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राजस्थानः ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी पशु पालन कोरोना की वजह से तबाह

कोरोना संकट में प्रदेश सरकार ने कोई राहत पैकेज भी नहीं दिया बल्कि पहले से ऊंट पालकों के लिए चल रही योजना भी बंद कर दी, राजस्थान में लगने वाला पशु मेला भी इस बार नहीं लग पाएगा, जिससे पशुपालकों को और नुकसान हो जाएगा।

Madhav SharmaMadhav Sharma   1 Sep 2020 6:51 AM GMT

राजस्थानः ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी पशु पालन कोरोना की वजह से तबाह

जयपुर (राजस्थान)। राजस्थान में भेड़-बकरियों और ऊंटों के सहारे हजारों परिवारों का घर चलता है, लेकिन कोरोना संकट के चलते पिछले कुछ महीनों में सब बर्बाद हो गए हैं।

मो. आसिफ़ कुरैशी नागौर जिले में मकराना कस्बे के रहने वाले हैं। परंपरागत बकरे खरीदने-बेचने का काम करने वाले कुरैशी मकराना की प्रसिद्ध बकरा मंडी में ईद पर भी बकरे बेचते हैं। इस साल के बाजार से काफी दुखी हैं और उन्हें घाटा हुआ है।

आसिफ़ कहते हैं, "अच्छी नस्ल के एक साल तक के बकरे पर करीब 30 हजार रुपए खर्चा होता है। मंडी में पिछले साल हमने 45-55 हजार तक में बकरे बेचे, लेकिन इस बार कोई भी बकरा 15 हजार से ज्यादा का नहीं बिक सका। पहले बकरे का भाव 500 से 600 रुपए किलो रहता था, लेकिन इस ईद को 250-300 रुपए किलो में ही बेचना पड़ा है। हर साल 50 बकरे बेचता था। खरीददार नहीं थे इसलिए इस बार सिर्फ 10 ही बिके। ईद पर बेचे गए बकरों से नए बकरे खरीदता था और बाकी बची रकम से घर का खर्च चलता था। इस बार कोरोना के कारण सब कुछ बर्बाद हो गया।"

आसिफ आगे बताते हैं कि बिक्री नहीं होने से अभी भी 10 बकरे उनके घर पर बंधे हैं। इन्हें चराना भी काफी महंगा हो रहा है। हमारी आर्थिक तंगी के कारण अच्छी नस्ल के बकरे कमजोर होकर मर रहे हैं। सरकार को हम जैसे पशु पालकों के बारे में जल्दी कुछ सोचना चाहिए।

जैसलेमर के झिनझिनयाली गांव के बकरी पालक सुरेन्द्र सिंह

वे कहते हैं, "त्योहार के अलावा हमारे बकरे दिल्ली, मुंबई और अन्य राज्यों में सप्लाई होते हैं। इस बार मांग बहुत कम है। लॉकडाउन खुलने के बाद भी 50% काम ही शुरू हो पाया है।"

मकराना मंडी की मंदी से सिर्फ कुरैशी ही पीड़ित नहीं हैं। सैंकड़ों पशु पालक और व्यापारियों को लाखों का घाटा हुआ है। स्थानीय पत्रकार जावेद बताते हैं कि मंडी में मकराना विधानसभा क्षेत्र की 40 ग्राम पंचायतों के करीब 200 गांव से खरीददार आते हैं, लेकिन पिछले सालों की तुलना में इस बार भीड़ बेहद कम थी। ईद के मौके पर अकेली इस मंडी से 8-10 हजार बकरे और भेड़ बिकती थीं, लेकिन इस बार ये संख्या सिर्फ दो हजार ही रही। कारण बताते हुए भाटी कहते हैं, "एक तो लोगों में यह भ्रम फैल गया कि मीट की वजह से कोरोना वायरस फैल रहा है। दूसरा, लोगों के पास नकदी नहीं थी इससे ग्राहकी कम हुई। तीसरा, जो पशु पालक गांव-गांव जाकर बकरे और भेड़ बेचते थे, वे संक्रमण और कई पाबंदियों के कारण ऐसा नहीं कर पाए।"

