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किसान आंदोलन: गहमागहमी के बीच बेनतीजा रही वार्ता, कृषि कानूनों की वापसी पर फंसा पेंच, ये है आगे की रणनीति

सरकार और किसानों के बीच 8वें दौर की वार्ता गरमागरमी भरे माहौल में हुई। सरकार ने कहा कि वो कृषि कानूनों को वापस नहीं ले सकती क्योंकि बहुत सारे बहुत सारे किसान और किसान संगठन नए कानूनों के पक्ष में हैं, वहीं किसान संगठन कानून वापसी पर अड़े हुए हैं...

किसान आंदोलन: गहमागहमी के बीच बेनतीजा रही वार्ता, कृषि कानूनों की वापसी पर फंसा पेंच, ये है आगे की रणनीति

नई दिल्ली। किसान आंदोलन खत्म नहीं होगा, सरकार और किसानों के बीच विज्ञान भवन में हुई वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई है। अगली वार्ता 15 जनवरी को होगी, इस बीच किसानों ने ऐलान किया है कि अगर अगली बैठक में भी बिल वापस नहीं हुए तो दिल्ली में गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर परेड होकर रहेगी।

आठवें दौर की बैठक से बाहर निकले पश्चिम बंगाल के पूर्व सांसद अखिल भारतीय किसान महासभा से जुड़े हन्नान मोल्लाह ने कहा कि बैठक तनातनी वाली रही। किसानों ने कहा कि हमें कृषि कानूनों की वापसी के अलावा कुछ मंजूर नहीं है। हम किसी अदालत में नहीं जाएंगे। या तो कानून रद्द होंगे या हम लोग लड़ाई (आंदोलन) जारी रखेंगे। 26 जनवरी की हमारी ट्रैक्टर परेड योजना के अनुसार होगी।"

वहीं किसान मजदूर संघर्ष कमेटी पंजाब के प्रदेश महासचिव सरवन सिंह पंधेर ने कहा,"केंद्र सरकार हम वापस नहीं ले सकते, सरकार ने कहा क्योंकि बहुत सारे किसान और किसान संगठन कृषि कानूनों के समर्थन में हैं। सरकार अपनी बातों पर अड़ी हुई है। लेकिन किसान संगठनों ने कहा कि कानूनों की वापसी ही हमारी प्रमुख मांग है।

बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा, "बैठक में कृषि कानूनों पर चर्चा हुई लेकिन कोई निर्णय नहीं हो सका। सरकार ने किसान संगठनों से आग्रह किया था कि कृषि कानूनों को निरस्त करने के अलावा कोई और विकल्प दिया जाए तो हम विचार करेंगे, लेकिन विकल्प नहीं दिया गया। अगली बैठक 15 जनवरी को होगी।"

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार बैठक में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि कृषि सुधार कानूनों को देशव्यापी समग्रता की दृष्टि से एवं देश के किसानों के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। सरकार को किसानों की पूरी चिंता है तथा सरकार चाहती है कि आंदोलन जल्द से जल्द समाप्त हो, परन्तु सरकार के सुझाव के अनुसार विकल्पों पर अभी तक प्रावधानिक चर्चा न होने के कारण उचित निर्णय तथा समाधान नहीं हो पाया है। कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार किसान प्रतिनिधियों के साथ खुले मन से चर्चा करके समाधान करने का हरसंभव प्रयास कर रही है। यदि विकल्पों के आधार पर चर्चा होगी तो सरकार तर्कपूर्ण समाधान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर आगे कहा, "जो लोग (किसान संगठन) कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं वो चाहते हैं कि कानून वापस लिए जाएं, जबकि बहुत सारे संगठन ऐसे भी हैं कृषि कानूनों का समर्थन करते हैं। जो बिलों का विरोध कर रहे हैं सरकार उनसे लगातार बात कर रही और समर्थन करने वालों से भी उनके अनुरोध पर बात हो रही है।"

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार सरकार द्वारा तीनों कृषि सुधार कानूनों पर बिन्दुवार चर्चा करने का अनुरोध किया गया, जिस पर किसान संगठनों ने अपनी असहमति जताई और कानून को रद्द करने की मांग की। बैठक को लेकर विज्ञान भवन के बाहर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा," सरकार संसोधनों के बारे में बात करना चाहती थी हम बिंदुवार चर्चा चर्चा नहीं, हम बस इतना चाहते हैं कि कृषि कानूनों को रद्द किया जाए। हम 15 जनवरी को फिर आएंगे। हम कहीं जाने वाले नहीं हैं। कानून निरस्त होने से पहले किसान भरोसा नहीं करेंगे।"

