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लॉकडाउन में दिखा कमाल का जुनून, दो महीनों में एक शिक्षक ने वर्ली लोक कला से सजाईं घर की दीवारें

ये जुनून सिर्फ इस कला को अपने घर की चार दीवारी को चित्रित करने तक का नहीं था, इसे पूरा करने के लिए तुलसीदास ने बाकायदा पूरी तैयारी भी की।

Deepak AcharyaDeepak Acharya   10 Jun 2020 2:27 PM GMT

लॉकडाउन में दिखा कमाल का जुनून, दो महीनों में एक शिक्षक ने वर्ली लोक कला से सजाईं घर की दीवारेंलॉकडाउन के दौरान दो महीने में शिक्षक तुलसीदास पटेल ने वर्ली कला से सजा दीं घर की दीवारें। फोटो : दीपक आचार्य

लॉकडाउन के करीब दो महीने के दौर में आपने कई तरह के तामझाम करते हुए लोगों को देखा होगा। कोई सेलिब्रिटी झाड़ू और बर्तन साफ करते हुए तस्वीरें साझा कर रहा था, कई मित्र एक-दूसरे को अलग-अलग चैलेंजेस दे रहे थे और कुछ मेरी तरह वेबिनार, लाइव चैट्स और इधर-इधर की पंचायत में व्यस्त रहे। मगर असली जुनून का काम तो गुजरात के तापी जिले के पाठकवाड़ी गाँव के एक शिक्षक महोदय ने कर दिखाया।

तापी जिले के यात्राधाम उनई से करीब दो किमी दूर स्थित पाठकवाड़ी गाँव के निवासी तुलसीदास भाई पटेल ने अपनी पत्नी प्रीति बेन के साथ मिलकर लॉकडाउन के दौर में अपने घर की चार दीवारी को वर्ली आर्ट से सजा दिया। मेहनत भी इतनी जबरदस्त की गई कि आंखें भी निहार-निहार कर थक जाएं।

ये सिर्फ और सिर्फ एक जुनून था जो इन तस्वीरों पर निखर कर दिखायी दे रहा है। ये जुनून सिर्फ इस कला को अपने घर की चार दीवारी को चित्रित करने तक का नहीं था, इसे पूरा करने के लिए तुलसीदास ने बाकायदा पूरी तैयारी भी की।

गाँव में घर सजाने के लिए पूरे परिवार ने दिया तुलसीदास का साथ। फोटो : दीपक आचार्य

तुलसीदास ने मिट्टी, पेड़-पौधों की छाल और धान की फुसकी (चूरा/बुरादा) और पानी से गारा तैयार किया, जिसे कठिन परिश्रम से घर की चार दीवारी पर लगाया गया। इसके सूख जाने के बाद मिट्टी के गेरू रंग और चूने की मदद से वर्ली कलाकृतियों को दीवार पर उकेरा गया। आदिवासी पारंपरिक कलाकृति के जरिए इन्होंने कोविड महामारी को भी चित्रित कर दिया है। कोरोना आपदा से प्रभावित मुद्दों और कोरोना वारियर्स का भी वर्ली आर्ट के जरिए इन्होंने चित्रण किया है।

आदिवासी जाति की वर्ली लोक कला कितनी पुरानी है, इस बारे में कह पाना कठिन होगा, मगर इस कला में कहानियों को चित्रित किया जाता रहा है। वर्ली कलाकृतियाँ विशेष रूप से विवाह के समय बनाई जाती थीं और इन्हें बहुत शुभ माना जाता था।

तुलसीदास पटेल

आमतौर पर वर्ली कला में खेत-खलिहान, तीज-त्योहार और वनवासियों की जीवनशैली का चित्रण ही होता है। हिंदुस्तानी पारंपरिक कला और कोरोना परिदृश्य को बड़े ही नायाब तरीके से तुलसीदास भाई ने अपने घर की चार दीवारी पर उतारा है। आज आसपास के लोग पाठकवाड़ी गाँव सिर्फ इसलिए पहुँच रहे हैं ताकि तुलसीदास के जुनून को निहार पाएं।

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सूरत में बतौर शिक्षक के रूप में कार्यरत तुलसीदास 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "मैं गाँव में अपने घर लौट कर उसे सजाना चाहता था, मगर एक शिक्षक के तौर पर मुझे कभी समय नहीं मिल पाया, मगर लॉकडाउन के दौरान मुझे यह समय मिल सका। मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ गाँव आया और यहाँ मैंने आदिवासियों की वर्ली लोक से घर की चार दीवारी को सजाना शुरू किया।"

तुलसीदास कहते हैं, "करीब दो महीने मैंने समय दिया और अपने परिवार के साथ मैंने घर की दीवारों पर वर्ली कला के चित्र बनाये, मैंने कोविड-19 महामारी को लेकर भी चित्र बनाये, अब तो गाँव में मेरा घर देखने के लिए लोग लगातार आ रहे हैं, आसपास के गाँव से भी कई लोग आ चुके हैं।" तुलसीदास की इस जानकारी को साझा करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है। मोबाइल, कम्प्यूटर और डिजिटल क्रांति के दौर में एक कलाकार और शिक्षक ऐसा ही भी है जो वर्ली जैसी खूबसूरत कला को जिंदा रखना चाहता है। उसे बचाने की पूरी कवायद करता है, फिर परिस्थितियां चाहे जैसी भी क्यों न हो।

आप मिसाल हैं तुलसीदास भाई, आपको सलाम है। आपने जो कर दिखाया, जुनून शायद इसी को कहते हैं।

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