मेरा गाँव कनेक्शन (भाग - 3) : चूल्हे के पास बैठी औरतों की खुसुर-फुसुर और पकवानों की महक से सराबोर है बीबामऊ गाँव  

मेरा गाँव कनेक्शन (भाग - 3) : चूल्हे के पास बैठी औरतों की खुसुर-फुसुर और पकवानों की महक से सराबोर है बीबामऊ गाँव  मेरा गाँव कनेक्शन सीरीज़ का तीसरा भाग यूपी के बीबामऊ गाँव पर।

गाँव जाने वाली सड़क, वो गलियारे , खेत और चूल्हे पर बनते उस लज़ीज़ खाने की महक। हमारे गाँवों में कितना कुछ है, जो हमें आज तक याद है। हमारे आस-पास आज कितना कुछ बदल चुका है , लेकिन हमारे गाँव बदलाव की इस रफ्तार के बावजूद भी अपनी मिट्टी से जुड़े हुए हैं और यही बात हमें अपने गाँव की ओर खींचती है। गाँव कनेक्शन की विशेष सीरीज़ ' मेरा गाँव कनेक्शन ' आपको और हमको अपने गाँव के और करीब लाने की एक कोशिश है। सीरीज़ के तीसरे हिस्से में आज बात उत्तर प्रदेश के ‘बीबामऊ’ गाँव की।

गाँव बायोडाटा -

गाँव- बीबामऊ

ज़िला - इटावा

राज्य - उत्तर प्रदेश

नज़दीकी शहर - भिंड, इटावा

गूगल अर्थ पर बीबामऊ गाँव का नक्शा -

बीबामऊ गाँव -

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में जसवंतनगर तहसील क्षेत्र में पड़ता है बीबामऊ गाँव। देश के दूसरे कई इलाक़ों की तरह बाबामऊ में भी पुरुष और महिला का अनुपात अच्छा नहीं है। 2011 की जनगणना के मुताबिक़ इस गाँव में 1179 पुरुषों के मुक़ाबले सिर्फ़ 1022 महिलाएँ हैं। हालाँकि बीबामऊ गाँव में साक्षरता की दर काफी अच्छी है, यहां की साक्षरता दर 78.09 प्रतिशत है ,जबकि उत्तर प्रदेश की साक्षरता दर 69.23 फीसदी ही है।

गाँव की यादें -

' बीबामऊ ' गांव से जुड़ी यादें हमारे साथ साझा कर रही हैं ' पूजा व्रत गुप्ता ', जो इसी गाँव से ताल्लुक़ रखती हैं।

गाँव की गुजिया और बेसन के सेव भुलाए नहीं भूलते -

मेरा भी कोई गाँव है ये बात मुझे उस दिन पता लगी जब एक शाम घर पर एक आदमी बड़े से डब्बे में घी और बहुत सारे गन्ने लेकर आया। बाबा ने बताया ये सामान अपने गाँव से आया है। " गाँव से ?... अपना भी कोई गाँव है बाबा ?.. मेरा अगला सवाल उनसे यही था... जिसके जबाब में उन्होंने गाँव के बारे में बताया, हमारे क़स्बे से तकरीबन 14 किमी दूर बसा है हमारा गाँव, जिसका नाम है 'बीबामऊ'।

सालों पहले बाबा और उनके भाइयों ने गाँव छोड़कर पास के क़स्बे ' जसवंतनगर ' में अपनी - अपनी गृहस्ती बसा ली थी , गाँव की खेती और घर वहीं रहने वाले जरूरतमंद लोगों को दे दिए फिर यहां क़स्बे में आकर सब अपने - अपने काम में इतना रम गए कि शायद ही किसी ने गाँव की सुध ली हो। लेकिन गाँव वालों ने छोटी - छोटी चीजें भेजकर अपना प्यार और रिश्ता हम लोगों से बरकरार रखा ।

मैं भी अपना गाँव देखना चाहती थी , बाबा से कई बार कहा भी लेकिन कभी मौका ही नहीं मिला , फिर एक दिन होली से पहले हुई छुट्टियों में मैं हॉस्टल से घर आई थी , दोपहर में बरामदे में धूप सेंकते हुए ना जाने कैसे गाँव का ज़िक्र छिड़ा और मैंने ज़िद कर दी , क्योंकि घर से दूर होस्टल में रहने की वजह से घर आने पर अब मेरी ज्यादातर ज़िदें पूरी हो जाती थीं , तो ये वाली भी हो गई।

