सावधान! पिछले एक साल में प्रदूषण से गई दस लाख लोगों की जान

पिछले वर्ष वायु प्रदूषण के कारण देश में 10 लोगों की जान चली गई, जिसमें से 12,322 दिल्ली में थीं...

सावधान! पिछले एक साल में प्रदूषण से गई दस लाख लोगों की जान

लखनऊ। पिछले वर्ष वायु प्रदूषण के कारण देश में 10 लोगों की जान चली गई, जिसमें से 12,322 दिल्ली में थीं। दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर सबसे ज्यादा रहा, वहीं इसके बाद दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश रहा और फिर बिहार, हरियाणा और राजस्थान। शोध के मुताबिक 6.7 लाख मौतें घर के बाहर वायु प्रदूषण के कारण हुईं, वहीं 4.8 लाख लोगों ने घर में वायु प्रदूषण के कारण अपनी जान गंवाई। यह शोध गुरुवार को लांसेट प्लैनेटरी हेल्थ पत्रिका में प्रकाशित हुआ।

रिपोर्ट में कहा गया कि वर्ष 2017 में करीब 12.4 लाख मौतों के पीछे वायु प्रदूषण वजह थी। इसमें वायु प्रदूषण को देश में होने वाली मौतों के पीछे के खतरों में से सबसे बड़ा बताया गया है जहां औसत जीवन प्रत्याशा 1.7 गुणा ज्यादा होती अगर प्रदूषण का स्तर स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले स्तर से नीचे होता। अध्ययन में कहा गया है कि दुनिया भर में वायु प्रदूषण के कारण 18 फीसदी लोगों ने समय से पहले या तो अपनी जान गंवा थी अथवा बीमार पड़ गए। इसमें भारत का आंकड़ा 26 फीसदी था।

आईसीएमआर, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई),इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स ऐंड इवेल्यूएशन (आईएचएमई) और स्वास्थ्य मंत्रालय की संयुक्त पहल पर आधारित रिपोर्ट भी आई है। इससे संबंधित रिपोर्ट भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) में जारी की गई है।

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शोधकर्ताओं के अनुसार, वायु प्रदूषण स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले न्यूनतम स्तर से कम हो तो भारत में औसत जीवन प्रत्याशा 1.7 वर्ष अधिक हो सकती है। वायु गुणवत्ता मानकों की सुरक्षित सीमा से अधिक प्रदूषण बड़ी संख्या में लोगों को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। बढ़े हुए पीएम-2.5 के स्तर के कारण देश की 77 प्रतिशत आबादी की सेहत प्रभावित हो सकती है।

वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर के प्रभाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 70 साल से कम उम्र के लोगों की पिछले साल हुई 12.4 लाख मौतों में से आधी मौतों के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वायु प्रदूषण को जिम्मेदार पाया गया है। इसके लिए बाहरी वातारण में होने वाले प्रदूषण के साथ-साथ घरेलू प्रदूषण भी कम जिम्मेदार नहीं है। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि बाहरी वातावरण में मौजूद सूक्ष्म कणों से 6.7 लाख मौतें और घरेलू वायु प्रदूषण के कारण 4.8 लाख मौतें हुई हैं।

यह अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए आईसीएमआर के महानिदेशक प्रो. बलराम भार्गव ने कहा कि "देश के विभिन्न राज्यों मे वायु प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रभाव का आकलन महत्वपूर्ण है। इसकी मदद से वायु प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों की रोकथाम में मदद मिल सकती है।"

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स्वास्थ्य सेवाएं, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के निदेशक डॉ एस. वेंकटेश के ने बताया, "पांच साल से कम उम्र के बच्चे, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं वायु प्रदूषण के खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से गर्भवती महिलाओं में अपरिपक्व प्रसव की संभावना बढ़ जाती है। बच्चों का मानसिक विकास और संज्ञानात्मक क्षमता भी इसके कारण प्रभावित होती है और उनमें अस्थमा एवं फेफड़ों की कार्यप्रणाली प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है।"

