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'"रासायनिक खाद और कीटनाशक पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर देना चाहिए"

"गाँव की सोच वाले प्रधानमंत्री देश में होते तो आज कृषि -किसान की ये दुर्गति न होती, आजादी के बाद सरदार पटेल देश के प्रधानमंत्री बनते तो आज देश की सूरत कुछ और होती, "आर के सिन्हा

Ashwani DwivediAshwani Dwivedi   29 Jun 2019 7:25 AM GMT

पटना (बिहार)। "साठ-सत्तर के दशक में इतनी रोजगार की समस्या नहीं थी, आबादी बढ़ती गयी और समस्याएं भी बढ़ती गईं। उस समय पलायन न के बराबर था। बीते दशकों से अब तक गाँव से शहर की तरफ पलायन तेजी से बढ़ा हैं। किसानों और युवाओं को इस कदर बरगलाया गया कि देश की पूरी कृषि व्यवस्था चौपट हो गयी। फिर से एक बार गांवो की तरफ हमें लौटना होगा, गाँव को उनकी पुरानी व्यवस्था में बहाल करना होगा, नहीं करेंगे तो बर्बाद हो जायेंगे।"

ये कहना है बिहार के भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद, पत्रकार और सुरक्षा क्षेत्र में काम कर रही बिहार की एकमात्र बहुराष्ट्रीय कंपनी "एसआईएस" के चेयरमैन रविन्द्र किशोर सिन्हा (आर.के.सिन्हा) का जो जीवन के 68 बसंत देख चुके हैं। मध्यम वर्गीय किसान परिवार में जन्में आर.के. सिन्हा "संघर्ष से सफलता" का जीवंत उदाहरण हैं। और वर्तमान में ढाई लाख लोगों को रोजगार देने के साथ ही दस लाख लोगों को रोजगारपरक प्रशिक्षण दे चुके हैं।

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गाँव कनेक्शन से साक्षात्कार के दौरान किसानों की बिगड़ती स्थिति के सवाल पर वो बताते हैं, "किसान आज सबसे ज्यादा परेशान हैं क्योंकि अब गाँव में संसाधन नहीं हैं। पहले सारे संसाधन गाँव में होते थे, अगर सत्तर के दशक और उसके पहले के गाँव की बात करें तो गाँव की जरुरत की सारी चीजें गाँव में मौजूद थीं। छोटी-मोटी चीजों के लिए गाँव से बाहर जाने की जरुरत नहीं होती थी। बचपन में मैंने देखा है हमें पता होता था की चावल की जरुरत है तो गाँव में किसके पास जाना हैं, दाल कहां मिलेगी, सब्जियाँ ज्यादातर लोग घर में उगाते थे, जो नहीं उगाते थे तो सप्ताह में दो दिन गुरुवार और रविवार गाँव की बाजार लगती थी, जिससे गाँव के लोगों की अधिकांश जरूरतें पूरी हो जाती थी। दूध, दही, घी, मिठाइया, मिट्टी के बर्तन, दोना, पत्तल छोटे-छोटे सामान जैसे करछुल, तवा, बटुइया (एल्युनियम का बर्तन) टोकरी ये सब गाँव में ही मिल जाते थे। होली और दशहरे में साल में दो बार बाहर से कपड़े ख़रीदे जाते थे।


गाँव जब तक स्वावलंबी नहीं होंगे पलायन होता रहेगा

गाँव से हो रहे पलायन के प्रश्न पर आर.के. सिन्हा कहते हैं, "जब तक गाँव स्वावलंबी नहीं होंगे तब तक पलायन होता रहेगा। जब तक किसान को रसायनिक खाद से, कीटनाशक से, बैंक की किश्त से, फ्री नहीं करेंगे गाँव स्वावलंबी नही हो पाएंगे। आज कृषि पर किसान की लागत इतना ज्यादा बढ़ गयी है कि फायदे का सौदा माने जानी खेती घाटे का सौदा बन गयी हैं।

वो आगे बताते हैं कि गांवो को स्वावलंबी बनाने के लिए हमें फिर से पुराने तरीकों की तरफ लौट कर जैविक तकनीक अपनानी होगी।

