दिल्ली की देहरी : गंदा नाला नहीं निर्मल जलधारा था, बारापुला नाला

Nalin ChauhanNalin Chauhan   5 Aug 2017 2:23 PM GMT

दिल्ली की देहरी : गंदा नाला नहीं निर्मल जलधारा था, बारापुला नालाइन नालों ने कभी अच्छे दिन भी देखे थे।

दक्षिणी दिल्ली में रिज से पानी के यमुना नदी की ओर बहाव की ओर नजर डालें तो बारापुला, तेहखंड और बुधिया नाला तीन ऐसे जल स्त्रोत, जिनसे होकर रिज की पहाड़ियों का पानी यमुना में पहुंचा करता था। ये तीनों अब नाले के रूप में दिखाई देते हैं जो शहर की गंदगी को यमुना में पहुंचाने का काम करते हैं। इन नालों ने कभी अच्छे दिन भी देखे थे। मानसून के दिनों में तेज रफ्तार से पानी की निकासी करने वाली ये नाले पहाड़ी नदियों की तरह काम करते थे।

मार्ग से प्रकाशित जट्टा-जैन-नेउबाउर की संपादित “वाटर डिजाइन, इनवायरमेंट एंड हिस्ट्रिज” पुस्तक में जेम्स एल वेशकोट जूनियर “बारापुला नाला और इसकी सहायक धाराएं, सल्तनत और मुगलकालीन दिल्ली में में जल विभाजन की वास्तुकला” शीर्षक वाले अध्याय में लिखते हैं कि बारापुला नाला शहरी गांव निजामुद्दीन, जो कि सल्तनत काल में गियसपुर के नाम से जाना जाता था, से होते हुए बहता है,जिसके बाद उसे एक प्रमुख जल स्त्रोत से पानी मिलता है, जिसे आज कुशक नाला के रूप में जाना जाता है। बृहत्तर दिल्ली में पानी की चार प्रमुख धाराएं थी। इनमें से एक हौजखास तालाब में पहुंचती थी, कुशक नाला दक्षिणपूर्व दिल्ली को सिंचित करता था, मध्य रिज की पहाड़ी धाराएं थीं और अंतिम घुमावदार धाराएं थीं, जिससे लोदी मकबरे के बागों और गांवों को पानी पहुँचता था। ये सभी अंग्रेजों के अपनी राजधानी नई दिल्ली के निर्माण के साथ खत्म हो गईं।

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अगर किला रॉय पिथौरा से निकलने वाली पानी की विभिन्न धाराओं से दिल्ली के जल प्रवाह क्षेत्र की ओर चला जाए तो हमें इसके व्यापक अंर्तसंबंध का पता चलता है। इस क्षेत्र में नदी के किनारे की बसावट को किलोकरी के नाम से जाना जाता था। यह बारापूला के बहकर यमुना नदी में मिलने के स्थान के ठीक दक्षिण दिशा में है। 13वीं शताब्दी के आरंभ में बसी किलोकरी का विस्तार 1286 ईस्वी में सुल्तान कैकुबाद ने किया था। ऐतिहासिक पुस्तकों में यहां पर सुन्दर महल और उद्यानों के होने का वर्णन किया गया है। गुलाम वंश के शासन में यह क्षेत्र किलोकरी किले में स्थित था, जो नसीरुद्दीन (1268-1287) के पुत्र तत्कालीन सुल्तान कैकुबाद की राजधानी हुआ करती थी।

निजामुद्दीन औलिया ने किलोकरी में भीड़ होने की शिकायत की थी, जिनकी खानकाह यहां से केवल एक किलोमीटर की दूरी पर है। जबकि ऐसा माना जाता है कि शायद नाले और नदी दोनों में पानी की बाढ़ के कारण किलोकरी अधिक समय तक आबाद नहीं रही जबकि आज के आधुनिक समय में यहां घनी शहरी आबादी का विकास देखने को मिलता है।

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जबकि इसके काफी पहले सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने यहां से अपनी राजधानी को स्थानांतरित करते हुए किला राय पिथौरा और सिरी में जल धारा के ऊपरी क्षेत्र में पानी के बुनियादी ढांचे के विकसित किया था। कुशक नाला में मिलने वाली पानी की मुख्य धारा में पहाड़ी ढलानों की छोटी धाराओं सहित तुगलकाबाद से ऊपरी क्षेत्र में विभिन्न जल स्त्रोंतों से पानी आता था।

जेम्स एल वेशकोट जूनियर लिखते हैं कि कुशक नाला में मिलने वाले जल धाराएं एक तुगलक-कालीन जल नियंत्रण संरचना सतपुला बांध के ऊपर मिलती थी। सतपुला अंग्रेजों से पहले की दिल्ली का विशालतम और सर्वाधिक परिष्कृत जल नियंत्रण ढांचा है। मुहम्मद बिन तुगलक ने 1343 ईस्वी में इसको बनवाया था। यह लगभग 80 मीटर लंबा है, जिसमें धनुषाकार दो मंजिलें बनी हुई हैं जो कि जहांपनाह की ओर जाने वाले पानी के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं। यह बांध अपने पीछे पानी को सहेजता था और शायद भारी मानसून में खिरकी और हौज-ए-रानी तक सुरक्षा का काम करता था।

