प्रधानमंत्री मोदी का विपक्ष कोई पार्टी नहीं, अब किसान हैं?

हाल के बरसों में देश में भर में होने वाले किसान आंदोलनों और देश की राजनीति पर पड़ने वाले उसके असर की समीक्षा कर रहे हैं गांव कनेक्शन के डिप्टी न्यूज एडिटर अरविंद शुक्ला।

प्रधानमंत्री मोदी का विपक्ष कोई पार्टी नहीं, अब किसान हैं?

लखनऊ। वर्ष 2019 में जब देश में आम चुनाव होंगे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने विरोधी पार्टियों का समूह जरूर होगा, लेकिन ऐसे आसार लगने लगे हैं कि अब असली विपक्ष देश के किसान होंगे। यह लगातार दूसरा साल है जब देश में किसान और किसान संगठनों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।

देश के कई राज्यों में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संगठन अपनी मांगों को लेकर लगातार सड़क पर उतर रहे हैं। दो अक्टूबर पर दिल्ली को जाम करने के लिए भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व में हजारों किसान राष्ट्रीय राजधानी की सीमा पर डटे हैं। भारतीय किसान यूनियन की नेतृत्व में २३ सितंबर से हरिद्वार से किसान क्रांति यात्रा निकाली गई है, जिसमें १०-15 हजार किसान शामिल हैं। वहीं 2 अक्टूबर को जमीन पर अधिकार को लेकर एकता परिषद के नेतृत्व में 25 हजार ग्वालियर से पैदल ही दिल्ली के लिए कूच करेंगे। इससे पहले मुंबई में किसानों का लॉग मार्च, अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति की किसान मुक्ति यात्रा भी सरकार पर दबाव बना चुके हैं।

बीकेयू की किसान क्रांति यात्रा में यूपी, हरियाणा, पंजाब समेत कई राज्यों के किसान शामिल हैं। यात्रा में शामिल फिरोजपुर के अमरीक सिंह कहते हैं, "फसलों की लागत और उसकी कीमत में जमीन आसमान का फर्क है। लेबर, ट्रैक्टर, डीजल, सिंचाई और कीटनाशक मिलाकर लागत बहुत ज्यादा हो जाती है, और दाम उतने मिलते नहीं, यही समस्या है।" वहीं भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गौरव टिकैट ने कहा- 2014 में किए गए वादे नहीं पूरे किए। किसान अब जाग गए हैं। उन्हें अपना हक चाहिए।" किसान नेताओं का कहना है कि सरकार उनके मन की बात नहीं सुन रही।

भारतीय किसान यूनियन की किसान क्रांति यात्रा में शामिल हैं कई राज्योंं को हजारों किसान। फोटो- रणविजय सिंहभारतीय किसान यूनियन की किसान क्रांति यात्रा में शामिल हैं कई राज्योंं को हजारों किसान। फोटो- रणविजय सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीती 20 जून को किसानों से सीधी वार्ता के बाद सोशल मीडिया पर कई सवाल उठे। प्याज-लहसुन जैसी माटी मोल फसलों और किसानों की आत्महत्या पर प्रधानमंत्री की चुप्पी की लोगों ने आलोचना की। इसी दिन दिल्ली से करीब 700 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के मंदसौर में कर्ज़ में दबे काचरीया कदमाला गाँव के भवरलाल रूपालाल (55 वर्ष) ने खेत में फांसी लगाकर जान दे दी।

यह किसान अपना एक बीघा खेत बेचने के बाद भी कर्ज़ नहीं चुका पाया था, जबकि सरकार के ही आखिरी मौजूद आंकड़ों (नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो या एनसीआरबी की रिपोर्ट) के मुताबिक देश में औसतन 34 किसान और खेतिहर मजदूर रोजाना आत्महत्या करते हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2015 में 8,007 किसान और 4,595 खेतिहर मजदूर, जबकि 2014 में 5,650 किसान और 6,710 मजदूरों ने जान दी। वर्ष 2016 और 17 के आंकड़े प्रकाशित नहीं किए गए हैं। पिछले वर्ष 2017 में 2 मई को सुप्रीम कोर्ट को सरकार ने बताया था कि वर्ष 2013 से औसतन हर साल 12,000 किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषक और स्वराज अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव ने ट्वीट किया, "मोदीजी हम एक बार, सिर्फ एक बार, आपके मुंह से 'किसानों की आत्महत्या' का जिक्र सुनना चाहते हैं। समाधान नहीं है तो कोई बात नहीं, समस्या है इतना तो मान लो।"

