'शराब सबसे बड़ा दुख' : बिहार के बाद कई राज्यों में महिलाएं उठा रही शराबबंदी की मांग

झारखंड के लगभग हर गांव में कच्ची शराब (हड़िया) बनती है। यहां की महिलाएं बिहार की तरह शराबबंदी चाहती हैं। तो हरियाणा की महिलाओं ने भी शराब को दुख की वजह बताते हुए गांवों से ठेके हटाने की मांग की है।

शराब सबसे बड़ा दुख : बिहार के बाद कई राज्यों में महिलाएं उठा रही शराबबंदी की मांग

नीतू सिंह/ अरविंद शुक्ला

रांची/लखनऊ। शराबबंदी का सख्त फैसला लेने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कुछ नर्म पड़े हैं। आने वाले दिनों में बिहार में अब पहली बार शराब पीने वाले को जेल नहीं होगी, लेकिन 50 हजार रुपए जुर्माना देना होगा। दो साल की शराब बंदी से बिहार के ग्रामीण इलाकों में सकारात्मक नतीजे निकल कर आएं। बिहार से सटे झारखंड में भी शराब बंदी की मांग तेज पकड़ रही है, तो हरियाणा की महिलाएं भी ठेकों के खिलाफ हैं।

भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते शराब मार्केट वाला देश है। सरकार के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा शराब पर टैक्स से आता है। इसीलिए सरकारें इस पर पाबंदी लगाने की हिम्मत नहीं कर पाती। हरियाणा और आंध्रप्रदेश जैसे कैसे राज्य शराब बंदी का फैसला लेकर पीछे हट चुके हैं। बिहार को शराब बंदी से करीब 3500 करोड़ रुपए के सलाना राजस्व का नुकसान हुआ। बिहार देश का तीसरा बड़ा प्रदेश है जहां की बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जी रही है। बिहार जैसे हालात झारखंड में भी हैं। एक बड़ी आबादी शराब की लत के चलते अपनी गाढ़ी कमाई बर्बाद कर रही है। पुरुषों की नशेबाजी का खामियाजा उनके परिवार की महिलाओं और बच्चों को उठाना पड़ता है, इसीलिए ये महिलाएं शराब के खिलाफ आवाज़ उठा रही है।

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झारखंड में चावल से बनी देसी शराब, (जिसे स्थानीय भाषा में हड़िया कहा जाता है) ने लोगों की जिंदगी नर्क बना रखी है। पुरुष नशे में डूबे रहते हैं तो घर चलाने की जिम्मेदारी महिलाओं पर आ जाती है वो जंगल लकड़ियां बीनकर, मजदूरी कर और कई बार यही हड़ियां बना और बेचकर परिवार के लिए रोजी-रोटी का इंतजाम करती हैं। पिछले दिनों ही हड़िया पीने से सिमडेगा जिले के ठेठईटांगर प्रखंड के केरेया घाटतरी गांव में आधा दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो गयी थी। बावजूद इसके हड़ियां यहां के स्थानीय हाट बाजार में खुलेआम बिकती है। यहां तक की राजधानी रांची के कई इलाकों में सुबह-शाम सड़क किनारे हड़िया बिकती रहती है। हड़िया और कच्ची शराब से ये तंग आ चुकी यहां कि महिलाएं अब शराब बंदी की मांग कर रही हैं, अपने घर और गांवों में शराब बंद करवा रही हैं।

झारखंड के खूंटी जिले में चावल से बनी कच्ची शराब (हड़िया ) बेचती महिलाएं। फोटो- अरविंद शुक्ला

झारखंड में रामगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 22 किलोमीटर दूर मांडूडीह ब्लॉक के गोविंदपुर गाँव की रहने वाली महेश्वरी देवी (48 वर्ष) अपने बाएं हाथ की टूटी हुई उंगली दिखाते हुए इस हड़िया को कोसती हैं, "इस हड़िया को पीकर नशे में पति ने ये उंगली तोड़ डाली। एक तो कोई काम नहीं करता, दूसरा जैसे ही उसपर नशा चढ़ जाता मारना पीटना शुरू कर देता। रात में बच्चे क्या खाएंगे इसके लिए मैं इधर-उधर मजदूरी करते घूमती।" गरीबी की वजह से महेश्वरी देवी की शादी 13 साल की उम्र में हो गयी। ससुराल में इनके पति रोज शराब पीते और मारपीट करते। कई साल मार सहने के बाद जब महेश्वरी देवी के दो बेटा और एक बेटी बड़े होने लगे तो उनके पढ़ाने की चिंता इन्हें सताने लगी।

महेश्वरी देवी बताती हैं, "बच्चों को लेकर मायके चले गये। वहां एक फैक्ट्री में मजदूरी करके बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया। जब पति को नशा करने के लिए पैसों का जुगाड़ न होता तो मायके आकर मारपीट करता, बच्चों की कॉपी-किताब बेच देता और शराब पीता। बहुत मुश्किल से बच्चों को पढ़ा पायीं हूँ, वो इतना नशा करता था कि कुछ साल बाद उसका शरीर काम करना बंद कर दिया, छह साल पहले उसकी मौत हो गयी।" महेश्वरी देवी झारखंड की पहली महिला नहीं हैं जो बच्चों की परवरिश को लेकर इतनी फिक्रमंद हो बल्कि इनकी तरह ये संख्या हजारों की तादाद में है। कुछ ग्रामीण महिलाओं ने इस हड़िया का विरोध किया है तो कुछ मजबूरन इसे बेचकर रोजी-रोटी का जरिया बना चुकी हैं।