दूसरे दिन बाबा के साथ मैं अपने गाँव के लिए रवाना हुई , रास्ते में मैंने कई बार मैंने बाबा से कहा भी " बाबा आप इतने सालों बाद जा रहे हैं , पता नहीं आपको कोई पहचानेगा भी या नहीं ! " पर बाबा की बातों से लगा जैसे गाँव वाले उनके स्वागत को पलके बिछाए खड़े होंगे। वो बड़े गुरुर से बोले " अरे पहले पहुंचों तो सही वहां। " उनकी इस बात में इतना विश्वास था कि मुझे लगा जैसे हम किसी अंजान जगह नहीं , अपने ही घर जा रहे हैं ।

हमारी गाड़ी अब गाँव के रास्ते पर थी , गाड़ी जैसे - जैसे आगे बढ़ रही थी , बाबा मुझे समय से पीछे की ओर ले जा रहे थे ये बताते हुए कि पहले ये रास्ते कच्चे हुआ करते थे , वो अपने दोस्तों के साथ यहां ख़ूब दौड़ लगाते , यहां नहर के पास पहले कोई छोटा सा मन्दिर था , जहां से बाबा और उनके दोस्त प्रसाद चुराने आते थे , और यहां कुए के पास आम का बड़ा सा पेड़ था , जिस पर उन्होंने ख़ूब गुलेल चलाई है।

ऐसी तमाम यादों से होते हुए हम कब गाँव के उन रास्तों पर आ गए जहां हमारा घर था , पता ही नहीं चला , बाबा ने गाड़ी का शीशा सरकाया , और ड्राइवर को रुकने को कहा । इससे पहले की गाड़ी एक आधे कच्चे , आधे पक्के मकान के सामने रुकती , बच्चों ने गाड़ी को घेर लिया , उनके चेहरों को देखकर लगा जैसे गाँव में पहली बार कोई गाड़ी आयी हो ...

बीबामऊ गाँव का एक दृश्य।

अभी बाबा नीचे उतरे भी नहीं थे कि सामने मुडेर पर जमघट लगाए कुछ लोगों में से एक आदमी उठकर आया और ... दद्दा - दद्दा कहते हुए बाबा के पैर छूने लगा , फिर लगा जैसे एक पूरी भीड़ बाबा की ओर चली आ रही थी , कुछ जानते थे , और जो नहीं जानते थे उन्हें फुसफुसाते हुए बताया जा रहा था कि ये दद्दा कौन है ....

मैं ये सब देखकर जितना खुश थी उससे ज्यादा चमक बाबा के चेहरे पर थी, वो मुझे देखकर बस मुस्कुरा रहे थे , कुछ बोले नहीं लेकिन मैं समझ गयी कि वो कहना चाहते थे कि " देखा ... कितना जलवा है हमारा। "

ये भी पढ़ें- मेरा गाँव कनेक्शन (भाग - 1) : जाट शासकों की कहानी कहता है उत्तर प्रदेश का हड़ौली गाँव  

फिर हम उस घर में गए, जो शायद दो पीढ़ियों पहले हमारा हुआ करता था ... घर के कच्चे आंगन में एक कोने में चूल्हा जल रहा था ...कढ़ाई में उफनते तेल में छनते बेसन के सेव की ख़ुशबू पूरे आंगन में बिखरी थी , वहीं पास में कुछ औरतें और लड़कियां गुजिया बना रही थीं , हमारे आंगन में पहुंचते ही कुछ खुसुर पुसुर हुई और सब जैसे यहां वहां भागने लगीं ... एक औरत जल्दी से दीवार से सटी खटिया खिसकाकर आंगन में लाई और सामने तार पर सूखते चादर को उतारकर फटाफट खटिया पर डाल दिया।

" आओ बैठो लली "

बड़े से घूंघट में से छनकर आयी आवाज़ सुनकर मैं और बाबा खटिया पर बैठ गए ... अब सारी औरतें और लड़कियां वहीं आंगन के एक कोने में खड़ी हमें देखें जा रही थीं , सिवाय एक को छोड़कर , जो अभी भी चूल्हे के पास बैठी फूंकनी से आंच को तेज कर रही थी...

फिर एक लड़की सामने रखे घड़े से दो गिलास पानी लायी ...