"देश का किसान बहुत संकट में है। खेती और किसानों की समस्या सुलझाने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए। जब जीएसटी के लिए रात में विशेष संसद का सत्र बुलाया जा सकता हैं तो किसानों के मुद्दे पर क्यों नहीं? देश में अब तक साढ़े तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं।" वीएम सिंह

क्या किसानों को मिलेगी अहमियत ?


लहसुन के किसान अपनी फसल माटी के मोल नहीं बेचना चाहते,लिहाजा मंडी नहीं ले जा रहे हैं

मंदसौर में किसान आंदोलन के बाद बनी 194 किसान संगठनों वाली किसान समन्वय संघर्ष समिति के संयोजक वीएम सिंह कहते हैं, "देश का किसान बहुत संकट में है। खेती और किसानों की समस्या सुलझाने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए। जब जीएसटी के लिए रात में विशेष संसद का सत्र बुलाया जा सकता हैं तो किसानों के मुद्दे पर क्यों नहीं? देश में अब तक साढ़े तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं।"

वो आगे बताते हैं, "देश में ऐसा पहले हो चुका है, 11 दिसंबर 2003 में जब उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के मुंडेरवा में तीन गन्ना किसान शहीद हुए थे तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने दो दिन का सत्र बुलाया था।" किसान समन्वय समिति ने दो बिल संसद में निजी विधेयक के तौर पर पेश किए हैं, जिसमें किसानों की कर्ज़माफी और फसलों की एमएसपी देने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने की मांग हो रही है।

इस बार के मानसून सत्र में ये मुद्दा गर्मा सकता है। किसानों की सबसे बड़ी समस्या खेती की लागत और उसके बाद उपज का मूल्य न मिलना है। पिछले 2016 और 2017 में प्याज 50 पैसे प्रति किलो बिक चुका है, जब लहसुन के किसान अपनी उपज को 2-3 रुपए प्रति किलो के दाम बेचने को मजबूर हुए तो उन्होंने फसल मंडी ले जानी ही बंद कर दी। किसानों की सबसे बड़ी समस्या खेती की लागत और उसके बाद उपज का मूल्य न मिलना है। जिसका सीधा असर उनके कर्ज़ और आमदनी पर पड़ता है।

ऐसे कैसे हो पाएगी किसान की आमदनी दोगुनी

"मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से पहले सोयाबीन 5,000-6,000 रुपए प्रति कुंतल बिक रही थी, इस साल 2,200 रुपए में बेचना पड़ा। वहीं, लहसुन साल 2015 में 15,000 रुपए प्रति कुंतल बिका था, 2018 में 200 रुपए तक में बेचने की नौबत आ गई। प्याज, चना, सरसों, मेथी, मसूर, ईसबगोल सबके दाम आधे रह गए हैं," किसान इंदर सिंह चौहान, गर्रावद जिला मंदसौर, कहते हैं।

"मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से पहले सोयाबीन 5,000-6,000 रुपए प्रति कुंतल बिक रही थी, इस साल 2,200 रुपए में बेचना पड़ा। वहीं, लहसुन साल 2015 में 15,000 रुपए प्रति कुंतल बिका था, 2018 में 200 रुपए तक में बेचने की नौबत आ गई। प्याज, चना, सरसों, मेथी, मसूर, ईसबगोल सबके दाम आधे रह गए हैं," किसान इंदर सिंह चौहान, गर्रावद जिला मंदसौर, कहते हैं।

