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डिजिटल इंडिया के तहत यूपी पुलिस एफआईआर कॉपी अपलोड करने में पीछे

अभिषेक पाण्डेय

लखनऊ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने के लिए अक्सर कई दिशा-निर्देश जारी करते हैं, लेकिन उनकी इस सलाह को मानने में यूपी पुलिस कही पीछे है। इसकी वजह यह है कि, आज भी थाने में एफआईआर दर्ज कराने वाले पीड़ितों को एफआईआर कॉपी के लिए थानों के चक्कर काटने होते हैं, जबकि पुलिस को कोई भी एफआईआर की कॉपी 24 घंटे के भीतर सीसीटीएनएस के माध्यम से इंटरनेट पर अपलोड करने का दिशा-निर्देश है, जिससे पीड़ित को इंटरनेट पर उसकी एफआईआर कॉपी मिल सके। हालांकि इस निर्देश में उन एफआईआर को अलग रखा गया है, जो संवेदनशील जुड़े मामलों से जुड़े हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा था कि, राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को प्राथमिकी दर्ज (एफआईआर) होने के 24 घंटे के अंदर उन्हें अपनी-अपनी सरकारी वेबसाइटों पर उसे सीसीटीएनएस (क्राइम एंड क्रिमिनल नेटवर्क एंड सिस्टम) के माध्यम से अपलोड करें। यह फैसला देशभर में पुलिस की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए लिया गया था और पीड़ितों को आसानी से जल्द एफआईआर कॉपी मिल सके।

जबकि यूपी पुलिस का कहना है कि, ज्यादातर एफआईआर वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाता है, लेकिन कुछ इलाकों में बिजली और इंटरनेट की दिक्कतों के चलते एफआईआर सीसीटीएनएस पर अपलोड करने में दिक्कते आती है, जिसे जल्द ही सुलझाने के लिए कई कार्ययोजना तैयार की जा रही है।


सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति सी.नागप्पन की पीठ ने देशभर में पुलिस को ऐसे मामलों में प्राथमिकियों को वेबसाइट पर डालने से छूट दी थी, जिनमें अपराध संवेदनशील प्रकृति के हैं और आतंकवाद, उग्रवाद और पॉक्सो कानून आदि के तहत दर्ज हैं। फैसले में कहा गया था कि, दर्ज प्राथमिकी को वेबसाइट पर डालने से आरोपी या मामले से जुड़ा कोई व्यक्ति प्राथमिकी को डाउनलोड कर सकता है और शिकायत के निवारण के लिए कानून के मुताबिक अदालत में उचित आवेदन दाखिल कर सकता है। लेकिन पुलिस उन अपराधों को भी वेबसाइट पर अपलोड करने में काफी दिन लगाती है या तो अपलोड करती नहीं है, जिससे वादी और प्रतिवादी को थानों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

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वहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेश की माने तो, आरोपी को शुरूआती स्तर पर ही प्राथमिकी की प्रति मिलने का अधिकार है। पीठ ने कहा, ‘यहां यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि अगर किसी मामले में भौगोलिक स्थिति की वजह से कनेक्टिविटी की समस्या है या कोई दूसरी नहीं टाली जा सकने वाली कठिनाई है तो समय बढ़ाकर 48 घंटे तक किया जा सकता है।’ इसमें कहा गया था, ‘48 घंटे को बढ़ाकर अधिकतम 72 घंटे किया जा सकता है और यह केवल भौगोलिक स्थिति की वजह से कनेक्टिविटी की समस्या से संबंधित है।’

न्यायालय ने यह निर्देश यूथ लॉयर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की जनहित याचिका पर दिया था। जनहित याचिका में दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले का जिक्र किया गया था, जिसमें दिल्ली पुलिस को प्राथमिकी दर्ज होने के 24 घंटे के अंदर उसे अपनी वेबसाइट पर लगाने का निर्देश दिया गया था।

संगठन ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पूरे देश में लागू करने की मांग की थी, जिसे शीर्ष अदालत ने कुछ बदलावों के साथ मंजूर कर लिया। शीर्ष अदालत ने केंद्र की ओर से पक्ष रख रहे अतिरिक्त सालिसिटर जनरल तुषार मेहता की इस आशंका पर विचार किया कि आरोपी पुलिस के साथ सांठगांठ कर सकता है और सुनिश्चित कर सकता है कि प्राथमिकी अपलोड नहीं की जाए। वेबसाइटों पर प्राथमिकियों को अपलोड करने का समय बढ़ाने की अनुमति तब दी गयी जब मिजोरम और सिक्किम जैसे राज्यों के वकीलों ने कहा कि दुर्गम भू-भाग और खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी की वजह से 24 घंटे के अंदर इसे वेबसाइट पर डालना मुश्किल होगा।