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गढ़वा जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर नगर उंटारी ब्लॉक के सोनपुरा गाँव की रहने वाली खुशबू देवी (35 वर्ष) बताती हैं, "जब ससुराल आयी तो देखा पूरा घर शराब पीता और हर दिन घर में हड़िया बनती। घर की हड़िया बंद हो इसके लिए मुझे बहुत मशक्कत करनी पड़ी, घर वालों को रोज समझाती उनके ताने सुनती पर हार नहीं मानी, तब कहीं जार हड़िया बंद करवा पायी है। घरवाले कहते अगर हड़िया बंद हो गयी तो खर्चा कैसे चलेगा, जब खर्चा चलाने का जिम्मा हमने लिया तब कहीं जाकर मुश्किल से हड़िया बंद हुई है।" खुशबू देवी की तरह सैकड़ों की संख्या में महिलाएं आगे आ रही हैं। ये समूह बनाकर अपने-अपने गाँव में शराब का विरोध कर रही हैं। सखी मंडल से जुड़ी 98 महिलाओं ने आरा, केरम गांव को नशा मुक्त कर दिया है जो राज्य का पहला आदर्श नशा मुक्त गाँव बन गया है। इस गांव को देखकर मुख्यमंत्री ने कहा है कि राज्य में 1000 गांव इस गांव की तर्ज पर बनेंगे। मुख्यमंत्री रघुवरदास ने इस गाँव को एक लाख रुपए प्रोत्साहन राशि देकर महिलाओं का हौसलाअफजाई किया है।

रांची जिला मुख्यालय से लगभग 27 किलोमीटर दूर ओरमांझी ब्लॉक के टुंडाहुली पंचायत के दो गांव आरा और केरम में 110 घर हैं जिसमें लगभग 800 लोग रहते हैं। गाँव में मनरेगा की मेड सीमा देवी (23 वर्ष) बताती हैं, "एक साल पहले तक हमारे गांव के लोगों के दिन की शुरुआत कच्ची शराब से होती थी। सुबह से शाम तक हड़िया या कच्ची शराब पीकर नशे में पड़े रहते थे, महिलाएं भी पीने लगी थी। लकड़ी बेचकर और मजदूरी करके जितना कमाते उतना नशे में खर्च कर देते, गांव के हालात बहुत खराब थे।" उन्होंने खुश होकर कहा, "इस नशे को खत्म करने के लिए समूह की दीदी और गांव के कुछ समझदार लोगों ने बैठक की। एक साल लगातार इन लोगों को समझाने के बाद गांव को नशामुक्त बना पाया है। हड़िया बनाने वाले हर घर के बर्तनों को इकट्ठा करके उन्हें बेच दिया और उस पैसे को गांव के विकास के लिए रखा है।"


हरियाणा की महिलाएं भी ठेकों के खिलाफ

पंजाब देश में नशे के लिए कुख्यात है। पंजाब से सटा हरियाणा भी नशे की लत में आता जा रहा है। यहां की महिलाओं ने शराब को अपना सबसे बड़ा दुख बताया है। स्वराज अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव ने पिछले दिनों रेवाड़ी में स्वराज यात्रा निकाली। इस दौरान कई गांवों में महिलाओं ने खुली सभाओं में शराबबंदी की मांग की। योगेंद्र यादव ने कहा, "रेवाड़ी जिले में हमें एक भी ऐसा गांव नहीं मिला जहां महिलाएं शराब से पीड़ित न हों। हरियाणा पंजाब बनने की राह पर हैं। यहां पानी सूख रहा है और शराब पानी की तरह बह रही है। नशा मुक्ति अभियान के लिए महिलाओं के साथ पुरुषों को भी आना होगा।' स्वराज अभियान के मुताबिक रेवाड़ी में प्रति परिवार प्रति दिन एक पव्वा (193 मिली) खपत है। योगेंद्र यादव 9 दिनों में 205 किलोमीटर की पदयात्रा कर 127 गांव पहुंचे थे।

हरियाणा में 1997 में बंसी लाल सरकार ने शराब बंदी का फैसला लिया था, लेकिन तमाम विरोधों और कानूनी विवादों के चलते 2 साल बाद ही उन्हें अपना फैसला बदलना पड़ा था और इसी के साथ सरकार भी गिर गई थी।

बिहार में शराबबंदी से महिलाओं की सुधरी जिंदगी

बिहार में दो साल की शराब बंदी महिलाएं काफी खुश हैं। इन्हीं महिलाओं ने बार-बार सरकार से ये फैसला लेने का अपील की थी। शराब पर पाबंदी से वो पुरुष काम करने लगे हैं तो पहले नशे में धुत रहते थे। घरों का रहन-सहन सुधर रहा है। डेवलपमेंट मैंनेजमेंट इंटीट्यूट पटना के अध्ययन के मुताबिक शराब बंद होने से दूध, लस्सी और दूध से बनी चीजों की मांग बढ़ी है। वर्ष 2016-17 में दूध की बिक्री में 17.5 फीसदी का इजाफा हुआ था। जबकि कपड़ों की खरीद में 96 फीसदी की बढ़त हुई थी। देश के जाने-माने खाद्य और कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा अपने कॉलम में लिखते हैं, जबसे पीना बंद हुआ है जीने लगा है बिहार। वो लिखते हैं ये अच्छी ख़बरें हैं क्योंकि जब गरीब आदमी के पास कुछ पैसा बचता (शराब न पीने बची आमदनी) है तो वो उसे जिंदगी की जरुरतों पर खर्च करता है। गरीब आदमी की जिंदगी धागे के सहारे लटकी होती है, ऐसे में शराब न पीकर बचाया गया पैसा उसके परिवार के लिए जिंदगी और मौत के बीच बारीक रेखा साबित हो सकता है।

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