पशु पालकों को 60 करोड़ का नुकसान, सभी 10 बड़े पशु मेले स्थगित

तकनीकी के बढ़ने और जानवरों की उपयोगिता लगातार घटने के कारण पशु पालन राजस्थान सहित पूरे देश में गंभीर संकट से गुजर रहा है। कोरोना ने इस संकट की गति को बढ़ा दिया है। छोटे पशु पालकों को दूसरे राज्यों में पशु भेजे जाने पर अभी भी कई दिक्कतें पेश आ रही हैं। बकरे और भेड़ों की दिल्ली, महाराष्ट्र में बड़ी मांग है, लेकिन लॉकडाउन के दौरान ये सप्लाई बिलकुल ठप हो गई। अब रियायत मिली है, लेकिन व्यवसाय पटरी पर नहीं लौटा है।

बड़े जानवरों जैसे ऊंट और घोड़े पालने वाले किसानों के सामने समस्या बड़ी है। राजस्थान सरकार की ओर से साल में लगने वाले 10 बड़े पशु मेले इस बार कोरोना के कारण स्थगित किए गए हैं। आने वाले महीनों में भी मेले आयोजित होने की संभावना ना के बराबर है। मेलों के ना लगने से राज्य सरकार को रवन्ने की आय का नुकसान है, लेकिन पशुपालकों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। साथ ही अब जानवरों का खर्चा उठाना भी भारी पड़ रहा है।

पुष्कर मेले में बिकने आए ऊंट (फाइल फोटो)

राजस्थान में पशुपालन विभाग की ओर से 10 राज्य स्तरीय पशु मेलों का आयोजन किया जाता है। कार्तिक पशु मेला (पुष्कर), गोमती सागर, चंद्रभागा पशु मेला (झालरापाटन, झालावाड़), गोगामेड़ी पशु मेला (हनुमानगढ़), वीर तेजाजी मेला (परबतसर, नागौर), जसवंत पशु मेला (भरतपुर), बाबा रामदेव पशुमेला (नागौर), महाशिवरात्रि पशु मेला (करौली), मल्लीनाथ पशु मेला (तिलवाड़ा, बाड़मेर) और नागौर जिले के मेड़ता सिटी में बलदेव पशु मेले का आयोजन होता है। इसके अलावा राजस्थान में 250 से ज्यादा पशु मेले पंचायत या पंचायत समिति स्तर पर लगते हैं। इनमें शेरगढ़, आगोलाई मेला (जोधपुर), सिंदड़ी पशु मेला (बाड़मेर) काफी प्रसिद्ध हैं।

इन मेलों के नहीं लगने से खेती और पशु पालन से सालभर खर्चा चलाने वाले किसान की आमदनी का चक्र टूट गया है। क्योंकि फसल को पहले टिड्डियों ने नुकसान पहुंचाया और बाद में जो फसल पकी वो लॉक डाउन में परिवहन नहीं होने के कारण मंडियों तक नहीं पहुंची। हालांकि राज्य सरकार ने फसली कामों के लिए परिवहन की छूट दी थी, लेकिन इसका निजी ट्रांसपोर्टरों ने फायदा उठाया और किसानों से ज्यादा भाड़ा वसूला। इसके अलावा गैर-फसली दिनों में पशु मेलों में अपनी मवेशी बेचकर गुजर करने वाले छोटे किसान और पशु पालक मेलों के नहीं लगने से दुखी हैं।

जैसलमेर के सांवता गांव के रहने वाले सुमेर सिंह भाटी क्षेत्र के बड़े पशु पालक हैं। उनके पास 400 ऊंट हैं। वे बताते हैं, 'बाड़मेर जिले के तिलवाड़ा में हर साल अप्रेल महीने में मल्लीनाथ पशुमेला भरता है। राजस्थान सरकार का पशुपालन विभाग इसे आयोजित करवाता है, लेकिन कोरोना के चलते इस बार मेला नहीं लगा।' वे आगे बताते हैं, 'मेले में प्रदेश के चार जिले जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर और जोधपुर से लाखों पशु पालक आते हैं। इसके अलावा गुजरात से भी बड़ी संख्या में ऊंट, घोड़ा पालक खरीद-बिक्री के लिए आते हैं। पशुओं के व्यापार के अलावा उनके श्रृंगार का सामान बेचने वाले लोगों के सामने भी आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। नए जानवर खरीदने-बेचने से हमारा व्यवसाय चलता रहता है, लेकिन कोरोना और सरकारी उदासीनता ने पशुपालकों को मझधार में छोड़ दिया है।'

