झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को 15 वर्षों से मुफ्त पढ़ा रही हैं ‘अम्मा जी’

झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को 15 वर्षों से मुफ्त पढ़ा रही हैं ‘अम्मा जी’खंजन गुरुकुल विद्यालय

भोपाल (मध्य प्रदेश)। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में वैसे तो कई सारे बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान हैं, लेकिन इन सबसे अलग एक मोहल्ले में एक ऐसा गुरुकुल यहां पर स्थित है जहां पढ़ने वाले बच्चे अलग हैं, पढ़ाने वाली शिक्षिकाएं अलग हैं। गुरुकुल की प्रबंधक खुद सुबह झाड़ू लगाती हैं और बच्चों को घर-घर बुलाने जाती हैं।

मैं बात कर रहा हूं भोपाल के लालघाटी क्षेत्र के विजयनगर में स्थित खंजन गुरुकुल विद्यालय की। इसकी संस्थापक माधवी आशेवाल (75 वर्ष) जिनको सब अम्मा जी कह कर पुकारते हैं, उन्होंने अपना जीवन उन बच्चों के लिए समर्पित कर दिया जो शिक्षा के प्रकाश से दूर थे। झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले बच्चों के लिए उन्होंने करीब 15 वर्ष पहले खंजन गुरुकुल विद्यालय की शुरुआत की और इन बच्चों को मुफ्त में पढ़ाना शुरू किया, जिससे वो भी दूसरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकें।

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माधवी खुद सिर्फ पांचवीं तक पढ़ीं हैं, लेकिन वो उन सभी बच्चों को पढ़ाने की इच्छा रखती हैं, जो अपने परिवार की आर्थिक स्थिति य किसी दूसरे कारणों की वजह से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं।

बेसहारा और झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों की शिक्षा पर काम कर रही संस्था सेव द चिल्ड्रेन द्वारा कराए गए सर्वे के मुताबिक, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले 63 फीसदी बच्चे निरक्षर हैं। इसमें 37 फीसदी लड़कियां हैं।

यूनिसेफ 14 से 20 नवंबर तक उन बच्चों के लिए जागरूता अभियान चलाएगा जो पढ़ने के लिए स्कूल नहीं जाते हैं। ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को साक्षर बनाया जा सके।

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माधवी बताती हैं, ''जब स्कूल शुरू किया था उस समय सिर्फ 20-25 बच्चे आते थे। उनको भी पढ़ने के लिये बुलाने जाना पड़ता था, उसके बाद फिर धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गई।'' उन्होंने बताया कि जब स्कूल शुरू किया तो बच्चों को पढ़ाने के लिए टीचर की समस्या थी, क्योंकि मैं टीचर को रुपए नहीं दे सकती थी। लेकिन फिर मैने अपने पड़ोस में ही कुछ लोगों से बात की तो कुछ लोग मुफ्त में पढ़ाने के लिए तैयार हो गए।

इस समय दो अध्यापिकाएं यहां पढ़ाती हैं, जिसमें शैल बाला सक्सेना 2002 से मुफ्त में पढ़ा रही हैं और मीना अयन्यास नौ वर्षों से पढ़ा रही हैं।

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माधवी के पांच बेटे-बेटियां (तीन बेटे और दो बेटियां) थीं, पति (जीएस आसीवाल) पोस्टऑफिस में काम करते थे, जिनकी करबी तीन महीने पहले दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई। माधवी के एक बेटे की एक्सीडेंट में मौत हो गई थी और बाकी दो बेटे अलग-अलग शहरों में काम करते हैं, बेटियों की शादी हो गई और माधवी अब अकले ही रहती हैं।

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माधवी खुद सुबह उठकर पूरे स्कूल की सफाई करती हैं, जो बच्चे स्कूल नहीं आते उनको बुलाने जाती हैं। गुरुकुल में पढ़ने वाले सभी बच्चें झोपड़पट्टी में रहते हैं। किसी के पिता दिहाड़ी मजदूरी करते हैं तो किसी की मां दूसरों के बर्तन मांज कर परिवार का गुजारा करती है।

माधवी आगे बताती हैं, ''धीरे-धीरे यहां 200 बच्चे पढ़ने आने लगे थे, उस समय पढ़ाने के लिए चार टीचर थे लेकिन इस समय सिर्फ 55 बच्चे आते हैं।'' उन्होंने बताया, ''यहां के पढ़े हुए कई बच्चे आगे की पढ़ाई दूसरी जगह पर कर रहे हैं। यहीं का पढ़ा सोनू ओसवाल हमीदिया कॉलेज, भोपाल से एमबीए कर रहा है और राहुल मानवी बीकॉम की पढ़ाई कर रहा है।''

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स्कूल चलाने मेें आती रहीं अड़चने

‍खंजन गुरुकुल विद्यालय एक मंदिर से सटा हुआ है, उस मंदिर की स्थापना भी माधवी आशेवाल ने ही की थी, जिसकी समिति के द्वारा कई बार स्कूल को बंद करवाने की धमकी दी जा चुकी है, और तीन बार स्कूल की मान्यता भी रद्द करवाई जा चुकी है। माधवी बताती हैं, ''इस मंदिर की स्थापना भी मैने की थी अब इस मंदिर की समिति बन गई है तो उसके लोग मुझसे स्कूल की जगह को मंदिर में देने को कहते हैं। तीन बार स्कूल की मान्यता भी रद्द करवा दी जिसके लिए तीन वर्ष तक केस लड़ी हूं।''

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