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हरियाली और समृद्धि का लोकपर्व है बसंत पंचमी

हरियाली और समृद्धि का लोकपर्व है बसंत पंचमीमेरी मिट्टी, मेरे त्योहार - बसंत पंचमी।

हमारे घरों में हर साल किसी विशेष दिन पर पूजा-पाठ और खास तरह के त्योहार मनाए जाते हैं। ये लोकपर्व हमें अपनी परंपराओं से जोड़ते हैं और यह बताते हैं कि हमारी संस्कृति हमसे कितनी करीब है। गाँव कनेक्शन की विशेष सीरीज़ मेरी मिट्टी, मेरे त्योहार के चौथे भाग में आज बात बसंत पंचमी त्योहार की।

हर नई शुरुआत के लिए खास होता है बसंत पंचमी का दिन

घर पर कोई नया सामान लाना हो , या फिर बच्चों की पढ़ाई की शुरूआत हो, बसंत पंचमी त्योहार किसी भी तरह की नई शुरूआत के लिए खास दिन माना जाता है। इस दिन मुख्य रूप से स्कूलों में सरस्वती देवी की पूजा भी की जाती है, महिलाएं भी पूजा के दौरान इस त्योहार पर पीला कपड़ा पहनती हैं। अगर आपने नया घर लिया है, तो बसंत पंचमी के दिन नए घर में प्रवेश करना शुभ माना जाता है।

बसंत पंचमी लोकपर्व से जुड़ी यादें- छवि निगम

बसंत! हरियाली और समृद्धि का समय जब लगता है, तो मानो ऐसा लगता है कि आसमान से पिघलते सोने का झरना ज़मीन पर बहता चला आ रहा हो। बसंत , यानि वो खुशनुमा गुनगुना-सा मौसम, जब भारी भरकम गर्म कपड़े उतारकर कुनकुनी धूप सेकना अच्छा लगने लगता है। ऐसे में बसंत पंचमी का दिन हर साल बहुत ख़ास यादों को संग लिए चला आता है, जिसकी तैयारियां करते हुए आज भी मन बचपन वाले उल्लास से भर जाया करता है।

मुझे याद है बचपन में बसंत पंचमी के आने का पता, हमें घर में आ रहे नए कपड़ों से होता था। वो बेहद सादे सूती वायल के कपड़े हुआ करते थे, जिनपर आसानी से एकसार रंग चढ़ सकता था। भगवान जी के कपड़ों से शुरू होकर घर भर के कुर्ते, धोतियां, फ्रॉकें सब नांद में घुले पीले रंग में डुबकियां लगाकर निकलते और छांह में सुखाए जाते थे। मम्मी बताती थीं कि धूप में सीधे सुखाने से उनका रंग उड़ सकता था, इसलिए उन ख़ास कपड़ों को पहन के सरस्वती पूजा में शामिल होने का आनंद ही कुछ और हुआ करता था। उनमें इतराते हुए इम्तिहान में अच्छे नम्बर की आस लिए पूरे मनोयोग से गाई हुयी "हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी, या कुन्देन्दु तुषारहारधवला..., जयति जय जय माँ सरस्वती...'' ऐसी जाने कितनी ही प्रार्थनाएं आज भी कंठस्थ हैं।

मेरी मिट्टी मेरे त्योहार सीरीज़ - भाग चार।

हम लोग अपना पेन्सिल बॉक्स, ज्योमेट्री बॉक्स... कॉपियां किताबें... खास तौर पर मैथ्स की किताब बीच से खोलकर रखते, जिससे देवी जी की नज़र खासतौर से उस पर पड़ ही जाए। हमारी बुद्धि खूब तेज़ हो जाए, ये मनाते हुए उनको कनेर और गेंदे के फूल चढ़ाते, और भोग लगाने के बाद घर में बनाये केसर डले खोये के पेड़े और फिर दोपहर के खाने को जिसमें खूब गोभी-गाजर- मटर डली तहरी, बथुए का रायता, अचार चटनी वगैरह जरूरत के हिसाब से होते थे। वो सब तो खाते ही, और गुंजाइश रहने पर बाद में पीले रंग के मीठे चावल भी खाते थे। कुछ-कुछ ईद में खाये जाने वाले जैसे जर्दे जैसा ही पुरकशिश जायका होता था उसका। यानि...पूरा दिन जैसे उजाले को आंखों से पेट में पहुंचाकर आत्मसात करने में निकल जाता था।

