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काशी में 6 महीने से शिव को तलाश रहा बेसुध पिता, बीएचयू के छात्र को पुलिस ले गई थी, तब से लौटकर नहीं आया

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाला मध्य प्रदेश का एक छात्र 6 महीने से लापता है। शिव के पिता भूखे प्यासे नंगे पैर बनारस की गलियों और थानों में भटक रहे हैं। शिव को आखिरी बार थाने में देखा गया था, उसके बाद से कोई पता नहीं। वाराणसी से मिथिलेश धर की रिपोर्ट

Mithilesh DharMithilesh Dhar   23 Aug 2020 11:15 AM GMT

वाराणसी (उत्तर प्रदेश)। 'भैया, इस लड़के को कहीं देखा है आपने, मेरा बेटा है ये। ध्यान से देखिये, शायद कहीं देखा हो।'

घाट पर घूम-घूम कर 55 साल के प्रदीप कुमार त्रिवेदी कई लोगों से ये सवाल करते हैं, न में जवाब सुनकर वे निराश होकर एक बार फिर अस्सी घाट की सीढ़ियों पर बैठ जाते हैं, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं टूटती।

"मैं प्रण लेकर आया हूं। या तो अपने बेटे को लेकर जाऊंगा, या तो बनारस से मेरी लाश ही जायेगी। मैंने पिछले छह महीने से चप्पल भी नहीं पहना है। जब तक शिव मिल नहीं जाता, मैं काशी छोड़ूंगा ही नहीं।" यह कहते-कहते बुजुर्ग पिता की पथराई आंखे आंसुओं से भर जाती हैं।

बनारस हिंदू विश्विद्यालय में बीएससी द्वितीय वर्ष में पढ़ने वाला उनका बेटा 24 वर्षीय शिव कुमार त्रिवेदी 13 फरवरी 2020 से लापता है। आखिरी बार उसे लंका पुलिस चौकी में देखा गया था। शिव को खोजने आए उनके किसान पिता के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे अपने पैसे से खाना तक खा सकें। रहने के लिए होटल या कमरा लेना दूर की बात है। पिछले छह महीने से वे अस्सी घाट पर रह रहे हैं, दिनभर अकेले ही बेटे की तलाश करते हैं, अधिकारियों के चक्कर लगाते हैं।

मध्य प्रदेश में पन्ना जिले के पोस्ट बड़गढ़ी खुर्द में ब्रजपुर गांव से वो जो कपड़ा पहनकर आये थे, वही एक जोड़ी कपड़ा है उनके पास। खाना कभी भंडारे में खा रहे हैं तो कभी बीएचयू के छात्र खिला रहे।

प्रदीप कुमार त्रिवेदी गांव कनेक्शन को बताते हैं, "13 फरवरी को जब मेरी शिव से बात हुई थी तो उसने कहा कि आज उसे बुखार है। वह सुबह-सुबह काशी विश्वनाथ मंदिर भी गया था। उसके बाद से मेरी उससे बात नहीं हुई। मैंने उसे 14 फरवरी को फोन किया लेकिन उसका फोन नहीं उठा। फिर 15 फरवरी को भी फोन किया, फिर फोन नहीं उठा, तब मैंने मकान मालिक को फोन किया। उन्होंने मुझे बताया कि शिव के कमरे का ताला खुला है। मैं 16 फरवरी को बनारस आता हूं। उसके कमरे में गया तो देखा कि उसका फोन और पर्स तो कमरे में ही है। मैं तब से उसे ढूंढ रहा हूं।"

पुलिस क्यों छिपा रही थी कि शिव को कभी थाने लाया गया था?

प्रदीप आगे बताते हैं "मैं लंका थाने गया और गुमशुदगी का मामला दर्ज कराया। उस दिन मुझे वहां किसी ने नहीं बताया कि शिव को कभी यहां लाया गया था। पुलिस ने कहा कि आप भी तलाश करिये, हम भी करेंगे। इसके बाद जब यह मामला बच्चों ने फेसबुक पर डाला, तब बीएचयू के ही एक छात्र अर्जुन सिंह ने 19 फरवरी को फोन किया और बताया कि आपके बेटे को तो पुलिस लंका थाने ले गई थी।"

"जब अर्जुन ने मुझे बताया तो मैं दोबारा लंका थाने गया, लेकिन उन्होंने इस मामले पर कुछ भी बोलने से मना कर दिया और कहा कि चेतगंज थाने जाओ। वहां बोले कि आप कंट्रोल रूम जाइये। वहां गया तो कोई जानकारी नहीं दी गई। इसके बाद मैंने अर्जुन सिंह से डायल 112 की पूरी जानकारी ली और मैं एसएसपी प्रभाकर चौधरी के पास गया। जब उन्हें पूरी जानकारी दी तब उन्होंने 112 नंबर के ड्राइवर को बुलाया। पूछताछ के बाद ड्राइवर ने ही बताया कि हमने शिव कुमार को 13 फरवरी को रात साढ़े आठ बजे लंका पुलिस चौकी में छोड़ा था।" प्रदीप कहते हैं।