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यहां तक कि दक्षिणी दिल्ली की चराई वाले जमीन और खेतों के लिए पानी का इंतजाम करता था। यह जानना एक दिलचस्प बात होगी कि मुहम्मद बिन तुगलक ने नाले को जहांपनाह के भीतर क्यों शामिल किया। जबकि यहां बनी दूसरी राजधानियों में यह नाला भीतर न होकर उनकी बाहरी दीवारों के साथ-साथ बहा। ऐसे में क्या यह शहरी जल आपूर्ति को बढ़ाने, बाढ़ के खतरों को कम करने, क्षेत्र पर नियंत्रण रखने के लिए था या इन सभी बातों के लिए था?

ऐसे में कारण कुछ भी रहा हो, सतपुला बांध से नियंत्रित पानी एक संकरी जलधारा के रूप में निकलता था, जिसकी दाई ओर चिराग दिल्ली गांव, जिसका नाम सूफी दरवेश शेख नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली के नाम पर है, और बाई ओर 1303 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी का बसाया सिरी का किला था। अफसोस की बात है कि आज इसके ठीक उलट यह दुर्गंध-कचरे से भरा हुआ नाला चिराग दिल्ली गुजरता हैं। चिराग दिल्ली से यह नाला आगे उत्तर में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह की तरफ आगे बढ़ता है।

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बारापुला नाला के आगे बढ़ने के साथ इसमें दक्षिण से, मध्यकालीन हिंदी के कवि और मुग़ल मनसबदार अब्दुल रहीम खानखाना के भव्य मकबरे के बाग से होकर बहने वाली पानी की छोटी उपधाराएं आकर मिलती हैं। दिल्ली के इतिहास में इस कब्र परिसर शायद नाले के सामने बेहतरीन बगीचा था।

इस नाले पर अभी तक बची हुई सबसे पुरानी जल संरचना वाली इमारत मुगलकालीन बारापुला का पुल है, जिस पर इस नाले का नाम है। यह पुल आगरा से होकर आने वाली ग्रांड ट्रंक रोड के बारास्ता किलोकरी हुमायूं के मकबरे तक और फिर पुराने किले तक जाने के ऐतिहासिक रास्ते का गवाह है। आज भी यह स्थानीय निवासियों और रेलवे यात्रियों के लिए दैनिक उत्पाद और सूखे मेवे के सामान के बाजार के रूप में अपनी सेवा दे रहा है।

मुगल शासक जहांगीर के समय में मिहिर बानू आगा नामक किन्नर ने 1621-22 ईस्वी में इसे बनवाया था। ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसकी लंबाई 195 मीटर तथा चौड़ाई 14 मीटर है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने इस पुल के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया है। इसी कारण से बारापुला एलिवेटेड योजना में परिवर्तित करके उसके मार्ग में परिवर्तन करना पड़ा।

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एक अंग्रेज के वर्ष 1707 में किए गए सर्वेक्षण के आधार पर बनाये एक नक्शे में वह जलधाराएं दिखाई गई हैं, जो दिल्ली की यमुना में मिलती थीं। एक तिलपत की पहाड़ियों में दक्षिण से उत्तर की ओर बहती थी, तो दूसरी हौजखास में अनेक सहायक धाराओं को समेटते हुए पूर्वाभिमुख बहती बारापुला के स्थान पर निजामुद्दीन के ऊपरी यमुना प्रवाह में जाकर मिलती थी।

18 वीं सदी के एक पुराने नक्शे को देखने से पता चलता है कि दिल्ली रिज से लेकर मैदान, महरौली से लेकर शाहजहांनाबाद तक, तक का समूचा क्षेत्र एक बड़े जल स्त्रोत से सिंचित होता था। यह पानी के एक प्रमुख प्रवाह का रूप ले लेता था जो कि आज बारापुला नाला (हाल के वर्षों में इस नाम के बने एक नए फ्लाईओवर के कारण प्रसिद्ध) के नाम से जाना जाता है।

बारापुला बेसिन यमुना नदी के पश्चिमी तट और दिल्ली के दक्षिणी भाग पर स्थित है। यह बेसिन पूर्वी ओर से यमुना नदी से, दक्षिण में हरियाणा से और उत्तर और पश्चिम दिशा की ओर नजफगढ़ बेसिन से घिरा हुआ है। इस बेसिन में आने वाले क्षेत्रों का पूरी तरह से शहरीकरण हो चुका हैं। इस बेसिन में बारापुला नाला सबसे बड़ा नाला है जो इस क्षेत्र का लगभग 80 बरसाती पानी यमुना नदी में ले जाता है। बारापुला नाले के साथ कुछ और नाले हैं, जो सीधे यमुना नदी में मिलते हैं। ऐसे ही, एक अगर नहर इस बेसिन के क्षेत्र से गुजरती है, जिसमें चार बरसाती नाले गिरते हैं। इस बारापुल्ला बेसिन का कुल जलग्रहण क्षेत्र 376.27 वर्ग किलोमीटर है।

