एक अच्छी मुहिम की शुरुआत: प्रकृति को केमिकल से बचा रहे हैं आईआईटी बीएचयू के छात्र

एक अच्छी मुहिम की शुरुआत: प्रकृति को केमिकल से बचा रहे हैं आईआईटी बीएचयू के छात्रबनारसी साड़ियों और भदोही के कालीनों को प्राकृतिक रंगों से रंगा जाएगा।

लखनऊ। बीएचयू यानि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के आईआईटी छात्रों ने प्रकृति को केमिकल से दुष्प्रभावों से बचाने के लिए एक अनोखी शुरुआत की है। ये छात्रों की मेहनत का ही नतीज़ा है कि अब बनारसी साड़ियों और भदोही के कालीनों को प्राकृतिक रंगों से रंगा जाएगा। प्राकृतिक रंगों की खास बात यह होती है कि वे पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते और उन्हें कोई भी बना सकता है। बस ज़रूरत होती है तो सिर्फ ट्रेनिंग की जो अब आईआईटी बीएचयू के छात्र देंगे।

आईआईटी बीएचयू के छात्रों ने वह तकनीक खोज ली है जिससे बनारसी साड़ियों को प्राकृतिक रंगों में रंगा जाता है। अब बनारसी साड़ियों को फूल, पत्तियां, पेड़ की छाल, तनों और बाकी प्राकृतिक स्त्रोतों से मिलने वाले रंगों से रंगा जाएगा।

वेबसाइट योर स्टोरी के मुताबिक़, प्राकृतिक रंग बनाने का काम मंदिरों से निकलने वाले फूल और पत्तियों, बीएचयू के कैंटीन और रेस्टोरेंट से निकलने वाली सब्जियों के छिलकों से किया जा रहा है। इससे प्राकृतिक रंग भी तैयार होते हैं और मंदिरों और कैंटीन से निकलने वाली बेकार सामग्रियों का भी उपयोग हो जाता है।

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फूल-पत्तियों, फल-सब्ज़ियों से प्राकृतिक रंग बनाने का काम आईआईटी के मालवीय उद्यमिता संवर्ध केंद्र में किया जा रहा है। प्रोजेक्ट हेड ज्ञानेंद्र त्रिपाठी बताते हैं कि कि केमिकल के रंग सेहत के लिए नुकसानदायक हैं। भदोही में कालीन रंगने वाले ज्यादातर लोगों को त्वचा की बीमारियां होती हैं और डाई के बाद यही केमिकलयुक्त पानी जल-प्रदूषण भी फैलाता है। लेकिन प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से इनसे बचा जा सकता है।

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इस प्रोजेक्ट पर काम करने वाले आशीष बताते हैं कि अब लोग सिंथेटिक या केमिकल चीज़ों को छोड़कर प्राकृतिक चीजों का प्रयोग कर रहे हैं। प्राकृतिक रंगों से तैयार किए गए इन उत्पादों का विदेशों में भी निर्यात किया जाता है। आशीष कहते हैं कि इन साड़ियों और कालीनों से हमारी अर्थव्यवस्था को भी मज़बूती मिल सकती है।

मालवीय उद्यमिता संवर्धन केंद्र के को-ऑर्डिनेटर प्रो. पीके मिश्र का भी कहना है, कि प्राकृतिक रंगों से जल प्रदूषित होने से बच जाता है। नालों के माध्यम से केमिकल और सिंथेटिक डाई नदियों में छोड़ दिए जाते हैं, जिससे नदियों का अस्तित्व आज खतरे में है। बीएचयू आईआईटी ने अपने इस प्रयास से बनारसी साड़ी उद्योग और भदोही कालीन उद्योग को खासतौर पर नया स्वरूप देने की कोशिश की है। आईआईटी में इस तकनीक को उद्योग से जुड़े लोगों को सिखाने का भी इंतजाम किया जा रहा है।

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केमिकल इंजिनियरिंग के प्रोफेसर पीके मिश्र के मुताबिक, गुलाब हो या फिर गेंदा या सूरजमुखी के फूल, संतरे से लेकर अनार, प्‍याज तक के छिलके, बबूल और यूकेलिप्‍टस तक से हजारों किस्‍म के प्राकृतिक रंग बनाए जा सकते हैं। प्रो. मिश्र का दावा है, कि बाजार में नैचुरल कलर के नाम पर धोखाधड़ी होती है, जबकि आईआईटी लैब में पानी से तैयार नेचुरल डाई जर्मनी और अन्‍य देशों के 'ग्रीन टैग' टेस्टिंग पर खरी उतरने वाली है।

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