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बेहमई हत्याकांड: वादी ने कहा, 'हम 39 साल से दहशत में जी रहे हैं'

बेहमई हत्याकांड में राजाराम सिंह ही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने घटना के बाद इस मामले की एफआईआर थाने में दर्ज कराई थी। इस हत्याकांड में इनके परिवार के सात लोगों की हत्या हुई थी। ये घटनास्थल से महज 100 मीटर की दूरी पर झाड़ियों के पीछे छिपे बैठे थे।

Neetu SinghNeetu Singh   18 Jan 2020 6:38 AM GMT

बेहमई (कानपुर देहात)। "केस लड़ते-लड़ते हमारी तो उमर गुजर गयी, दुःख यही है कि इतने वर्षों में कुछ हुआ नहीं। अपनी आँखों के सामने अपनों को मरते देखा है। खुद को कैसे तसल्ली दें?' चबूतरे पर कुर्सी पर बैठे वादी राजाराम सिंह (71 वर्ष) ये कहते हुए न्याय प्रणाली पर नाराजगी जताते हैं।

बेहमई हत्याकांड में राजाराम सिंह ही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने घटना के बाद इस मामले की एफआईआर थाने में दर्ज कराई थी। इस हत्याकांड में इनके परिवार के सात लोगों की हत्या हुई थी। ये घटनास्थल से महज 100 मीटर की दूरी पर झाड़ियों के पीछे छिपे बैठे थे।

थर्रा देने वाले इस हत्याकांड का 39 साल बाद 18 जनवरी को फैसला आना था जिसकी तारीख बढ़ाकर अब 24 जनवरी कर दी गयी है। इसमें मुख्य आरोपी फूलन देवी की मौत हो चुकी है।

वादी राजाराम सिंह ही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने इस मामले की एफआईआर दर्ज कराई थी

बेहमई गांव का यही वह हत्याकांड है जिसने देशभर में फूलन देवी की छवि खूंखार डकैत की बना दी थी। कई मीडिया रिपोर्ट और शेखर कपूर द्वारा बनाई गयी फिल्म 'बैंडिट क्वीन' के अनुसार फूलन देवी ने इस घटना को इसलिए अंजाम दिया था क्योंकि फूलन देवी के साथ उस समय के कुख्यात डाकू लालाराम और श्रीराम ने बहुत समय तक गैंगरेप किया और तमाम तरह के अत्याचार किये थे। इसके बाद इन डाकुओं ने बेहमई गाँव में फूलन देवी को एक कमरे में बंद कर दिया था जिसमें गाँव के कई लोगों ने कई दिनों तक उसका गैंगरेप किया था। फूलन देवी इनके चंगुल से बमुश्किल भाग पाई थी। अपने ऊपर हुए अत्याचारों का बदला लेने के लिए फूलनदेवी ने डाकू बनकर इस घटना को अंजाम दिया था।

वहीं इस समय इस घटना को बेहमई गाँव में कोई भी मानने को तैयार नहीं है। राजाराम सिंह 39 साल पहले का आंखों देखा हाल बताते हैं, "पहली गोली फूलन देवी और मानसिंह ने 'काली माई' का जयकारा लगाकर चलाई। कुछ देर गोलियों की ताड़-ताड़ आवाज हुई, थोड़ी देर में गाँव के 20 लोग मारे गये। फूलन ने 26 लोगों को एक लाइन में खड़ा किया था जिसमें 20 तुरंत मर गये और छह घायल हो गये थे। घायलों में अब सिर्फ एक आदमी ही जिन्दा है।"

कानपुर देहात जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर राजपुर ब्लॉक के यमुना किनारे बसा बेहमई गाँव वर्ष 14 फरवरी 1981 को देशभर में तब चर्चा में आया जब दस्यु सुन्दरी के नाम से मशहूर फूलन देवी के गिरोह ने बेहमई गांव में 20 लोगों को गोलियों से भून दिया था।

मुन्नी देवी वो महिला जो 11 साल की उम्र में विधवा हो गईं थीं

इस फैसले के इन्तजार से कोसों दूर बैठी मुन्नी देवी (50 वर्ष) वो महिला है जिसकी शादी महज 11 साल की उम्र में हो गयी थी। अभी शादी के चार महीने ही हुए थे, इनका गौना नहीं हुआ था तबतक इन्हें इनके पति के मौत की खबर मिली।

"इतने सालों से लोग आते हैं, फोटो खींचते हैं और चले जाते हैं, पर हमें कुछ नहीं मिलता। किसी ने आजतक ये खबर नहीं ली कि हम कैसे जी रहे हैं? मायके में माँ-बाप नहीं, ससुराल में सास-ससुर, पति नहीं, किसको देखकर जिएं?" ये कहते हुए मुन्नी देवी के आंसू रुक नहीं रहे थे, वो सरकार और मीडिया के लोगों से बहुत नाराज थीं।