2011 की जनगणना के अनुसार, इस क्षेत्र में पांच जिले शामिल हैं जिनकी कुल आबादी लगभग 33.89 लाख है। बारापुला बेसिन यमुना नदी के बाढ़ डूब क्षेत्र में है। मोटे तौर पर यह बेसिन दिल्ली के पांच जिलों में फैला हुआ है, जिसमें मध्य दिल्ली (39.43 प्रतिशत), नई दिल्ली (100 प्रतिशत), उत्तर दिल्ली (21.79 प्रतिशत), दक्षिण दिल्ली (100 प्रतिशत) और दक्षिण पश्चिम (13.32 प्रतिशत) है। यहां की भूमि समुद्र तल से 233 मीटर (14 से 313 मीटर) की सतह औसत ऊंचाई पर है।

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बारापुला के जलग्रहण क्षेत्र का दक्षिणी हिस्सा उसके उत्तरी भाग की तुलना में ऊंचा है। ऐसा दक्षिणी भाग में पहाड़ी क्षेत्र के अस्तित्व में होने के कारण है। इस नाले के प्रवाह का प्राकृतिक रास्ता दक्षिण-पूर्व की दिशा में यमुना नदी की ओर है। इस भूमि की सतह की बनावट ऐसी है कि यहां मौजूद तीन अलग-अलग नाले-अरूणा नगर नाला, पुराना चंद्रावल का नाला और बारापुला नाला-सीधे यमुना नदी से गिरते हैं और तीन अलग-अलग बेसिन बनाते हैं। ये तीन बेसिन हैं अरुणा नगर नाला बेसिन (0.204 वर्ग किमी), पुराना चंद्रावल नाला बेसिन (1.26 वर्ग किमी) और बारापुला बेसिन (374.81 वर्ग किमी)। इस क्षेत्र में बारापुला बेसिन सबसे बड़ा बेसिन है। इस बेसिन में 617 मिमी औसत वार्षिक वर्षा होती है। इस पूरे साल में भी 81 प्रतिशत पानी मानसून के महीनों जुलाई, अगस्त और सितंबर के दौरान प्राप्त होता है।

अगर भौगोलिक दृष्टि से देखें तो इस क्षेत्र का 10 प्रतिशत पहाड़ी रिज का विस्तार है जो वजीराबाद बैराज (उत्तर दिल्ली जिले में) से शुरू होकर दक्षिण दिशा की ओर बढ़ती है। यह रिज राजधानी के मध्य जिले से होते हुए नई दिल्ली जिला] दक्षिण पश्चिम जिले के पश्चिम से होते हुए आखिरकार मैहरोली के पहाड़ी क्षेत्र से जुड़ जाती है। यही पहाड़ी जलसंग्रहण क्षेत्र बारापुला बेसिन को नजफगढ़ बेसिन से अलग करते हैं। इस बेसिन में यमुना नदी के अलावा बड़ी संख्या में जल निकाय भी हैं। यमुना नदी के बाढ़ क्षेत्र (मैदान) काफी हद तक जस के तस है।

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ये मैदान मुख्य रूप से खेतीबाड़ी के लिए उपयोग होते हैं या इन नालों के गिरने वाले खुले क्षेत्र के रूप में हैं। इस पूरे बेसिन क्षेत्र की मिट्टी रेतीली और चिकनी हैं। यह इलाका भूमि उपयोग की दृष्टि से खेती, शहरी आबादी की बसावट ( नदी और जल निकायों) घास तथा बंजर जमीन में बंटा हुआ है। इस बेसिन क्षेत्र दिल्ली की सर्वाधिक शहरी बसावट रहती है। जहां पर कुल भूमि उपयोग के हिसाब से 30 प्रतिशत हिस्से में मकान बने हुए हैं। यह क्षेत्र मुख्य रूप से एक संस्थागत क्षेत्र है] जहां सरकारी कार्यालय (सांस्कृतिक भवन) दूतावास और दिल्ली विश्वविद्यालय हैं। यही कारण है कि इन कामकाजी केंद्रों (व्यावसायिक क्षेत्रों) स्कूलों-कॉलेजों-अस्पतालों के बाहर और बस अड़्डों सहित बड़ी आवासीय सोसाइटियो के नजदीक अंसगठित क्षेत्र की इकाइयां मौजूद है। इस बेसिन क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों की प्रतिशतता सर्वाधिक है।

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