इंदर सिंह चौहान की बात दोहराने वाले हजारों किसान हैं तो आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। पिछले चार वर्षों में किसानों की आमदनी में महज 0.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएसओ) की पिछली रिपोर्ट 2012-13 के मुताबिक किसान की मासिक आमदनी 6426 रुपए है, जबकि ये आमदनी 2002-03 में महज 2115 रुपए महीना थी। एनएसएसओ हर 10 साल पर किसानों की आमदनी पर सांकेतिक सर्वे करता है। अगला सर्वे 2022-23 में होना है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर इसी सर्वे में किसानों की आमदनी दोगुनी होने की बात करते हैं, लेकिन ये आमदनी किस अनुपात में दोगुनी होगी, किस किसान तक पहुंचेगी, किस पैसे को सरकार आमदनी मानती है इस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

कृषि अर्थशास्त्री भगवान मीणा सवाल करते हैं कि जब बरसों से कृषि विकास दर ही नहीं बढ़ पाई है तो किसानों की आमदनी 2022 तक कैसे दोगुनी हो पाएगी। मौजूदा सरकार के समय में यह महज 1.9 फीसदी है।


एमएसपी डेढ़ गुना करने के वादे पर किसान को भरोसा नहीं

वर्ष 2018-19 के आम बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि सरकार ने वादे के मुताबिक (स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश) गेहूं समेत कई फसलों का समर्थन मूल्य डेढ़ गुना कर दिया है। लेकिन कृषि विशेषज्ञों और किसान संगठनों ने इसे कागजी वादा बताया क्योंकि सरकार ने डेढ़ गुना मूल्य ए2 पर दिया, जिसमें फसल उत्पादन में सभी तरह के नगदी खर्च शामिल होते हैं, जैसे बीच, खाद, केमिकल, सिंचाई, मजदूरी आदि। लेकिन किसान संगठन एफएल के साथ साथ सी-2 चाहते हैं। सी-2 लागत में फसल उत्पादन में आई नकदी और गैर नकदी के साथ ही जमीन पर लगने वाले लीज रेंट और जमीन के अलावा दूसरी कृषि पूंजियों पर लगने वाला ब्याज भी शामिल होता है।

वीएम सिंह कहते हैं, "200 ग्राम की डबल रोटी में क्या सिर्फ आटे की कीमत जुड़ी होती हैं, उसमें मैदे के साथ बिल्डिंग, मार्केटिंग, कंपनी पर लोग आदि जोड़कर रेट तय किया जाता है, फिर किसान को उसकी जमीन का किराया, ट्रैक्टर समेत दूसरे औजार, परिवार के लोगों की मेहनत का हिसाब क्यों न जोड़ा जाए। किसान अब बेवकूफ नहीं बनने वाला है। किसान जाग गया है, एकजुट किसान अपना हक लेकर रहेंगे।"

यह भी देखें: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किसान आत्महत्या और आंदोलनों पर चुप्पी से उठे सवाल

गांवबंदी के बाद किसानों ने दी वोटबंदी की चेतावनी

आखिर में वह ये भी जोड़ते हैं कि वह किसी पार्टी के साथ नहीं हैं जो किसानों की बात करेगा उसे ही समर्थन मिलेगा। किसान समन्वय समिति के अलावा किसानों के संगठनों का एक और धड़ा किसानों के लिए सरकार से दो-दो हाथ करने की बात कर रहा है। 1 जून से 10 जून तक सात राज्यों में गाँव बंद कर सब्जी, अनाज और दूध की सप्लाई रोकने के लिए 130 से ज्यादा किसान संगठनों ने हाथ मिलाया था।

राष्ट्रीय किसान महासंघ के बैनर तले किसानों की इस हड़ताल का व्यापक असर तो नहीं हुआ, लेकिन सरकारों पर मानसिक दवाब जरूर बना। इसी संघ से जुड़े आम किसान यूनियन के कोर सदस्य केदार सिरोही कहते हैं, "किसान सड़क पर दिखते तो आंदोलन जैसी बात होती लेकिन हम किसान तो गाँवों में बैठे थे। दूसरा पहले नोटबंदी हुई, फिर गाँवबंदी हुई और अब वोटबंदी होगी।"