वो आगे कहते हैं, "किसान ने रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग शुरू किया, बीज संरक्षण बंद कर दिया और बीज, खाद, कीटनाशक के मामले में बाजार पर निर्भर हो गया खेती करने के लिए बैंक से लोन लिया और न चुका पाने पाने पर आत्महत्या करना शुरू कर दिया। जबकि खाद कीटनाशक किसान खुद बना सकता है कीटनाशक बनाने का देशी तरीका बताते हुए आर.के.सिन्हा कहते हैं, "देशी कीटनाशक बनाना कोई रॉकेट साइंस नही है। कीटनाशक बनाने में गाय का मूत्र और ऐसा कोई भी पौधा जिसे गाय खाए नही सूंघ कर छोड़ दे जैसे बबूल, इकवन, नीम, बेल, धतूरा, खैनी इन्हें गौमूत्र में मिला दीजिये कीटनाशक बन गया और इस कीटनाशक को सुबह खेत में फल सब्जियों पर छिड़काव कर दीजिये और शाम को धोकर खा लीजिये कोई नुकसान नहीं होगा और किसानों का खर्च भी बचेगा। इसके विपरीत रासायनिक कीटनाशक के छिड़काव के बाद एक सप्ताह तक सब्जी खाने लायक नहीं होती है और किसान नुकसान न हो इसकी वजह से वही सब्जी तोड़कर बाजार में बेंच देते हैं।

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देश किसानों के हाथ में होता तो ये दुर्गति न होती

इस सवाल पर की आज जिस दौर से कृषि-किसान-गाँव गुजर रहा है, उसमे चूक आखिर कहाँ पर हुई मानते हैं? इस पर आर.के. सिन्हा आक्रोशित होते हुए कहते हैं, "चूक देश के नेतृत्व के दिमाग में हुई है देश का नेतृत्व अगर किसान के हाथों में होता तो ये दुर्गति नहीं होती अब भी समय है देश में रासायनिक खाद और कीटनाशक एकदम से प्रतिबंधित कर देना चाहिए। रसायनिक खाद और रसायनिक कीटनाशक का इतना बड़ा दुष्प्रभाव हैं यदि लोग सही से समझ जायेंगे तो रात भर नींद नहीं आएगी। इसकी वजह से कैंसर, किडनी की बीमारियां, हृदय की बीमारियां, लीवर की बीमारियां बढ़ रही है। यही नहीं जिन क्षेत्रों में रासायनिक खाद और कीटनाशक का प्रयोग ज्यादा हो रहा है, वहां लोग तेजी से नपुंसक होते जा रहे हैं। शारीरिक विकृति और असमानताएं बढ़ती जा रही हैं। ऐसे-ऐसे प्रकोप सामने आ रहे है जो कभी सोचा नहीं गया था। रसायनिक कीटनाशक और खाद ने न केवल जमींन खराब की बल्कि हवा,पानी तक को प्रदूषित कर दिया है, अब स्थिति ये है की किसान खुद भी जहर खा रहा है और सबको वही खिला रहा हैं। लाखों-लाख रूपये हम हर साल दवा-रसायनिक कंपनियों को दे रहे हैं और बदले में वो हमें हजारों तरह की बीमारियाँ दे रही हैं।

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कृषि विज्ञान अपने आप में गलत सोच हैं ...

आर.के.सिन्हा आगे बताते हैं, "कृषि विज्ञान से आज तक देश का कुछ भला नहीं हुआ। कृषि विज्ञान अपने आप में एक गलत सोच है। छात्रों -किसानों को मूलतः गलत पढ़ते हैं, ये कृषि विज्ञान वाले पढ़ाते ही यह है कि इस जमीन में कुछ नहीं हैं। सबसे पहली बात ये बताते हैं मृदा परीक्षण कराओ, परीक्षण के बाद वो लोग ये कभी नहीं बताते की जमींन में गुणवत्ता क्या है। हमेशा जमींन की कमियां बताते हैं। पूरे देश में कोई एक मृदा परीक्षण की रिपोर्ट बता दीजिये, जिसमें कहा गया हो कि किसान की जमींन अच्छी हैं। मृदा परीक्षण के बाद वो बताते हैं कि जमीन में कुछ नही है फलां -फलां चीजे डालिए तब जमीन से उत्पादन मिलेगा ऐसे लोगों से मैं ये कहना चाहता हूँ कि किसी भी नेशनल फारेस्ट में चले जाए और वहां लगे बड़े-बड़े पेड़ देखे और बताएं की ये कैसे पोषित हो रहे हैं अगर जमीन में दम नही है। फ़र्टिलाइजर ने जमीन के मित्र कीटों को ख़त्म कर दिया हैं गोवंश आधारित खेती ही कृषि और किसान दोनों को बचा सकती हैं।

बढ़ती बेरोजगारी के मुद्दे पर आर.के.सिन्हा कहते हैं, "भारत कृषि प्रधान देश है और रोजगार सबसे ज्यादा कोई क्षेत्र अगर दे सकता है तो कृषि है। हमारे यहाँ महाकवि घाघ की एक कहावत है जो आज भी प्रासंगिक है। "उत्तम खेती ,मध्यम बान,निषिद्ध चाकरी भीख निदान " हमारे यहाँ खेती को हमेशा सर्वोत्तम माना गया है और कृषि व्यवस्था दुरुस्त हो तो रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। और ग्रामीण युवकों को रोजगार की तलाश में शहरों में दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा।






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