शिव की एक पुरानी तस्वीर।

अपनी बात जारी रखते हुए वे आगे बताते हैं, "फिर एसएसपी साहब ड्राइवर को मेरे पास भेजते हैं और कहते हैं कि जिसको हैंडओवर किया था, उसके पास इन्हें लेकर जाओ। तब तत्कालीन लंका थाना इंचार्ज भारत भूषण तिवारी के सामने ड्राइवर ने बताया कि उन्होंने शिव को इन्हीं को सौंपा था। तब भारत भूषण जी कहते हैं कि शिव रातभर कमरे (कस्टडी) में बंद था। सुबह जब हमने उसे देखा तो उसने कपड़े में बाथरूम कर दिया था। वह मानसिक से रूप में बीमार था। इसलिए हमने उसे छोड़ दिया। तब से हमारे पास कोई जानकारी नहीं है।"

पुलिस शिव को ले क्यों गई?

एक सवाल यह भी है कि आखिर पुलिस शिव को थाने क्यों ले गई थी। इस बारे में गांव कनेक्शन ने अर्जुन सिंह से बात की। अर्जुन बीएचयू से एमएससी की पढ़ाई कर रहे हैं और बनारस में ही रहते हैं। वे सामने तो नहीं आये लेकिन उन्होंने फोन पर जानकारी दी। वे बताते हैं, "13 फरवरी की शाम मैंने देखा कि एमपी थिएटर ग्राउंड के पास नाले में पैर डाले कोई बैठा था। पास गया तो मैंने उससे बात करने की कोशिश की लेकिन उसने कुछ बताया ही नहीं। फिर वहां कुछ और बच्चे आ गये। तब भी उसने कुछ नहीं बताया। हमें लगा कि शायद यह नशे में है। फिर मैंने 112 नंबर पर फोन किया। वे लोग आये और उसे लेकर जाने लगे। मैंने पूछा कि कहां ले जा रहे थे उन्होंने बताया लंका चौकी ले जा रहे हैं, कुछ देर बाद छोड़ देंगे।"

फोन करके के बाद अर्जुन के नंबर पर 112 से आया मैसेज

"मुझे भी लगा कि वह वापस आ गया होगा। फिर अचानक से मैंने एक दिन देखा कि हमारे कुछ फेसबुक साथी उसी बच्चे की तस्वीर शेयर कर रहे थे और बता रहे थे कि यह कैंपस से गायब हो गया है। तब मुझे उसका नाम भी पता चला। मैंने तुरंत शिव के पिता को फोन किया और उन्हें बताया कि आपके बेटे को लंका चौकी ले जाया गया था। मैंने उस दिन का मैसेज भी उन्हें दिखाया जो 112 नंबर पर कॉल करने के बाद मेरे पास आया था। उसमें कौन सी गाड़ी आ रही है, उसका नंबर था।" अर्जुन आगे कहते हैं।

तो क्या शिव की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी?

पुलिस की मानें तो शिव जब थाने में आया तो उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। इस बारे में प्रदीप त्रिवेदी कहते हैं, "कभी-कभार उसे तेज बुखार आता है। उस दिन भी उसे बुखार था, जब मेरी उससे आखिरी बार बात हुई थी। और अगर वह मानसिक रूप से बीमार होता तो बीएचयू में पढ़ता कैसे?"

शिव कुमार के बारे में उनके पिता यह भी बताते हैं कि वह बचपन से ही पढ़ने में बहुत तेज है। नवोदय में पढ़ाई के दौरान 10वीं में उसके बहुत अच्छे नंबर थे। 12वीं के साथ ही उसने आईआईटी निकाल लिया था। वह एडमिशन के लिए कानपुर भी गया लेकिन तबियत खराब होने की वजह से वह आईआईटी की पढ़ाई नहीं कर सका। इसके बाद उसने बीएचयू में इंट्रेस एग्जाम दिया और यहां उसने बीएससी में एडमिशन लिया। अगर वह मानसिक रूप से बीमार होता तो यह सब कर पाता क्या? हां, वह सबके साथ रहना पसंद नहीं करता इसलिए वह कॉलेज के बाहर छित्तूपुर गेट के पास हॉस्टल में रहता था। वह सबके साथ घुल-मिल नहीं पाता था।

मां को बचपन में ही खो चुके शिव दो भाइयों में बड़े हैं। छोटा भाई उमा शंकर त्रिवेदी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ता है। पिता किसानी करते हैं।