किसान खेती की बढ़ती लागत और उपज का मूल्य न मिलने से परेशान हैं और देश भर में आंदोलन कर रहे हैं

2019 चुनावों में किसान की होगी अहम भूमिका

केदार सिरोही और वीएम सिंह की बातों का आशय है कि आगामी चुनावों में किसान विपक्ष के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है। कृषि प्रधान भारत की अर्थव्यवस्था ही सिर्फ खेती पर नहीं टिकी है, बल्कि सीधे तौर पर 50 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है। देश में करीब 14.72 करोड़ किसान हैं, खेतिहर मजदूरों की संख्या मिलाकर ये आंकड़ा 26 करोड के आसपास है, इन किसानों पर औसतन 50 हजार रुपए का कर्ज़ (संस्थागत और साहूकार आदि) है।

किसान खेती की बढ़ती लागत और उपज का मूल्य न मिलने से परेशान हैं। कई राज्यों में हुए किसान आंदोलन इसका उदाहरण हैं तो यूपी में कैराना से लेकर गुजरात के ग्रामीण इलाकों में विधानसभा चुनाव बीजेपी की हार इसका नतीजा।

देश के वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेई ने गुजरात चुनाव के बाद अपने एक लेख में लिखा था, "देश का ग्रामीण और किसान अगर 2019 में बीजेपी से बिफरा तो क्या होगा, क्योंकि इनकी संख्या 26 करोड़, 11 लाख से ज्यादा है। और 83 करोड़ वोटर वाले भारत में वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 17 करोड़ 14 लाख से कुछ ज्यादा ही वोट मिले थे।" गन्ने के गढ़ पश्चिमी यूपी में कैराना उप चुनाव में गन्ना किसान हार की बड़ी वजह माने गए।

मोदी सरकार भी भांप गई किसानों की नाराजगी

किसानों की इस नाराजगी को शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार भांप गई है। देश में लगातार किसानों के मुद्दे पर बात हो रही है। प्रधानमंत्री भी अपने भाषणों में लगातार किसानों का जिक्र करते हैं। किसान कल्याण कार्यशालाएं हो रही हैं। अच्छी बात ये भी है कि खेती-किसानी से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी आईसीएआर समेत दूसरे प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिक और कृषि जानकार लैब से निकलकर खेतों तक पहुंच रहे हैं।

आज किसानों के लिए यूरिया संकट नहीं है। वर्षों से अटकी पड़ी सिंचाई की योजनाओं को पूरा किया जा रहा है। गन्ना किसानों के बकाए को निपटाने के लिए चीनी उद्योग के लिए 8,000 करोड़ रुपए दिया गया है। कृषि अनुदान सीधे किसानों के खातों में पहुंच रहा है। जैविक खेती की बात हो रही है, और उसका दायरा बढ़ा है। लोग जैविक की तरफ जा रहे हैं। यूपी समेत कई राज्यों में किसानों के कर्जे माफ हुए।

किसान चाहते हैं उनके मन की बात सुनें प्रधानमंत्री

ये सब देखकर सरकार किसान के साथ खड़ी नजर आती है। लेकिन फिर ध्यान मध्य प्रदेश और हरियाणा की उन मंडियों का आता है, जहां किसानों की उपज बिकने के इंतजार में कई दिन पड़ी रहती है क्योंकि किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे के दाम मिल रहे होते हैं। सड़कों, खेतों, तालाबों में प्याज, लहसुन, टमाटर फेंके जाने की तस्वीरें आती हैं। फसल बीमा योजना के लाभ का इंतजार करते किसान दिखते हैं।

