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CAA Protests: पूर्व आईपीएस ने सुनाई पुलिस प्रताड़ना की कहानी

Ranvijay SinghRanvijay Singh   10 Jan 2020 12:13 PM GMT


''लखनऊ पुलिस ने पहले मुझे हाउस अरेस्‍ट किया, फिर थाने ले गई और गिरफ्तार कर लिया। रात के वक्‍त जब मुझे ठंड लगने लगी तो मैंने कंबल मांगा इस पर मुझसे कहा गया- आपको कंबल नहीं दिया जाएगा। इतना ही नहीं मुझे दो दिन तक भूखे रखा,'' लखनऊ पुलिस पर यह आरोप कोई और नहीं खुद 32 साल पुलिस फोर्स में IPS ऑफिसर के तौर पर काम कर चुके एसआर दारापुरी लगाते हैं।

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में 19 दिसंबर को लखनऊ में हिंसा के बाद लखनऊ पुलिस ने कई लोगों को हिंसा भड़काने और हिंसा की साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया। इन लोगों में कई ऐसे नाम शामिल थे जो स‍िविल सोसाइटी से जुड़े हैं या सामाजिक कार्यकर्ता हैं, लेकिन पर्याप्‍त सबूतों के अभाव में इनमें से ज्‍यादातर लोगों को जमानत मिल रही है। इन्‍हीं में से एक हैं रिटायर्ड आईपीएस एस आर दारापुरी, जिन्‍हें 19 दिन जेल में गुजारने के बाद जमानत मिल गई है।

जेल से बाहर आने के बाद 77 साल के पूर्व आईपीएस ऑफिसर लखनऊ पुलिस पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। एस आर दारापुरी बताते हैं, ''19 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन होने थे, लेकिन पुलिस ने मुझे 19 दिसंबर को हाउस अरेस्‍ट कर दिया। मैं दिन भर घर में ही रहा और घर के बरामदे में ही एक तख्‍ती लेकर शांतिपूर्वक CAA का विरोध किया।''

एसआर दारापुरी के इस दावे की गवाही उनके फेसबुक पोस्‍ट से भी मिलती है। 19 दिसंबर की सुबह 10.40 पर एसआर दारापुरी ने अपने फेसबुक पर एक तस्‍वीर पोस्‍ट करते हुए लिखा था- ''आज सुबह-सुबह मेरे घर पर "भारत बचाओ" प्रदर्शन से डरी सरकार द्वारा मेरी हाउस अरेस्ट के लिए पुलिस की घेराबंदी।'' इसके बाद उन्‍होंने दिन के 12 बजे फेसबुक पर एक तस्‍वीर साझा की जिसमें वो एक तख्‍ती लिए हुए थे, जिसपर लिखा था- 'नागरिकता बचाओ।' इस तस्‍वीर को पोस्‍ट करते हुए उन्‍होंने लिखा था, ''हाउस अरेस्ट में भी विरोध जारी।''


एसआर दारापुरी आगे बताते हैं, ''19 दिसंबर को दिन भर हाउस अरेस्‍ट रखने के बाद 20 दिसंबर को मेरे घर गाजीपुर थाने से पुलिस आई और उन्‍होंने कहा कि आपको थाने चलना होगा। मैंने पूछा कि क्‍या मुझे गिरफ्तार कर रहे हैं? तो बताया गया कि नहीं आपको बस साथ चलना है। इसेक बाद शाम को साढ़े पांच बजे तक मुझे थाने में बैठाए रखा गया। फिर मुझे गाजीपुर इंस्‍पेक्‍टर जीप में बैठाकर हजरतगंज थाने ले गए। मैंने हजरतगंज के इंस्‍पेक्‍टर से पूछा कि क्‍या मुझे गिरफ्तार कर रहे हैं? तो उन्‍होंने कहा, 'हां 39 लोगों की गिरफ्तारी हो गई है, 40वें आप हैं।' मैंने कहा कि मुझे वकील से बात करने दीजिए तो मुझे ऐसा करने के लिए मना किया गया। फिर मुझे थाने में ही एक कोने में बैठा दिया।''

''वहां बैठे हुए रात हो गई थी, जब मुझे सर्दी लगने लगी तो मैंने कंबल मांगा, इसपर मुझसे कहा गया - 'आपको कंबल नहीं दिया जाएगा।' मैंने जैसे-तैसे रात गुजारी। इसके बाद 21 दिसंबर की शाम को 5 बजे मुझे अन्‍य लोगों के साथ मजिस्‍ट्रेट के सामने ले जाया गया और फिर जेल भेज दिया गया।''

दारापुरी यह भी आरोप लगाते हैं कि ''क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (दंड प्रक्रिया संहिता) के सेक्‍शन 161 के तहत यह अन‍िवार्य है कि गिरफ्तारी के बाद आरोपी का बयान दर्ज किया जाए, लेकिन मेरे मामले में यह प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। पुलिस ने मेरा बयान खुद ही लिखा और मुझे दिखाया तक नहीं।''