राज्य स्तरीय इन मेलों के नहीं लगने से पशुपालकों को कम से कम 60 करोड़ रुपए का व्यवसाय प्रभावित हुआ है। इसमें पशुओं की खरीद-बिक्री, चारा, श्रृंगार का सामान सहित पर्यटन भी शामिल है। विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 2019 में पशुपालकों को 23.41 करोड़ रुपए की आय हुई। 2018 में करीब 30 करोड़ की आय पशुपालकों को हुई थी। इस बार मेले नहीं लगने के कारण सीधे तौर पर पशु पालकों का करोड़ों का नुकसान हुआ है।

घोड़े पालने वाले वीर सिंह जी। वीर सिंह अच्छी नस्ल के घोड़ों का व्यापार करते हैं, लेकिन इस बार मेले नहीं लगने से घोड़े नहीं बेच पाए हैं।

सुमेर सरकारी उदासीनता से भी काफी दुखी हैं। कहते हैं, '2016 में सरकार ने उष्ट्र विकास योजना शुरू की थी। इसमें ऊंट वंश के पैदा होने पर 10 हजार रुपए तक की आर्थिक सहायता पशुपालक को मिलती थी। बीते दो साल से ये राशि पशुपालकों को नहीं मिल रही है। हम कई बार अपनी मांग अधिकारियों तक पहुंचा चुके हैं, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हो रही।'

पशुपालन व्यवसाय पर कोरोना के असर के संदर्भ में गांव कनेक्शन ने पशुपालन विभाग, राजस्थान के डायरेक्टर डॉ. वीरेन्द्र सिंह से बात की। उन्होंने कहा, कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते मेले रद्द किए गए हैं। क्योंकि इन पशु मेलों के आयोजन में लोगों की धार्मिक भावनाएं भी जुड़ी हैं। इसीलिए ज्यादातर मेलों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी पहुंचते हैं। हम संक्रमण का खतरा मोल नहीं ले सकते। निश्चित रूप से किसानों और पशु पालकों को आर्थिक नुकसान हुआ है। विभाग को भी रवन्ने से होने वाली आय नहीं हुई है।'

पशुपालन से संबंधित उद्योग भी प्रभावित

पशुओं की खरीद- बिक्री के अलावा इससे संबंधित व्यवसाय भी खासे प्रभावित हुए हैं। मटन-चिकन, मिठाई, मावा, पनीर जैसे उद्योगों पर लॉक डाउन का काफी असर हुआ है। इस असर पर राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर के संस्थापक वाइस चांसलर रहे प्रोफेसर अजय कुमार गहलोत ने गांव कनेक्शन से विस्तार से बात की। उन्होंने बताया, 'पशु मेलों में पशु पालकों को उनके जानवरों की अच्छी कीमत मिलती थी। जो पशु बेचने लायक हो गए हैं या तो उन्हें वे कम कीमत पर स्थानीय बाजारों में बेचना पड़ रहा है या फिर उनको पालने का एक्स्ट्रा खर्चा वहन करना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए एक ऊंट पर सालभर में 70-80 हजार रुपए खर्चा आता है। अगर मेले लगते तो पशु पालक इस खर्चे से बच सकते थे।'

