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ग्रीन ग्रुप की 25 महिलाओं ने पूरे गांव को बनाया शराब मुक्त

लखनऊ। अच्छी शिक्षा हासिल करके जिंदगी में ऊंचा मुकाम पाने की तमन्ना आजकल का लगभग हर युवा रखता है लेकिन सामाजिक समस्याओं के बारे में सोचना और एक बेहतर समाज के निर्माण में सहयोग करने का ख्याल बहुत कम युवाओं के मन में ही आता है। हम आपको बता रहे हैं कुछ ऐसे छात्रों के बारे में जो पढ़ाई करने के बाद मोटा पैसा कमाने को अपनी जिंदगी का उद्देश्य बनाने के बजाय समाज की बुराईयों को मिटाने के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं।

बीएचयू (बनारस हिंदू विशवविद्यालय) के कुछ छात्रों ने होप नाम की एक संस्था बनाई है, जिसमें बीएचयू के साथ काशी विद्यापीठ, दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र और प्रोफेसर जुड़कर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ये छात्र गांवों में जाकर वहां की समस्याओं को अपने बेहतर आइडिया से समाधान में बदल रहे हैं। इनमें प्रमुख है ग्रीन ग्रुप का गठन जिसमें महिलाएं एक समूह में गांव में निकलती हैं और जुए और शराब जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अभियान छेड़ती हैं।

‘होप’ समूह की शुरुआत वर्ष 2015 में बनारस में घटी एक घटना से हुई जब बीएचयू के कुछ छात्र गंगा के घाट पर जन्मदिन की पार्टी मना रहे थे। संस्था के अध्यक्ष रवि मिश्रा याद करते हुए बताते हैं, जनवरी में हम लोग जन्मदिन मना के लौट रहे थे तभी हमने एक कूड़े के ढेर में कुछ बच्चों और महिलाओं को खाना ढूंढते देखा, उसी कूड़े में जानवर भी अपना खाना ढूंढ रहे थे। ये देखकर हमें धक्का लगा और तब हमने सोचा कि हमें कुछ करना है समाज में ऐसे लोगों के लिए जिनके पास उतनी चीजें नहीं हैं जितनी हमारे पास हैं।

उस घटना से एक विचार जन्मा और छात्रों ने एक समूह बनाकर सोचना शुरू किया कि समाज के किस वर्ग को हमारी ज्यादा जरूरत है। जहां हम अपने सीमित संसाधनों से सकारात्मक बदलाव कर सकते हैं। इसी सोच में होप संस्था की स्थापना हो गयी और काम करने के लिए ग्रामीण क्षेत्र चुना गया। संस्था के उपाध्यक्ष दिव्यांशु उपाध्याय गांवों की ओर लौटने के पीछे समूह के विजन को बताते हुए कहते हैं, शहरों में कई संस्थाएं काम कर रही हैं लेकिन गांवों की ओर कोई संस्था रुख नहीं करती। देश की सत्तर फीसदी जनता जहां रहती है। जहां असल में हमारी जरूरत है, वहां काम करने के लिए हमने अपना अभियान शुरू किया। हम गांवों को बेहतर बनाकर समाज में अपना योगदान चाहते हैं।”

इस अभियान में देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों से छात्र जुड़े हैं जो अपने जेबखर्च से पैसे जोड़कर गांवों में जरूरी संसाधन जोड़ते हैं।

अपने अभियान की शुरुआत करते हुए इन छात्रों ने गांवों में जाकर लोगों से बात की और वहाँ की समस्याएं सुलझाना शुरू कर दिया। गांवों में रौशनी पहुंचाने से लेकर प्रधान की सहायता से तमाम संसाधन मुहैया कराने शुरू कर दिए। लेकिन इस समूह का सर्वश्रेष्ठ प्लान है महिलाओं को शैक्षिक और सुरक्षा के तरीकों से लैस करना। कैम्प लगाकर महिलाओं को अक्षर ज्ञान कराने के साथ हस्ताक्षर करवाना सिखाते हैं, इनमें से 25 महिलाएं चुनकर ग्रीन ग्रुप का गठन होता है।

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बनारस के खुशियारी गांव में इस समूह ने महिलाओं को ही इस तरह सशक्त बनाया कि उन्होंने बरसों से जुए और शराब के आगोश में डूबे गांव को बचा लिया। 25 महिलाओं के इस ग्रीन ग्रुप को पुलिस विभाग ने पुलिस मित्र बना दिया है। इस गांव में बिजली की सुविधा लाने से लेकर पानी और जुए-शराब जैसे खतरनाक अभिशापों से बचाया है। महिलाओं को तैयार करने के बारे में बताते हुए दिव्यांशु कहते हैं, हमारा पहला मकसद महिलाओं को घर से निकालना था, उन्हें अक्षर ज्ञान और हस्ताक्षर करवाने के साथ-साथ उनके अधिकारों के बारे में सचेत किया। गांव में कैम्प लगाकर महिलाओं को एक जगह इकठ्ठा किया और उन्हें बेसिक पढाई-लिखाई के साथ आत्मरक्षा के लिए कराटे जैसे क्लासेस दिए जाते हैं। महीने भर की ट्रेनिंग के बाद एक टेस्ट के माध्यम से उनमें से 25 का चुनाव किया और उन्हें हरी साड़ियां देकर ग्रीन ग्रुप बना दिया गया, जिसे बाद में स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने पुलिस मित्र की जिम्मेदारी सौंप दी।

होप समूह से विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसर भी जुड़े हैं, जो समय समय पर गावों में सभाएं आयोजित करते हैं और जरूरत पड़ने पर छात्रों की मदद करते हैं। चूंकि समूह के कामों का खर्च छात्रों के जेब खर्च से ही चलता है इसलिए इनका अभियान अभी कुछ गाँवों तक सीमित है।

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