यूपी में लखीमपुर खीरी के धौरहरा ब्लॉक के पंडित पुरवा में रहने वाले प्रगतिशील किसान सुभ्रांत शुक्ला फेसबुक पर लिखते हैं, "प्रधानमंत्री को किसानों के मन की बात सुनाई नहीं पड़ती, वह बस अपने मन की बात किसानों को सुनाते हैं।" वहीं राकेश कुमार लिखते हैं, "एक बार पीएम को किसानों के साथ बैठकर उनकी बातें सुननी चाहिए ताकि असली समस्या जानी जा सकें।"

पी साई नाथ का लेख - बेदख़ल लोगों का लंबा मार्चः चलो दिल्ली

ह भी देखें: यकीन मानिए ये वीडियो देखकर आपके मन में किसानों के लिए इज्जत बढ़ जाएगी …

नोटबंदी, जीएसटी समेत कई बड़े फैसले लेने वाली मोदी सरकार के खिलाफ लामबंद हो रहे विपक्ष के पास मई 2017 के पहले कोई धारदार मुद्दा नहीं था, लेकिन महाराष्ट्र से शुरू हुए किसान आंदोलन ने जून 2017 में कई राज्यों को अपनी चपेट में ले लिया था। 6 जून 2017 को मंदसौर में पुलिस के हाथों 6 किसानों की मौत के बाद हालात तेजी से बदले। किसान संगठन एकजुट हुए, दिल्ली तक कूच किया और फिर इस वर्ष 1 जून से गाँव बंद और किसानों की हड़ताल हुई, जिसके बाद वोटबंदी की चेतावनी मिली है।

इससे पहले कई राजनीतिक विश्षेलक तक मोदी सरकार को 2024 तक अजेय मान रहे थे, लेकिन अब सामने 2019 है और परिस्थितियां थोड़ी बदली हुई। आखिरी एक साल में नरेंद्र मोदी किसानों को कितना संतुष्ट कर पाते हैं, इस पर काफी कुछ निर्भर करेगा।

गन्ना उत्पादक किसान सुभ्रांत ने 2014 में मोदी सरकार बनने पर बेहतरी की उम्मीद जताई थी। सुभ्रांत जैसे किसानों की संख्या काफी अधिक है, जो कभी सड़क तो कभी ईवीएम के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर करते हैं।

देश में खेती और किसानी की स्थिति को देखते हुए देश के जानेमाने कृषि पत्रकार पी साईनाथ संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने की लगातार मांग करते रहे हैैं। उन्होंने पिछले दिनों एक लेख में लिखा, "एक लोकतांत्रिक विरोध की कल्पना करें जहां लाखों किसान, मज़दूर और अन्य लोग राजधानी तक मार्च करें और सांसदों को मजबूर करें कि वे देश के गंभीर संकट पर चर्चा के लिए तीन सप्ताह का संसद का एक विशेष सत्र बुलाएं।"



किसानों की व्यथा आंकड़ों में

34 किसान और खेतिहर मजदूर औसतन रोजाना करते हैं आत्महत्या (एनसीआरबी रिपोर्ट-2015)

12,000 किसान सालभर में करते हैं आत्महत्या (2017 में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया)

6426 रुपए किसान की मासिक आय है, देश में एनएसओ की 2012-13 की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2002-03 में ये थी 2115 रुपए

14.72 करोड़ हैं देश में किसानों की संख्या, खेतिहर मजदूर मिलाकर ये आंकड़ा 26 करोड़ के पार

50 हजार रुपए का औसतन कर्ज हैं देश के हर एक किसान पर

17 करोड़ 14 लाख मत मिले थे भाजपा को 2014 के आम चुनाव में

20000 रुपए से कम है मध्यम वर्ग के किसान की सालाना आमदनी, औसतन 20 हजार रुपए प्रतिमाह है देश में एक सरकारी चपरासी की तनख्वाह

1.9 प्रतिशत कृषि विकास दर दर्ज की गई वर्ष 2014-2018 के दौरान, जो वर्ष 2005-2014 के दौरान 3.7 प्रतिशत थी

यह भी देखें: 'सरकारी कर्मचारी हड़ताल करता है तो उसकी तनख्वाह बढ़ जाती है, लेकिन किसानों की सुनने वाला कोई नहीं'

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