क्या भाजपा की जीत का गणित बिगाड़ सकते हैं किसान ?

क्या भाजपा की जीत का गणित बिगाड़ सकते हैं किसान ?फोटो ग्राफिक: कार्तिकेय उपाध्याय

गांधी वादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे दिल्ली में अनशन पर हैं, अन्ना ने सरकार पर किसानों के साथ वादाखिलाफी का आरोप लगाया है। राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन जारी जारी हैं, जानिए आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव पर क्या असर पड़ सकता है। पढ़िए कुशल मिश्रा की रिपोर्ट

देश की राजनीति में साल 2018 बहुत अहम और निर्णायक साबित होने वाला है। इसी साल देश के 8 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और अब तब देश के 20 राज्यों में जीत का डंका बजाती आई भाजपा के लिए अब जीत की राह आसान होती नजर नहीं आ रही है।

कारण, किसानों की ऋणमाफी के साथ-साथ किसानों की आय दोगुनी करने का वादा खुद भाजपा शासित राज्यों में जीत के लिए गले की फांस बन सकता है। स्थिति यह है कि अब तक इन राज्यों में किसानों का गुस्सा आंदोलनों का रूप ले चुके हैं, ऐसे में यह उठने लगे हैं कि क्या इन आगामी चुनावों में किसान बीजेपी की जीत का गणित बिगाड़ सकते हैं

इससे पहले 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गढ़ गुजरात के विधानसभा चुनाव में भी ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ कमजोर हुई थी। गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा को 14 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। वहीं, राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा। साल 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जहां 57 ग्रामीण सीटों पर कब्जा जमाया था, वहीं 2017 में कांग्रेस का यह आंकड़ा 71 पहुंच गया। वहीं भाजपा ने 2012 में ग्रामीण क्षेत्रों की 77 सीटों पर जीत हासिल की थी, जो 2017 के चुनाव में सिर्फ 57 तक ही पहुंच सकी।

इन राज्यों में होने हैं विधानसभा चुनाव

मध्य प्रदेश सीएम शिवराज सिंह, छत्तीसगढ़ सीएम रमन सिंह और राजस्थान सीएम वसुंधरा राजे।

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वर्ष 2018 में जिन 8 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक शामिल हैं, इसके अलावा उत्तर पूर्व में त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड में चुनाव हैं, बीती 3 मार्च को ही मिजोरम को छोड़कर त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित किए गए, जहां त्रिपुरा में 25 साल से सत्ता पर काबिज वाम मोर्चा सरकार को बाहर का रास्ता दिखाकर भाजपा ने जीत का डंका बजाया। ऐसे में 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा दे रही भाजपा उत्तर पूर्व में अपनी पकड़ को और मजबूत बनाने में लगी है।

उत्तर पूर्व के चुनावों से इतर भाजपा शासित मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कांग्रेस शासित कर्नाटक के चुनाव देश की राजनीति में कहीं ज्यादा निर्णायक साबित होंगे। इन राज्यों के किसानों ने ऋणमाफी और किसानों की आय दोगुनी करने के सरकार के वादे के नाम पर किसानों को सिर्फ छलने का आरोप लगाते हुए भाजपा के खिलाफ जमकर आंदोलन किए।

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सड़क पर क्यों उतर रहे किसान

आम किसान यूनियन के संस्थापक सदस्य केदार सिरोही 'गाँव कनेक्शन' से फोन पर बातचीत में बताते हैं, "पिछले समय चुनाव के दौरान किसानों से बड़े-बड़े वादे किए गए, मगर अंत में हुआ क्या, सरकार ने किसानों के साथ वादाखिलाफी की। न तो किसानों का ऋण माफ हुआ, और न ही किसानों को अपनी उपज का लाभकारी मूल्य मिल सका है, भाजपा शासित तीनों राज्यों के किसानों का अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतरना पड़ा है।"

सिरोही आगे कहते हैं, "अब जब चुनाव फिर से सामने आ रहे हैं, तो सरकार नई-नई योजनाएं ला रही हैं, मगर अब किसान न सिर्फ जागरुक है, बल्कि एकजुट है, विधानसभा चुनाव में किसानों के लिए साथ छल को सरकार को जरूर भुगतना पड़ सकता है।"

क्यों गुस्से में हैं किसान, क्या हैं मुख्य मांगें?

  • स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए।
  • किसानों का पूर्ण कर्ज माफ किया जाए।
  • किसानों को उचित समर्थन मूल्य दिलाया जाए।
  • मंडी का भाव निर्धारित किया जाए।