वे आगे बताते हैं, 'कोरोना के कारण मीट सेक्टर बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। शुरूआती दो लॉकडाउन में यातायात पर भी प्रतिबंध था इसीलिए बकरी, भेड़ जैसे पशु बाहर नहीं जा सके। इसके अलावा मीट और चिकन से कोरोना फैलने की अफवाह ने पोल्ट्री, चिकन इंड्रस्टी पर बुरा असर डाला। पूरे देश में पोल्ट्री सेक्टर का 1.20 लाख करोड़ रुपए का बिजनेस है। राजस्थान से रोजाना करीब 50 हजार बकरी और भेड़े दूसरे राज्यों में जाते थे, जो कोरोना के कारण बंद हो गए या कम हो गए। आंकड़े बता रहे हैं कि देश में पोल्ट्री इंड्रस्टी को करीब 50-60 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।इसी तरह दूध व्यवसाय में शुरूआत में गिरावट आई, लेकिन बाद में ये तेजी से संभला भी। अभी भी पनीर, मावा और मिठाई सेक्टर एक तिहाई ही उबर सका है। ऐसा इसीलिए है कि अभी भी सामुहिक कार्यक्रम और मंदिरों को अभी तक नहीं खोला गया है। शादी, पार्टियों और मंदिरों के प्रसाद में पनीर, मावा, घी की अच्छी मात्रा में खपत होती है।'

बता दें कि देश में दूध का 7-8 लाख करोड़ रुपए का व्यवसाय है। हालांकि इस क्षेत्र में कोरोना के असर का कोई व्यापक शोध या सर्वे नहीं हुआ है, इसीलिए आधिकारिक आंकड़ों की बेहद कमी है।

'अपनाना होगा डॉ. कुरियन का मॉडल'

राजस्थान के पशुपालन विभाग में निदेशक पद पर रह चुके डॉ. एम एल परिहार पशुपालन क्षेत्र की बर्बादी के पीछे ब्यूरोक्रेसी और राजनीति को मानते हैं। उनका मानना है कि ग्रामीण विकास की सारी शक्तियां ब्यूरोक्रेट्स को देने की बजाय पशुपालकों को देनी होगी क्योंकि गांव के विकास में अफसरशाही ही सबसे बड़ी बाधा है।

वे आगे कहते हैं, 'नीतियों की कमी के कारण चारागाह नष्ट हुए। युवाओं को ये सेक्टर आकर्षित नहीं कर पाया। पशु मेले बर्बाद हुए और पशुपालकों को हेय नजरों से देखा जाने लगा। यही कारण है कि जो लोग 20 साल पहले तक किसान या पशुपालक थे, वे शहरों में मजदूर बन गए। लॉकडाउन में ये पशुपालक ही सड़कों पर नंगे पैर चल रहे थे।'

परिहार कहते हैं, 'जो संकट हमें पूरे देश में नजर आया वो गुजरात के ग्रामीणों में नहीं दिखा। क्योंकि वहां ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार आज भी पशुपालन है। डॉ. कुरियन का गिर गाय और मुर्रा भैंस पालन से कोऑपरेटिव मूवमेंट का ही असर है कि लॉकडाउन पलायन में गुजरात का ग्रामीण ना के बराबर था। इसीलिए गांवों के विकास के लिए पशुपालन को बढ़ावा देना होगा और उसमें डॉ. कुरियन के कोऑपरिटव मॉडल को अपनाना होगा।'

क्यों जरूरी है पशुपालन पर ध्यान देना?

राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का 55 फीसदी भाग मरुस्थल है।करीब 75% जनसंख्या गांवों में रहती है। 2019 पशुगणना के अनुसार प्रदेश में करीब 5.67 करोड़ मवेशी है। इसमें 1.39 गौवंश, 1.36 भैंस, 80 लाख भेड़, 2.08 करोड़ बकरी और करीब 2.13 लाख ऊंट शामिल हैं। देश के कुल दूध उत्पादन में राजस्थान का 12% और ऊन उत्पादन में 31% का योगदान है। राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पशुपालन का 10 फीसदी शेयर है। जबकि कृषि और पशुपालन पूरी एसजीडीपी में 22% का योगदान करते हैं। इसके अलावा तथ्य है कि प्रदेश के 52 फीसदी किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम कृषि भूमि है। कम बरसात या गैर कृषि सीजन में वे पशुपालन के भरोसे ही जीवन यापन करते हैं। इसीलिए राजस्थान के लिए कहा जाता है कि अकाल और लगातार सूखे के बाद भी यहां का किसान आत्महत्या नहीं करता, लेकिन पशुपालन की लगातार अनदेखी आने वाले समय में इस कहावत को झुठलाने पर तुली हुई है।

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