वहीं दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 2010 में पारित लगभग सभी निर्देशों से सहमत होते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, ‘यदि किसी आरोपी के पास यह संदेह करने की वजह है कि उसका नाम किसी आपराधिक मामले में दर्ज हुआ है और प्राथमिकी में उसका नाम हो सकता है तो वह अपने प्रतिनिधि के माध्यम से संबंधित पुलिस अधिकारी या पुलिस अधीक्षक के सामने सत्यापित प्रति के लिए आवेदन कर सकता है। वह अदालत से इस तरह की प्रति हासिल करने के लिए देय शुल्क का भुगतान करके प्रति प्राप्त कर सकता है।

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इस तरह का आवेदन करने के 24 घंटे के अदंर प्रति दी जाएगी।’ पीठ ने यह भी कहा था कि, प्राथमिकी को वेबसाइट पर अपलोड नहीं करने का फैसला  पुलिस उपाधीक्षक या इसके समकक्ष पद पर बैठे अधिकारी से कम दर्जे का अधिकारी नहीं करेगा। वहीं इस संबंध में डीजी टेक्निकल महेंद्र मोदी का कहना है कि, प्रदेश में ज्यादातर थानों में सीसीटीएनएस की सुविधा दी जा चूकी है, जिसमें कोई भी मुकदमा कम्प्यूटर पर दर्ज कर उसे आनलाइन अपलोड कर वादी और प्रतिवादी के लिए डाल दी जाए। हालांकि उन्होंने कहा कि, सुप्रीम कोर्ट के गाइड लाइन के अनुसार संवेदनशील मामलों में एफआईआर की कॉपी वेबसाइट पर नहीं अपलोड की जा सकती है।

उन्होंने बताया कि, यूपी पुलिस को इंटरनेट सेवा बीएसएनएल सर्विस के द्धारा मिलती है, लेकिन ज्यादातर वक्त बीएसएनएल के इंटरनेट लाइनों में दिक्कते आने के चलते एफआईआर की कॉपी सीसीटीएनएस वेबसाइट पर अपलोड नहीं हो पाती है। साथ उन्होंने कहा कि, यूपी बहुत बड़ा प्रेदश है, जहां कुछ थाने दुर्गम इलाकों में भी है, जहां बिजली की सुविधा सहित इंटरनेट की सुविधा पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है और इस संबंध में सभी जिलों के पुलिस कप्तानों को पत्र जारी कर इसे सख्ती से लागू कराने का निर्देश दिया जायेगा।


गृह मंत्रालय की ओर से जारी निर्देश

गृह मंत्रालय की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार 30 जून 2017 तक राष्ट्रीय स्तर पर सीसीटीएनएस प्रॉजैक्ट को संपन्न कर लिया जायेगा। पुलिस थानों में यह परियोजना 100 फीसदी लागू करने में चंडीगढ़ पुलिस देश की पहली पुलिस आर्गेनाइजेशन बन गई है। इस राष्ट्रीय ई-गवरनेस योजना के तहत अपराध की जांच, एफआईआर कॉपी अपलोड और अपराधियों का पता लगाने में पुलिस को काफी हद तक सुविधा मिल पाएगी।

गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सीसीटीएनएस परियोजना के तहत एक डिजिटल पुलिस पोर्टल शुरु किया था, जिसका उद्देश्य अपराधों और अपराधियों का राष्ट्रीय ब्यौरा तैयार करना है। डिजिटल पुलिस पोर्टल नागरिकों को आनलाइन शिकायत पंजीकरण और पृष्ठभूमि सत्यापन का आग्रह जैसी सुविधाएं प्रदान करने के लिए शुरू किया गया है।

गृह मंत्री ने कहा था कि, अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क एवं सिस्टम परियोजना (सीसीटीएनएस) ने 15398 थानों में से 13775 को साफ्टवेयर में 100 प्रतिशत डेटा डालने का मौका दिया है। उन्होंने कहा था कि, फिलहाल सीसीटीएनएस राष्ट्रीय ब्यौरे में अतीत और वर्तमान आपराधिक मामलों से जुड़े करीब सात करोड़ डेटा रिकार्ड हैं। सीसीटीएनएस परियोजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘न्यूनतम सरकार कारगर शासन ’ के सपने को पूरा करने में मदद करेगी। सीसीटीएनएस परियोजना देशभर के करीब 15398 थानों और पांच हजार अतिरिक्त शीर्ष पुलिस अधिकारियों के कार्यालयों को आपस में जोड़ेगा और सभी थानों में प्राथमिकी दर्ज होने, जांच तथा आरोपपत्र के संबंध में डेटा का डिजिटलीकरण करेगा।

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