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एक विदेशी महिला जिसने भारत की अाज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए छोड़ दिया था अपना देश

Anusha MishraAnusha Mishra   13 Oct 2017 3:21 PM GMT

एक विदेशी महिला जिसने भारत की अाज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए छोड़ दिया था अपना देशसिस्टर निवेदिता

लखनऊ। आयरलैंड की रहने वाली एक महिला जो विवेकानंद की शिष्य थी, भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ने यहां आई और यहीं की होकर रह गई। हम बात कर रहे हैं मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल यानि सिस्टर निवेदिता की। आज यानि 13 अक्टूबर को सिस्टर निवेदिता की पुण्यतिथि है।

28 अक्टूबर 1867 को जन्मीं सिस्टर निवेदिता का शुरुआती जीवन आयरलैंड में ही बीता। उन्होंने कला और संगीत की शिक्षा और एक शिक्षक के तौर पर नौकरी करने लगीं। वह 17 वर्ष की आयु में एक शिक्षक बन गई। उन्होंने आयरलैंड और इंग्लैंड के विभिन्न स्कूलों में पढ़ाया और 1892 में विंबलडन में अपना स्वयं का स्कूल स्थापित किया उनके जीवन में बहुत बड़ा बदलवा तब आया जब 1895 में विवेकानंद लंदन गए और सिस्टर निवेदिता की उनसे मुलाकात हुई। विवेकानंद की बातों और जीवन का उनपर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने अपना देश छोड़कर भारत को अपनी कर्मभूमि बना लिया।

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1898 में सिस्टर निवेदिता भारत आ गईं और यहीं वह मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल से सिस्टर निवेदिता बन गईं। उन्होंने 25 मार्च 1898 को विवेकानंद से दीक्षा ली और भगवान बुद्ध के बताए हुए शांति के रास्ते पर चलने का प्रण भी। विवेकानंद ने ही उन्हें निवेदिता नाम दिया था। शुरुआत में कुछ दिन उन्होंने अपने गुरु स्वामी विवेकानंद के साथ भारत भर की यात्रा की। इसके बाद वो कोलकाता में बस गईं और यहीं से उन्होंने भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत यानि महिला शिक्षा के लिए काम करना शुरू किया। यहां उन्होंने लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला।

भारत के लोग आज भी जिन विदेशियों को सम्मान देते हैं उनमें आइरिश महिला सिस्टर निवेदिता का नाम शामिल है। उनके संपर्क में रवीन्द्रनाथ टैगोर, जगदीश चन्द्र बसु, अवनीन्द्रनाथ ठाकुर और नंदलाल बोस जैसे लोग थे। उन्होंने रमेशचन्द्र दत्त और यदुनाथ सरकार को भारतीय नजरिए से इतिहास लिखने की प्रेरणा दी। विवेकानंद-रामकृष्ण की निवेदिता नाम से उन्होंने भारतीय संस्कृति, दर्शन, कला और इतिहास के कई पहलुओं पर लिखा। उन्होंने अपने लेखन और सार्वजनिक बैठकों में दोनों में ही भारतीय-राष्ट्रवादी विचारों को बढ़ावा दिया।

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शुरुआत में जब सिस्टर निवेदिता भारत आईं तब उन्हें लगा कि हमें ब्रिटिश सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहिए लेकिन बाद में जब उन्होंने अंग्रेज़ों का भारत के साथ व्यवहार देखा तो उन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने की ठान ली। हालांकि उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से किसी भी आंदोलन में कभी हिस्सा नहीं लिया लेकिन आज़ादी के लिए लड़ रहे लोगों की ढाल बनकर वह हमेशा खड़ी रहीं। सिस्टर निवेदिता दुर्गापूजा की छुट्टियों में भ्रमण के लिए दार्जीलिंग गई थीं वहां उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और 13 अक्टूबर 1911 को 44 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

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