वायु प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों में श्वसन संक्रमण, फेफड़ों में अवरोध, हार्टअटैक, स्ट्रोक, मधुमेह और फेफड़ों का कैंसर मुख्य रूप से शामिल है। देश के उत्तरी राज्यों में प्रदूषण का पीएम-2.5 का स्तर सबसे अधिक दर्ज किया गया है। पीएम-2.5 का सर्वाधिक स्तर दिल्ली में दर्ज किया गया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा में पीएम-2.5 की दर सबसे अधिक पायी गई है। शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रदूषण स्तर कम होने के कारण जीवन प्रत्याशा में सुधार होने की दर भी विभिन्न राज्यों में अलग-अलग हो सकती है। प्रदूषण स्तर निर्धारित मानकों से कम हो तो राजस्थान में जीवन प्रत्याशा 2.5 वर्ष, उत्तर प्रदेश में 2.2 वर्ष और हरियाणा में 2.1 वर्ष अधिक हो सकती है।

लोगों की कम हुई आयु

व्यक्ति की औसत आयु 1.5 साल हुई कम सभी प्रदेशों में दिल्ली में पीएम 2.5 का एक्सपोजर सबसे ज्यादा रहा। दिल्ली में हवा की गुणवत्ता इतनी खराब है कि पिछले साल वायु प्रदूषण के कारण लोगों की औसत आयु 1.5 साल तक कम हो गई। शोध ने दावा किया कि भारत में लोगों की औसत आयु 1.7 ज्यादा होती अगर वायु प्रदूषण, जिससे स्वास्थ्य को नुकसान हो रहा है, न्यूनतम स्तर से कम होता। इससे पहले यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (ईपीआईसी) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रदूषित हवा 2016 में थी जिससे व्यक्ति की औसत आयु 10 वर्ष तक कम हो गई। रिपोर्ट में दिल्ली को देश का सबसे दूसरा प्रदूषित शहर बताया गया था।

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किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के श्वसन चिकित्सा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ सूर्यकांत बताते हैं," अगर बार-बार छींक आ रही है, नाक से पानी आ रहा है, नाक में खुजली हो रही है, नाक चोक हो रही तो समझिए आप वायु प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। अब हम नाक से आगे बढेंगे तो जैसे-जैसे हवा सांस के द्वारा नीचे जाती है, गले में खिच-खिच हो जाती है, गले में खराश हो जाती है खांसी आने लगती है इसके बाद हम और नीचे जाएंगे तो ब्रोन्काईटिस हो जाती है अस्थमा हो जाता है और अगर लम्बे समय तक अगर ये प्रदूषण रहता है तो फेफड़े का कैंसर भी होने का खतरा बढ़ जाता है।"

वो आगे बताते हैं, "इसका असर आंखों पर भी पड़ता है। आंखों में खुजली होने लगती है, आंखों में जलन होना और पानी आने लगता है। इसके कारण सिरदर्द हो सकता है माईग्रेन का अटैक पड़ सकता है। इसके अलावा रक्तचाप बढ़ जाता है और लम्बे समय के बाद दिल का दौरा भी पड़ने का खतरा बढ़ जाता है।"

गर्भवती महिलाएं रखें खास ख्याल

डॉ. सूर्यकांत ने बताया, "गर्भवती महिलाओं के लिये भी इसका खतरा रहता है। प्रदूषण में रहने के बाद गर्भवती महिला के गर्भ में पाल रहे बच्चे के लिए खतरा बढ़ जाता है। उसके बच्चे की गर्भ में ही मृत्यु हो सकती है। इसके अलावा बच्चे में शारीरिक बीमारियां, एलर्जी और सांस सम्बन्धी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। इन सब बीमारियों के साथ-साथ मृत्यु दर भी बढ़ जाती है।"

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