मध्य प्रदेश में ऐसे बिगड़े हालात

  • जून 2017 में प्याज और दूध के उचित दाम किसानों को न मिलने पर सड़कों पर अपनी उपज फेंकने को मजबूर हुए 70 प्रतिशत से ज्यादा किसानों की आबादी वाले मध्य प्रदेश के किसान महाराष्ट्र के किसान आंदोलन का सर्मथन करते हुए मंदसौर में प्रदर्शन किया।
  • सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने न सिर्फ सड़कों पर प्याज और दूध फेंका, बल्कि मंडियों और दुकानों को बंद कर सरकार के खिलाफ धरना प्रदर्शन किया।
  • मंदसौर में किसान आंदोलन तब और उग्र हो गया जब मंडी में प्रदर्शन के लिए जा रहे किसानों पर पुलिस बल ने रोकने का प्रयास किया और किसानों पर फायरिंग कर दी। फायरिंग में 5 किसानों समेत 6 लोगों के मारे जाने पर किसानों के इस आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया।
  • किसानों ने कम से कम 12 ट्रकों और दुकानों पर तोड़फोड़ और आगजनी कर सरकार के खिलाफ हल्लाबोल दिया। रेलवे फाटक तोड़ दिए गए और गुस्साए किसानों ने रेलवे ट्रैक को भी उखाड़ दिया। कई किसान संगठनों के नेताओं ने राज्य की भाजपा सरकार की निंदा की और किसान विरोधी सरकार बताया। हालात बिगड़ने पर मध्य प्रदेश के मंदसौर, रतलाम, उज्जैन समेत कई इलाकों में इंटरनेट सेवा बंद करने के साथ कफ्र्यू लगा दिया गया।
  • लगभग दस दिनों तक चले इस हिंसक आंदोलन के बाद शिवराज सरकार ने प्याज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाया। इतना ही नहीं, मारे गए किसानों को मुआवजा देने का ऐलान करने के साथ किसान नेताओं के साथ बैठक कर उन्हें किसानों के हित में निर्णय लेने व मामले की पूरी जांच कराने का आश्वासन दिया।
  • इसके अलावा 2017 में देश भर में दिल्ली समेत कई अन्य राज्यों में हुए किसान आंदोलनों में मध्य प्रदेश के किसानों ने सरकार के खिलाफ हल्ला बोला। हाल में दिल्ली घेराव आंदोलन में भी मध्य प्रदेश के किसानों ने हरियाणा में सरकार के खिलाफ आवाज उठाई।

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इस तरह बिगड़ गया मध्य प्रदेश का गणित

मध्य प्रदेश में सीटों का गणित भाजपा के खिलाफ बदलता हुआ दिखाई दिया। विधानसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश में दो सीटों मुंगावली और कोलारस में उपचुनावों में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा और इन दोनों सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया। इससे पहले भी कांग्रेस ने साल 2017 में ही मध्य प्रदेश के अटेर और खजुराहों की सीटों पर बड़ी सफलता हासिल कर चार उपचुनाव जीत लिए। यह उपचुनाव बीते दस महीनों में ही राज्य में हुए।

मध्य प्रदेश के राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के प्रवक्ता भगवान सिंह मीना ने 'गाँव कनेक्शन' से फोन पर बातचीत में बताया, "मध्य प्रदेश और राजस्थान राज्य कृषि आधारित राज्य हैं, जिन किसानों ने उम्मीद के साथ भाजपा सरकार का साथ दिया था, वे वादे पूरे नहीं हुए। अंत में किसानों को भावांतर योजना के नाम पर भी ठगा जा रहा है। निश्चित रूप से यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार को न सिर्फ विधानसभा चुनाव में, बल्कि अगले साल लोकसभा चुनाव में किसानों के असंतोष का सामना करना पड़ेगा।"

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दूसरी ओर किसानों के सहयोग को लेकर पूरी तरह से आश्वास्त मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश संयोजक शिवराज सिंह डाबी फोन पर बातचीत में बताते हैं, "किसान हमारी पार्टी के साथ हैं। हमारी सरकार की ओर से किसानों को योजनाओं का लाभ मिला है।" आगे बताते हैं, "हमारी सरकार ने भावांतर योजना के जरिए प्रदेश के 4 लाख किसानों को फायदा पहुंचाया, इसके अलावा योजनाओं में किसान लाभार्थियों को रुपए सीधे खाते में भेजे गए। मुख्यमंत्री जी ने किसानों के लिए कई योजनाओं पर काम किया है, हमारी पार्टी का प्रयास है कि हम 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करें और किसानों को फसल का उचित दाम दिला सकें।"

राजस्थान में भी भड़के किसान

  • इसी माह फरवरी में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और पूर्ण कर्ज मुक्ति के लिए दिल्ली घेराव आंदोलन का समर्थन करते हुए जयपुर विधानसभा घेरने निकले राजस्थान के हजारों किसानों को न सिर्फ सुरक्षा बलों की लाठीचार्ज का सामना करना पड़ा, बल्कि कई सैकड़ों किसानों की गिरफ्तारी की गई। राजस्थान के 75 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले हजारों किसान इस आंदोलन में शामिल हुए।

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  • इससे पहले सितंबर माह में राजस्थान के सीकर में इन दो मुख्य मांगों समेत 11 सूत्रीय मांगों को लेकर कई किसान संगठनों के वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ 13 दिन तक महापड़ाव सभा कर सड़कों पर चक्का जाम कर दिया। सीकर समेत राज्य में करीब 150 से ज्यादा स्थानों पर किसानों ने जाम लगाया, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल रहीं।
  • बीते साल अक्टूबर में राजस्थान के ही नीदड़ क्षेत्र में किसानों ने जमीन अधिग्रहण किए जाने के विरोध में जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) के खिलाफ जमीन समाधि सत्याग्रह कर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। जेडीए को किसान अपनी जमीन नहीं देना चाहते थे। किसानों ने यहां एक हफ्ते से ज्यादा समय तक जमीन के अंदर समाधि ग्रहण की थी और किसान विरोधी सरकार का आरोप लगाया था।