13 जनवरी को देशभर में कृषि कानून की प्रतियां जलाने का ऐलान

एक और बैठक के बेनतीजा रहने के बाद अखिल भारतीय किसान संघर्षन समन्वय समिति ने 13 जनवरी को देशभर में कृषि कानून की प्रतियां जलाने का ऐलान किया है। संयुक्त मोर्चा की तरफ से पहले ये तय कार्यक्रम के अनुसार 18 जनवरी को महिला किसान दिवस मनाया जाएगा तो 23 को सुभाष चंद्र बोस की जयंती किसान अपने तरीके से मनाएंगे। इसके बाद 26 जनवरी को दिल्ली के अंदर ट्रैक्टर परेड होगी।

एआईकेएससीसी के वर्किंग ग्रुप ने कहा है कि तीन खेती के कानून को रद्द कराने का ये संघर्ष बुनियादी रूप से पर्यावरण, नदियों, वन संरक्षण तथा देश की बीज संप्रभुता की रक्षा करने का भी संघर्ष बन गया है। अगर इन कानूनों का अमल हुआ तो कारपोरेट व विदेशी कम्पनियां खेती के बाजार व कृषि प्रक्रिया पर कब्जा कर लेंगी और इन पर हमले बढ़ जाएंगे।

संगठन की तरफ से जारी बयान में आगे कहा गया है, "इस संघर्ष की जीत से देश को बहुत सारे लाभ होंगे, खासतौर से देश की खाद्यान्न सुरक्षा का। कारपोरेट का हित गरीबों को खाना देने में नहीं है, बल्कि खेती से मुनाफा कमाने का है। सवाल केवल सरकारी खरीद और राशन का नहीं, इसी साल मोदी सरकार ने तय किया है कि गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा, जौ सबसे शराब बनाने की प्रक्रिया तेज की जाए ताकि उसकी पेट्रोल, डीजल में मिलावट की जा सके। गरीबों का खाना अमीरों का ईंधन बनेगा।"

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27 नवंबर से दिल्ली के चारों तरफ पर डेरा डाले हैं किसान

सितंबर महीने में संसद के मानसून संत्र में तीनों नए कृषि कानून पास होने केबाद से ही पंजाब हरियामा समेत कई राज्यों के किसान विरोध कर रहे हैं। इस आंदोलन की अगुवाई पंजाब के किसान कर रहे हैं। कई राज्यों के किसानों ने 26-27 नवंबर को चलो दिल्ली का ऐलान किया था। किसान अपने साथ कई महीनों का राशन और रहने का पूरा इंतजाम लेकर चले थे। इस दौरान इन्हें रोकने के लिए हरियाणा सरकार ने जगह-जगह बैरिकेंड की, हाईवे पर मिट्टी डलवाई, हाईवे को जेसीबी से खुदवाया लेकिन आंदोलनकारी किसान सभी नाकों को तोड़कर 27 नवंबर को दिल्ली पहुंच गए थे।

आंदोलन में भारी संख्या में राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के किसान भी शामिल हैं। यूपी के किसान गाजीपुर बॉर्डर पर डेरा डाले हुए हैं तो राजस्थान के किसान हरियाणा-राजस्थान के शाहजहांपुर बॉर्डर पर एक पखवाड़े से जमा है। दिल्ली आने से रोके जाने पर मध्य प्रदेश के किसानों का एक बड़ा जत्था पलवल में भी आंदोलन कर रहा है। इस दौरान किसान संगठनों और सरकार के बीच 7 दौर की वार्ता हो चुकी है।

किसानों की प्रमुख 4 मांगे हैं

1.तीनों नए कृषि कानूनों को वापस लिया जाए।

2.एमएसपी पर संपूर्ण खरीद को कानून बनाया जाए।

3.प्रस्तावित बिजली विधेयक को वापस लिया जाए।

4.पराली संबंधी नए कानून से किसानों को हटाया जाए

अब तक दो मांगों पर बनी है सहमति

1."इलेक्ट्रिसिटी एक्ट' जो अभी आया नही हैं। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के मुताबिक किसान चाहते हैं, सिंचाई के लिए जो सब्सिडी राज्यों को दी जाती है वो उसी तरह जारी रहे, इस पर किसान यूनियन और सरकार के बीच सहमति हो गई है।

2. कृषि मंत्री के मुताबिक सरकार और किसान संगठनों के बीच हुई छठे दौर की वार्ता में बिजली संशोधन विधेयक 2020 और Delhi-NCR से सटे इलाकों में पराली जलाने के लेकर अध्यादेश संबंधी आशंकाओं को दूर करने के लिए सहमति बन गई है। कई किसान नेताओं ने भी कहा था कि पराली कानून संबंधी कानून पर सहमति बनी है। जानकारी के मुताबिक इस संबंध में जो एक करोड़ का जुर्माना और सजा का प्रवाधान है, उससे किसानों को अलग रखा जाएगा।

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