और इससे पहले की वो पानी हमें देती , बाबा के पास बैठे वो अंकल बोले " अरे जे सूखों - सूखों पानी क्यों दे रहीं , प्लेट में गुजिया ला रख के। " वो लड़की उल्टे पैर वापस लौटी और दोबारा गुजिया से भरी प्लेट ले आयी ।

बाबा अपनी पुरानी बातों में लगे थे और मैं उन सारी औरतों - लड़कियों के अलावा घर का कोना - कोना निहार रही थी ... लेकिन मन मेरा गर्म - गर्म बेसन के सेव की खुशबू पर ही अटका था ... सोच रही थी , गुजिया के साथ थोड़े सेव भी रख देती तो ! लेकिन जब बहुत देर तक ऐसा नहीं हुआ तो मैं खटिया से उठकर चूल्हे के पास चली गयी , सेव मांगने की हिम्मत तो नहीं थी लेकिन खुशबू को करीब से महसूस कर मुंह में आ रहे पानी को गटके जा रही थी।

" अरे जा लली वहीं बैठ , जे तेज आंच में ना खड़ी हो । " अचानक वो औरत फूंकनी को रखकर बोली तो मैं वापस आकर खटिया पर बैठ गयी , दीवार से चुपचाप झांकते कुछ बच्चों की खिलखिलाहट मेरे कानों में पड़ी , तो मैं उन बच्चों के पास जाकर यूं ही बस सवाल जवाब करने लगी ... तब तक बाबा ने फरमान सुना दिया कि अब हम आसपास की बाकी जगहों को देखने जाएंगे ... हम अभी घर से निकल ही रहे थे कि पीछे से लड़की फिर गुजिया की प्लेट ले आयी और उसके पीछे खड़ी वो घूंघट वाली औरत बोली " अरे लाली एक गुजिया तो खाके जा। "

ये भी पढ़ें- मेरा गाँव कनेक्शन (भाग - 2) : महिला शिक्षा का प्रमुख अंग रहा है राजस्थान का वनस्थली 

मैंने मुस्कुराते हुए कहा " नहीं - नहीं हम मीठा कम ही खाते हैं। "

इतना कहकर हम बाहर चबूतरे पर खड़े हुए तो बच्चों की भीड़ टकटकी लगाए निगाहों से देख रही थी , बाबा ने ना जाने क्या भांपा और अपने कुर्ते की जेब से कुछ सिक्के निकालकर बांटने लगे ... बच्चें यूं लपके मानों इसी का इंतजार था उन्हें ... इसके बाद हम गाँव में बाकी और जगहों को घूमते हुए ... वापस उसी घर वाले रास्ते से होकर क़स्बे की ओर बढ़ने लगे ... गाड़ी जैसे ही घर के आगे से गुजरी बच्चों की टोली फिर गाड़ी के पीछे - पीछे चलने लगी ... बाबा और मैं दोनों यही सोच रहे थे कि इन्हें फिर से पैसे चाहिए , इसलिए गाड़ी रोकी नहीं और उसी स्पीड से गाड़ी चलती रही बच्चे धीरे - धीरे पीछे छूट रहे थे , पर अचानक मेरी नज़र उन बच्चों के बीच हाथ हिलाती उस लड़की पर पड़ी जो गाँव वाले घर में बार - बार मेरे लिए गुजिया की प्लेट ला रही थी ।

बीबामऊ गाँव का रास्ता।

देखा तो नंगे पैर , अपने हाथों में नीली पन्नी मैं कुछ बाधें वो " दीदी - दीदी चिल्लाती हुई गाड़ी के पीछे आ रही थी , मैंने कहा - ड्राइवर भैया गाड़ी रोको ।

ड्राइवर ने गाड़ी रोकी तो वो हांफती हुई मेरे शीशे के पास आई और अपने हाथ में ली हुई वो नीली थैली मुझे देती हुई बोली। " दीदी जे सेव ... मम्मी ने भिजवाएं हैं , तुम मीठा नहीं खाती ना , तो जे दिए हैं। "

मैं इससे पहले कि उसे कुछ कह पाती वो धूल उड़ाती हुई मेरे गाँव वाले घर की ओर वापस लौट गई ... और मैं उन मुट्ठी भर बेसन के सेव को ना जाने कितनी देर अपनी मुट्ठी में जकड़े बैठी रही।

पूजा व्रत गुप्ता की तरह अगर आपके मन में भी हैं अपने गाँव से जुड़ी यादें, तो उन्हें हमारे साथ साझा करें, आख़िर यही तो है हम सबका गाँव कनेक्शन

Share it
Top