चुनावों से पहले राजे सरकार को भी मिली हार

भाजपा से लोगों की नाराजगी का असर राजस्थान में दो लोकसभा और एक उपचुनाव में देखने को मिला, जहां भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने आखिरी बजट में किसानों के लिए 50 हजार रुपए तक का ऋण माफ करने की घोषणा की थी। इस चुनाव कांग्रेस को बड़ी जीत मिलने के बाद राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने कहा था, "मोदी जी काफी स्मार्ट हैं, वह जानते थे कि राजस्थान में भाजपा हार जाएगी, इसलिए प्रचार करने के लिए भी नहीं आए।"

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राजस्थान के नीदड़ में जमीन समाधि सत्याग्रह की अगुवाई करने वाले डॉ. नगेंद्र सिंह शेखावत फोन पर बताते हैं, "सिर्फ राजस्थान ही नहीं, अन्य राज्यों में भी किसानों की सरकार के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण है। अब विधानसभा चुनाव आ रहे हैं और किसान तय कर बैठे हैं। ऐसी स्थिति इसलिए बनी है क्योंकि किसानों के मुद्दे उठाकर जिस सरकार को किसानों ने सत्ता में काबिज किया है, वहीं सरकार अब योजनाओं के नाम पर किसानों के साथ छल कर रही है।"

शेखावत आगे बताते हैं, "किसानों को कुछ भी नहीं मिला है और अब किसान अपनी उपज को सड़कों पर फेंकने को मजबूर हैं, आंदोलन कर रहे हैं, और सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। ऐसे में किसान बिल्कुल इन राज्यों में भाजपा की जीत का गणित बिगाड़ सकती है।"

वहीं कृषि मामलों के जानकार रमनदीप सिंह मान कहते हैं, "किसानों के साथ सरकार ने वादे पूरे नहीं किए, वादे न पूरे होने पर किसानों में असंतोष और नाराजगी है और अब आंदोलन के जरिए पूरे देश में सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।" आगे कहते हैं, "किसानों को न सिर्फ और जागरुक, बल्कि एकजुट होने की जरुरत है, ताकि इन राज्यों में आने वाले विधानसभा चुनावों के समय नेताओं के लुभावने वादे उन्हें प्रभावित न कर सकें और किसी बहकावे में न आएं।"

छत्तीसगढ़ में जली किसान आंदोलन की लौ

'धान का कटोरा' कहलाने वाले छत्तीसगढ़ राज्य में करीब ढाई करोड़ आबादी में 35 लाख से ज्यादा किसानों की आबादी हैं। इसी साल फरवरी माह में छत्तीसगढ़ के हजारों किसानों ने कर्जमाफी, न्यूनतम समर्थन मूल्य और बोनस समेत कई मांगों को लेकर राजधानी रायपुर के राजभवन की ओर कूच किया। सरकार की वादाखिलाफी से भड़के किसानों को सुरक्षा बलों ने रोकने की कोशिश की तो नाराज किसानों ने वहीं बैठकर धरना प्रदर्शन और नारेबाजी शुरू कर दी। इतना ही नहीं, किसानों ने 22 जिलों में 30 से ज्यादा स्थानों पर चक्का जाम किया। वहीं, बीती 3 मार्च को ही कीमतों में भारी गिरावट के कारण छत्तीसगढ़ के किसान टमाटर की अपनी उपज को सड़कों पर फेंकने पर मजबूर हुए। इसके अलावा दिल्ली घेराव आंदोलन और जंतर-मंतर में किसान महासंसद में बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ के किसानों ने भाजपा सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ हल्ला बोला।

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क्या कर्नाटक में खिल सकेगा कमल?

दूसरी तरफ कर्नाटक में भले ही भाजपा अपनी सत्ता काबिज करने में नाकाम रही हो, मगर लोकसभा चुनाव में कर्नाटक की 28 सीटों में 17 सीटें जीतने वाली भाजपा इस विधानसभा चुनाव से पूरी उम्मीदें लगाई बैठी है। हालांकि कर्नाटक में इस विधानसभा चुनाव में जीतने का दावा कर रही भाजपा को भी इस राज्य के किसानों की नाराजगी का सामना करना पड़ा है। फसल बीमा समेत कई मुद्दों पर दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर दिल्ली घेराव आंदोलन समेत कई आंदोलनों में कर्नाटक के किसानों ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाई है। कर्नाटक के किसान 16 जून को किसान आंदोलन में बड़ी संख्या में शामिल होंगे। हाल में कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने टवीट कर कहा, "मोदी सरकार की किसान नीतियों को लेकर जो सवाल किए गए, वे असलियत को दर्शाते हैं।"

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क्या नरेन्द्र मोदी 2019 में हार भी सकते हैं ?

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