ इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि जबतक इन्हें उसके गर्भवती होने का पता चला तबतक बहुत देर हो चुकी थी।

"हमारी लड़की जब पांच महीने की गर्भवती थी तब हमें इसका पता चला। एफआईआर लिखाने में समय लग गया। किसी डॉ ने सफाई (गर्भपात) नहीं की।" ये शब्द उस मां के हैं जिनकी 17 साल की मूक-बधिर बेटी निकिता (बदला हुआ नाम) के साथ रेप हुआ था और वह गर्भवती हो गयी थी।

निकिता का गर्भपात इसलिए नहीं हो पाया था क्योंकि पांच महीने से ज्यादा का समय हो गया था.

इस फैसले के आने के बाद जब गांव कनेक्शन ने निकिता की मां से फोन पर बात की तो वह कहती हैं, "अब ये फैसला हमारे किस काम का? 24 हफ्ते बाद भी गर्भपात होगा तो भी नुकसान तो लड़की का ही है, अगर लड़की के साथ कुछ हो गया तो कौन जिम्मेदार होगा? कानून तो रोज नये बनते हैं पर उनका असर कितना होता है ये तो आपको भी पता है।"

सीतापुर जिले के पिसावां ब्लॉक में 14 अगस्त 2017 को निकिता के साथ उसके पड़ोसी रिश्तेदार ने दुष्कर्म किया था। वो गर्भवती हो गयी थी, घरवालों को जब उसके गर्भवती होने का पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी और उसका गर्भपात नहीं हो पाया था। अभी वह डेढ़ साल के बच्चे की मां है। निकिता 'बिन ब्याही बच्चे की मां बन गयी' जैसे तानों से हर दिन दो चार होती है।

भारत सरकार ने महिलाओं को गर्भपात करने की अनुमति 1971 से दी है। भारत में 1971 से पहले गर्भपात कराना गैरकानूनी था।


"24 सप्ताह का गर्भपात कराने से पहले दो डॉ की इजाजत होनी चाहिए जिसमें से एक डॉक्टर का सरकारी होना जरूरी है। महिलाओं की रक्षा के लिए दुनिया के बहुत कम देशों में इस तरह का कानून है। इस महत्वपूर्ण फैसले के बाद आज भारत इस दिशा में आगे आया है।" प्रकाश जावड़ेकर ने कहा।

केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के इस फैसले से कोसों दूर लखनऊ जिला मुख्यालय से 50 किलोमीटर दूर दुबली पतली गुड्डी देवी (40 वर्ष, बदला हुआ नाम) कहती हैं, "हमने तो कभी ये सब (गर्भपात) करवाया ही नहीं। आठ बच्चे हैं अभी, सात बच्चे दवा खाने से गिर गये हैं। बच्चा अस्पताल जाकर गिरवाना हमारे हाथ में नहीं है। हम तो चुपचाप दवा खरीदकर खा लेते हैं और बच्चा गिर जाता है।" गुड्डी देवी की तरह यहां की दर्जनों महिलाओं ने इससे मिलती-जुलती बात ही कही।

"ये फैसला उन महिलाओं के लिए मददगार होगा जिनके बच्चे में विकलांगता हो या कोई और समस्या हो। इससे ज्यादा जरूरी यह है कि इस कानून का सही से पालन हो। MTP (मेडिकल टेर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी) कानून बने बहुत साल हो गयें हैं पर इसका सही से पालन नहीं होता।" इस फैसले पर स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ नीलम सिंह कहती हैं, "अगर यूपी का आंकड़ा देखें तो 52 प्रतिशत गर्भपात अवैध तरीके से होते हैं, असुरक्षित होते हैं, इसे वो डॉ करते हैं जो अधिकृत नहीं हैं। इन सेंटरों की कोई विजिट नहीं होती है।"


मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंासी (MTP) एक्ट , 1971 में हुए बदलाव के बाद अब अगर 24 सप्ताह तक गर्भपात हो सकता है तो इसके लिए दो रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर्स की राय जरूरी होगी।

महिला मुद्दों पर कानूनी सलाह देने वाली संस्था आली की वकील रेनू मिश्रा इस फैसले को महिलाओं का अधिकार मानती हैं। वह कहती हैं, "अगर डाक्टरी सलाह के बाद मेडिकली कोई खतरा नहीं है तो यह एक अच्छा फैसला है। इस फैसले का ठीक से लागू होना एक अहम कड़ी है। कई बार कानूनी कार्रवाई और कोर्ट से इजाजत लेने में बहुत समय लग जाता है जिसकी वजह से रेप पीड़ितायें और पॉक्सो विक्टिम अपना गर्भपात नहीं करा पाती थीं।"

वो आगे कहती हैं, "24 सप्ताह के गर्भपात के साथ यह भी सुनिश्चित किया जाए कि इन्हें फ्री में सघन चिकित्सा मिलेगी, अगर इन्हें इलाज का नि:शुल्क सही इंतजाम मिल जाए तो इनके लिए ज्यादा उपयोगी होगा।"

"कई बार लड़की न चाहते हुए भी बच्चे को जन्म देती है, इससे मां और बच्चे दोनों की जिंदगी बर्बाद होती है। इस फैसले के बाद ऐसी लड़कियां नई जिंदगी शुरू कर सकती हैं।" ये बात आशा ज्योति केंद्र लखनऊ की केंद्र समन्यवक अर्चना सिंह ने कही।

निकिता की मां की तरह ही लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्र की रहने वाली नेहा (14 वर्ष, बदला हुआ नाम) की मां की मुश्किलें भी उस वक़्त कम नहीं थी जब उनकी 12 साल की बेटी के साथ रेप हुआ था और वह गर्भवती थी। उन्हें अपनी बेटी के गर्भवती होने का पता चार महीने बाद पता चला।

नेहा की मां कहती हैं, "शुरुआत में हम बहुत डॉ के पास गये पर किसी ने इसका गर्भपात नहीं किया। हम नहीं चाहते थे हमारी इतनी छोटी लड़की किसी बच्चे को जन्म दे। ज्यादा दिन होने की वजह से हमारा काम नहीं हो पाया।"

उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में 30 दिसंबर 2017 को नेहा ने एक बेटे जो जन्म दिया था तब नेहा की उम्र महज 12 साल थी।

नेहा और निकिता की मां को भले ही अपनी बिन ब्याही बेटियों का गर्भपात कराने में मदद न मिली हो, पर 24 सप्ताह वाला ये फैसला आने वाले उन तमाम मामलों में मददगार साबित होगा जो अनचाहा गर्भ नहीं चाहते हैं।

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