"मानसिक बीमारी जैसी कोई बात नहीं है। पुलिस की लापरवाही की वजह से यह सब हुआ है। पुलिस अगर कॉलेज कैंपस से छात्र को ले गई तो चीफ प्रॉक्टर को बताना चाहिए था। पुलिस प्रशासन ने लापरवाही बरती। पहले तो मानने से ही इनकार कर दिया कि शिव हमारी कस्टडी में था। फिर बोले कि हमने छोड़ दिया था। मेरे पिता बनारस में छह महीने से हैं। वे हर जगह ढूंढ चुके हैं। अगर पुलिस ने उसे छोड़ा होता तो वह कहीं तो मिलता। अगर वह बीमार लग रहा था कि तो पुलिस को कॉलेज प्रशासन को सूचना देनी चाहिए थी।" उमा शंकर कहते हैं।

शिव के कॉलेज कैंपस को प्रणाम करते प्रदीप।

बीएचयू के आधिकारिक ट्वीटर हैंडल से 22 फरवरी को एक ट्वीट किया जाता है जिसमें बताया जाता है कि विज्ञान संस्थान के बीएससी, भौतिकी के छात्र शिव कुमार त्रिवेदी अपने कमरे के पास से गायब हैं। परिजनों के अनुसार उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है।

इस ट्वीट के संबंध में प्रदीप कहते हैं, "मैंने कभी किसी से ऐसा कुछ कहा ही नहीं। और अगर मेरा बेटा मानसिक रूप से बीमार था तो सामान्य बच्चों के साथ पढ़ कैसे रहा था? अगर वह बीमार था उसके क्लास टीचर और प्रॉक्टर को हमें सूचना देनी चाहिए थी।"

इस बारे में बीएचयू के चीफ प्रॉक्टर प्रोफेसर ओपी राय बताते हैं, "हम लगातार कोशिश कर रहे हैं। अपनी तरफ से लगातार पुलिस से संपर्क स्थापित कर शिव की खोजबीन का प्रयास कर रहे हैं।"

मानसिक रोगी अगर होता भी तो पुलिस को क्या कदम उठाने चाहिए थे?

लंका पुलिस के मुताबिक शिव मानसिक रूप से बीमार था। उसकी तलाश की जा रही है। इस बारे में इंस्पेक्टर महेश पांडेय कहते हैं, "लड़के के पिता प्रदीप त्रिवेदी कई बार थाने आ चुके हैं। हम अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे हैं। पिता को लेकर लंका पुलिस बिहार और तमिलनाडु भी गई थी, लेकिन कोई जानकारी हाथ नहीं लग पाई है। वह मानसिक रूप से बीमार था। बीमार नहीं होता तो गायब ही नहीं होता। अभी हमारी टीम और कुछ जगहों पर ढूंढने के लिए जाने वाली है।"

हाईकोर्ट पहुंचा मामला

पिता प्रदीप के संघर्षों को देखने के बाद बीएचयू के छात्रों ने सोशल मीडिया पर मुहिम चलाई। बीएचयू के ही पूर्व छात्र और इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकील सौरभ तिवारी ने लेटर पेटिशन भेजकर जनहित याचिका के रूप में पूरे मामले को उच्च न्यायालय में सुनने का अनुरोध किया, जिसे स्वीकार कर लिया गया है और मामले की पहली सुनवाई 25 अगस्त होगी।

सौरभ तिवारी गांव कनेक्शन से कहते हैं, "मुझे शिव कुमार त्रिवेदी के बारे में बीएचयू के छात्रों ने बताया था। इसके बाद शिव के पिता प्रदीप मुझसे मिलने आये। हमने उनकी स्थिति देखी तो उनका मुकदमा लड़ने का फैसला लिया। इसके बाद मैंने याचिका दायर की। जिस पर 25 को सुनवाई होनी है।"

पुलिस की भूमिका पर सवाल क्यों उठ रहे हैं

"इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका संदिग्ध रही है। लड़के का पिता जब लंका चौकी पर जाता है तो पुलिस उन्हें यह नहीं बताती कि आपका बेटा हमारे पास था। पुलिस सहयोगी नहीं करती। और अगर शिव की मानसिक स्थिति ठीक नहीं तो ऐसी स्थिति में तो उसे और अकेले नहीं छोड़ना चाहिए था।" सौरभ कहते हैं।

हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी

वे आगे कहते हैं कि इस मामले में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उम्मीद बंधी है कि न्याय होगा। इस मामले में हाईकोर्ट ने वाराणसी से डीएम, एसएसपी और लंका एसओ को नोटिस जारी किया है। याचिका की कॉपी शासकीय अधिवक्ता को दी गई है। 25 तारीख को मैं कोर्ट में पिता का पक्ष रखूंगा।

मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति समित गोपाल की खंडपीठ ने सरकारी वकील को इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख तक एक जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा।

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