यही दिन स्कूलों के वार्षिकोत्सव का भी हुआ करता था। शाम को मंच पर सजी सरस्वती देवी की सुंदर-सी प्रतिमा के सामने हम लोग अपनी साल भर की तैयारियां दर्शकों की भारी भीड़ के आगे प्रस्तुत करते, और फिर अगले साल वाले कार्यक्रम तक सबकी शाबाशियों की गमक अपनी पीठ पर महसूस करके ख़ुश होते रहते। एक दूजे से होड़ लगाते हुए सूर्यकांत निराला जी की प्रतिमा पर भी खूब फूलमालाएं चढ़ाकर उनका जन्मदिन भी मनाते। उनकी लिखी "वर से वीणा वादिनी वर दे के साथ ही "वीरों का कैसा हो बसंत" जैसी जाने कितनी ही कविताएं, हमने उस दौर में याद करना, और मंच पर सुनाना सीखा था, हालांकि उनका भावार्थ वर्षों बाद समझ आया।

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हर पर्व या त्यौहार की तरह ही इसे मनाने का तरीका भी अलग-अलग जगहों पर थोड़ा बहुत बदलता जाता है। जैसे बैंसवारा इलाका, जो उत्तर प्रदेश में उन्नाव रायबरेली के आस-पास के इलाके को चलते फिरते बोल दिया जाता है, वहां बसंत पंचमी का सम्बन्ध सुहाग से है, जो मंदिर जाकर देवी पार्वती की पूजा करके लिया जाता है। इसके अलावा घर पर ही गोबर से गौर बनाकर उनकी पूजा की जाती है। उनकी मांग में सिन्दूर भरकर, उसे सुहागिनें अपनी मांग में जब लगाती हैं, वही सुहाग लेना कहलाता है। खिचड़ी दान की जाती है और ख़ास तौर पर कन्याओं को दोने में रखकर सामान दान देना, शुभ माना जाता है।

फैज़ाबाद की तरफ , विधि-विधान थोड़ा और बदल जाता है। यहां पुरोहित को दान में आलू, शकरकंद, दाल (अरहर छोड़कर), आटा, चीनी, चावल, सुहाग की चीजें और दक्षिणा के रूप में कुछ पैसे दिए जाते हैं। चौक पूर के उसमें पांच से सात दिये जलाए जाते हैं और नई फसल के धान और मकई पूजा में चढ़ाए जाते हैं। फूल, अगरबत्ती, गंगाजल, आदि विधि-विधान से चढ़ाकर, दीपक जला के श्लोक कहे जाते हैं। दिन में सभी जगह पीले चावल खाये जाते हैं, और रात में पक्का खाना बनता है। पक्का खाना यानि कढ़ाई में बनाई गई पूड़ी कचौड़ियां वगैरह।

वैसे तो संगीत, कला , प्रतिभा और ज्ञान की देवी, ब्रह्मा की मानस पुत्री देवी सरस्वती पूजा भारत भर में की जाती है, लेकिन पश्चिम बंगाल, बिहार, और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ये ख़ास तौर से मनाया जाता है। इसका उद्देश्य यही है, कि हर तरफ ज्ञान का प्रकाश पहुंच सके। आज भी बच्चों के पट्टी-पूजन, या विद्यारम्भ संस्कार के लिए यही समय सबसे अच्छा माना जाता है। इसमें औपचारिक रूप से स्कूल जाने से पहले बच्चे का हाथ पकड़ के ॐ लिखवाया जाता है। कपड़े रंग कर पहनने की परंपरा कम होती जा रही है, लेकिन आज भी इस दिन नए पीले परिधान जरूर पहने जाते हैं। ऋतुओं के राजा बसंत में प्रकृति का उल्लास है, जीवन की उमंग है । बसंत पंचमी का सामूहिक पर्व हम सभी को सकारात्मक चेतना की ओर ले जाता हुआ , सबके कल्याण की कामना करता हुआ एक ख़ास दिन है।

बसंत पंचमी त्योहार से जुड़ी हैं कई कहानियां -

पहली कहानी- इस दिन देवी सरस्वती का हुआ था जन्म

बसंत पंचमी की कथा के अनुसार जब ब्रह्मा जी मनुष्य योनि की रचना कर रहे थे, तब वो अपने काम से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हुए थे। असंतुष्ट होने पर ब्रह्मा जी भगवान विष्णु के पास गए। उनसे आज्ञा लेकर उन्होंने पृथ्वी पर अपने कमंडल से कुछ जल की बूंदे छिड़की, जैसे ही जल पृथ्वी पर गिरा पृथ्वी कांपने लगी और उसी समय एक शक्तिरूप लिए स्त्री प्रकट हुई। ब्रह्मा जी ने इस दिव्य स्त्री को सरस्वती कह कर पुकारा, तब से इस दिन को देवी सरस्वती का जन्मदिन भी माना जाता है।

इस दिन देवी सरस्वती का हुआ था जन्म।

दूसरी कहानी- श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती को दिया था वरदान

देवपुराण के अनुसार इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने देवी सरस्वती से खुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि इस दिन पूरे संसार में तुम्हारी पूजा की जाएगी और इस दिन को बसंत पंचमी के नाम से जाना जाएगा।

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