तखत पर बैंठी दरवाजे के दाहिने तरफ लगी खूंटी की तरफ इशारा करते हुए मुन्नी देवी बताती हैं, "लोग बताते हैं उस दिन भी ये (पति) स्कूल से पढ़कर आये थे, यहीं पर अपना बस्ता टांगा था। डाकू इन्हें पकड़कर ले गये और मार दिया। हमने तो मरने के बाद ही इनका मुंह देखा। अब फैसला जो भी आये हमें उससे क्या मतलब? मेरा आदमी तो वापस नहीं आएगा।"

"हम जिस बिरादरी से हैं, हमारे यहां दोबारा शादी नहीं होती। हमारी एक बेटी भी होती तो हम उसी के सहारे जी लेते, हम सरकार से कुछ नहीं मांगते। पिछले साल ही पेंशन बंधी है, महीने के 300 रुपए से क्या होता है?" मुन्नी के चेहरे पर रोते वक़्त अचानक से तब खुशी आ गयी कि जब उन्होंने कहा, "अभी आपको फोटो दिखाते हैं उनकी।" वो दौड़कर पन्नी में लिपटी रखी अपने पति की फोटो उठाकर लाईं।

फूलनदेवी की मां सबसे हाथ जोड़कर अपनी पारिवारिक जमीन वापस दिलाने के लिए कहती हैं.

वह कौन सी वजह थी जिसने फूलन देवी को डाकू बनने के लिए मजबूर किया? इस पर फूलनदेवी की मां मुला देवी (85 वर्ष) बताती हैं, "हमारी बेटी जिस जमीन के लिए डाकू बनी थी वो आज दिन तक हमें नहीं मिली। न हमारी जमीन मईयादीन (फूलनदेवी का चचेरा भाई) लेता और न वो डाकू बनती। हमारे जीते-जीते जी कोई हमारी जमीन हमें दिला दे बस, फोटो खींचकर सब ले जाते हैं। करता कोई कुछ नहीं।"

मुलादेवी हर आने वाले से अपनी पारिवारिक जमीन को वापस दिलाने की मांग करती हैं। फूलनदेवी के बचपन के बारे में वो बताती हैं, "हमारे साथ खेत जाती थी, बकरियां चराती थी, खेत में बहुत काम करती थी। मईयादीन ने उस पर डकैती का झूठा आरोप लगाकर जेल भेज दिया। जब जेल से छूटकर आयी फिर उसे डकैत पकड़कर ले गये, तबसे वह डकैत बन गयी।"

बेहमई गाँव की वो जगह जहाँ फूलनदेवी ने 20 लोगों पर गोलियां चलाई थीं

बेहमई कांड के बाद फूलन देवी को पुलिस कभी गिरफ्तार नहीं कर पायी। फूलन देवी ने मध्य प्रदेश पुलिस के सामने 1983 में अपनी कुछ शर्तों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया था। सरकार ने फूलन देवी की ये शर्ते मान ली थीं। फूलन देवी ने पुलिस के सामने ये शर्त रखी थी कि उनके गैंग के किसी व्यक्ति को फांसी न दी जाए, उनके पिता की जमीन वापस की जाए, उनके भाई-बहनों को सरकारी नौकरी दी जाए।

फूलन देवी लगभग 12 साल जेल में रहने के बाद रिहा हुई। उन्हें 1996 में समाजवादी पार्टी से टिकट मिला जिससे वो मिर्जापुर से लोकसभा चुनाव लड़ीं। दो बार सांसद बनी और सांसद के दौरान ही 25 जुलाई 2001 में उनकी हत्या कर दी गयी।

वादी राजाराम सिंह के अनुसार, 'उस दिन फूलनदेवी 35-40 डाकुओं के साथ जालौन जिले से यमुना नदी के रास्ते नाव से आयी थी, पहले गाँव में उसने लूटपाट की, फिर सबको एक जगह इकट्ठा करके मार दिया।"

राजाराम ने 15 आरोपियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई थी। जिसमें मानसिंह समेत तीन चार आरोपी अभी भी फरार हैं, कई की मौत हो चुकी है। पोसा नाम का एक आरोपी जेल में बंद है जबकि एक दूसरे आरोपी रामसिंह की जेल में ही मौत हो गयी है।

जिस जगह पर डकैतों ने ग्रामीणों को गोलियों से भूना था उस जगह पर गाँव के लोगों ने शहीद स्मारक बनाकर मरे हुए 20 लोगों का नाम, उम्र, गाँव का नाम, पिता का नाम समेत घटना की तारीख, सन और दिन का भी उल्लेख किया है। आज भी इस स्मारक की गाँव के लोग पूजा करके अपनों को याद करते हैं।

राजाराम अपने 39 साल के संघर्षों को याद करते हुए कहते हैं, "बदला लेने के लिए हम तड़प रहे हैं, पर इस न्याय व्यवस्था के आगे हम क्या कर सकते हैं? सरकार का कोई आदमी हमारी गांव की विधवाओं से मिलने नहीं आया। उनसे मिलिए और देखिए कि वो किस तकलीफ में जी रही हैं। हर बार तारीख बढ़ा दी जाती है।"

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