एसआर दारापुरी पर पुलिस ने आईपीसी की 18 अलग-अलग धाराओं में केस दर्ज किया है। इसमें कई गंभीर धाराएं भी शामिल हैं, जैसे - हत्या का प्रयास (धारा 307), हिंसा में विस्‍फोटक का इस्‍तेमाल करना (धारा 346) और साजिश करना (धारा 120बी)। इन धाराओं में आरोपी को जमानत भी नहीं मिलती है, लेकिन लखनऊ पुलिस की ओर से कोर्ट में पर्याप्‍त सबूत न पेश कर पाने और एस आर दारापुरी के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए कोर्ट ने उन्‍हें जमानत दे दी।

जेल से बाहर आने के बाद एसआर दारापुरी और कांग्रेस नेता सदफ जाफर।

एसआर दारापुरी का केस लड़ने वाले वकील कमलेश सिंह इस मामले पर कोर्ट की कार्यवाही बताते हुए कहते हैं, ''मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने हजरतगंज थाने के प्रभारी निरीक्षक और केस के जांच अध‍िकारी धीरेंद्र प्रताप कुशवाहा को बुलाया था। कोर्ट ने उनसे पूछा कि 'क्‍या नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करना गैर संवैधानिक है?' इसपर जांच अध‍िकारी की ओर से कहा गया कि प्रदेश में धारा 144 लगी थी। इसपर कोर्ट की ओर से पूछा गया कि 'धारा 144 क्‍या होती है, यह आपको मालूम है?' इसपर जवाब दिया गया कि शासन की ओर से धारा 144 लागू की गई थी इसके तहत अगर अगर चार लोग एक जगह खेड़े हैं तो हम उन्‍हें गिरफ्तार कर सकते हैं।''

''इस जवाब पर कोर्ट की ओर से पूछा गया कि 'अगर चाय की दुकान पर चार लोग खड़े हैं तो आप उन्‍हें गिरफ्तार कर लेंगे?' इसपर बताया गया कि नहीं हम उन्‍हें गिरफ्तार नहीं करेंगे, लेकिन जो नारेबाजी और झंडा बैनर लेकर जा रहे थे उनको गिरफ्तार कर सकते हैं। इसके बाद कोर्ट ने कहा कि 'लोकतंत्र में लोगों को विरोध करने का अध‍िकार है। इसे नहीं रोका जा सकता।' कोर्ट ने यह भी कहा कि 'अगर आपके पास कोई वीडियो हो जिसमें दारापुरी हिंसा के दौरान शामिल दिखें तो वो भी दिया जाए', लेकिन पुलिस की ओर से ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया। ऐसे में उन्‍हें जमानत मिल गई।''

कुछ-कुछ ऐसे ही आधार पर 19 दिसंबर की हिंसा के बाद गिरफ्तार किए गए कई लोगों को जमानत मिल रही है। इसमें कांग्रेस नेता सदफ जाफर, एक्‍ट‍िविस्‍ट दीपक कबीर, रॉबिन वर्मा जैसे अन्‍य लोग शामिल हैं। वहीं, उत्‍तर प्रदेश के अन्‍य जिलों में भी लोगों सबूतों के अभाव में जमानत मिल रही है। जैसे मुजफ्फरनगर के मदरसे में पढ़ने वाले दो छात्रों समीम अब्‍बास और कमील अब्‍बास को भी 20 दिसंबर को पुलिस ने गिरफ्तार किया था, लेकिन बाद में इन्‍हें जमानत मिल गई।

इन सभी लोगों पर धाराएं तो ऐसी लगी हैं जिसमें जमानत नहीं मिल सकती, लेकिन कोर्ट में पुलिस की ओर से इन धाराओं को पुख्‍ता रूप देने के लिए कोई खास सबूत पेश नहीं किए गए। ऐसे में कोर्ट की ओर से भी इन मामलों में पुलिस की जांच को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। पुलिस की कार्यप्रणाली पर कुछ ऐसे ही सवाल एस आर दारापुरी का केस लड़ने वाले एक और वकील नितिन मिश्रा भी उठाते हैं। वो कहते हैं, ''लखनऊ में हुई हिंसा के बाद अलग-अलग थानों में 4 एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस इसमें लोगों के नाम जोड़ते गई। जैसे दारापुरी हाउस अरेस्‍ट में थे और हिंसा के बाद उन्‍हें गिरफ्तार करके इतने गंभीर आरोप लगा दिए गए, जबकि उनके खिलाफ कोई सबूत भी नहीं था। इससे साफ पता चलता है कि यूपी पुलिस ने अपनी ताकत का दुरुपयोग किया है। पुलिस की जांच ही गलत है, एफआईआर भी गलत है।''

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