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ऐतिहासिक देसी कपास को वापस ला रहे हैं तमिलनाडु के किसान

प्राचीन समय में भारतीय उपमहाद्वीप को प्रसिद्धि दिलाने वाला शानदार मलमल एक छोटे स्टेपल स्वदेशी कपास से बुना जाता था। अफसोस की बात है कि वह कपास अब दुनिया से लुप्त हो गया है। लेकिन, तमिलनाडु में एक परियोजना के ज़रिए छोटे स्टेपल कपास की एक अन्य किस्म को पुनर्जीवित किया जा रहा है।

Pankaja SrinivasanPankaja Srinivasan   17 April 2021 12:15 PM GMT

ऐतिहासिक देसी कपास को वापस ला रहे हैं तमिलनाडु के किसान

डिंडीगुल जिला में करुनगन्नी किस्म के कपास के साथ महिला किसान। (फोटो-V Swaminathan)

कारिसालपट्टी (तमिलनाडु)। करिसालपट्टी में यह दोपहर का समय है। नीले आकाश के कुछ बिखरे हुए सफेद बादल एस विंसेंट जेवियर द्वारा पहने गए लुंगी पर बने चारखानों (चेक) से मेल खा रहे हैं। 33 वर्षीय किसान एस विंसेंट जेवियर अपने तीन एकड़ (1.2 हेक्टेयर) खेत का मुआयना कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने कपास की स्वदेशी और जैविक छोटी किस्म के करुनगन्नी की खेती की है। उनकी यह फसल तमिल नव वर्ष, जिसे पुथंडु भी कहते हैं के बाद कटाई के लिए तैयार हो जाएंगे।

डिंडीगुल बेल्ट में ज़ेवियर समेत 11 अन्य किसान 20 एकड़ (8.09 हेक्टेयर) जमीन पर करुनगन्नी किस्म के कपास की खेती कर रहे हैं। यहां विशिष्ट रूप से काली मिट्टी पाई जाती है, जो कि कपास की खेती के लिए एकदम सही मानी जाती है।

इस परियोजना की अगुवाई कर रहे वी स्वामीनाथन ने गांव कनेक्शन को बताया कि यह पुराने विश्व कपास मूल्य श्रृंखला को पुनर्जीवित करने के लिए किए जा रहे एक प्रयोग का हिस्सा है, जिसकी परिकल्पना गांधी जी ने की थी। इस पहल की शुरुआत साल 2015-16 में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के दक्षिण पश्चिम में लगभग 450 किलोमीटर दूर स्थित डिंडीगुल जिले में हुई थी।

स्वामीनाथन ऑर्गेनिक फ़ार्मिंग एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के कमेटी मेंबर भी हैं, जो कि देश भर में ऑर्गेनिक फ़ार्मिंग को बढ़ावा देता है। वे कहते हैं, "मैं इसमें आ रही दिक्कतों को दूर करने की कोशिश कर रहा हूं और साबित करना चाहता हूं कि कपास की देसी किस्म की खेती करना भी समझदारी है।"

एक छलपूर्ण इतिहास

पहले देसी शॉर्ट स्टेपल कॉटन की उपमहाद्वीप में हजारों वर्षों से बहुतायत में खेती हुआ करती थी। इससे बुने गए अच्छे मलमल को काव्यात्मक रूप से 'धुंध', 'हवा' और 'बहता हुआ पानी', इत्यादि के रूप में वर्णित किया जाता था, इसलिए वे हल्के और नाजुक माने गए। ये बांग्लादेश में मेघना और बुरिगंगा नदियों के किनारे उगने वाली फूटी कार्पस नामक कपास की एक शॉर्ट स्टेपल किस्म से बुने जाते थे। लेकिन, कुछ वर्षों में ही फूटी कार्पस को दुनिया ने भुला दिया।

ब्रिटश, तब तक लैंकाशिर और मैनचेस्टर में बड़ी मशीन-चालित मिलों में कपड़ा बुनना शुरू कर चुके थे। उन्होंने पाया कि देसी शॉर्ट स्टेपल इस उद्देश्य के लिए उपयुक्त नहीं है। इसके बाद उन्होंने भारतीय किसानों को पारंपरिक और स्वदेशी शॉर्ट स्टेपल किस्म की खेती को छोड़ने के लिए मजबूर किया, और इसके बजाय अधिक मशीन-अनुकूल लंबी स्टेपल वाले कपास की खेती के लिए कहा गया। इसे वे इंग्लैंड में उनके कपड़ा मिलों को भेज सकते थे।

शॉर्ट स्टेपल कपास को किया जा रहा पुनर्जीवित

देसी कपास की किस्म में से कुछ ही बची हैं, लेकिन देश में कुछ ऐसे स्थान हैं, जहां अभी भी इसकी खेती होती है। बांग्लादेश में प्रसिद्ध ढाका मलमल को पुनर्जीवित करने का प्रयास चल रहा है। इसी तरह भारत में भी शॉर्ट स्टेपल किस्म को वापस लाने की पहल की जा रही है।

तमिलनाडु में शॉर्ट स्टेपल किस्म को करुनगन्नी के नाम से जाना जाता है, जिसकी खेती यहां व्यापक तौर पर मदुरै, विरुधुनगर, तूतूकुड़ी, रामनाथपुरम और डिंडीगुल जिलों में की जाती थी, क्योंकि यहां खेती के लिए बारिश का पानी उपलब्ध होता था। इसके साथ ही यहां धनिया, चना और बाजरे की फसल भी उगाई जाती थी।

साल 2015 में, स्वामीनाथन ने स्वदेशी कपास आधारित मल्टी क्रॉपिंग सिस्टम को बढ़ावा देने के लिए डिंडीगुल जिले के वर्षा वाले इलाकों में किसानों के साथ काम करना शुरू किया। लगभग छह वर्षों बाद भी आज 34 वर्षीय स्वामीनाथन करुनगन्नी किस्म के कपास मिशन पर हैं। वे यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इसकी खेती, ओटाई, कताई और बुनाई का काम क्या एक भौगोलिक क्षेत्र में हो सकता है और क्या यह गाँधी जी के आत्मनिर्भर और मजबूत गाँव की अर्थव्यवस्था को लेकर देखे गए सपने को पूरा कर सकता है।

कपास की ऐतिहासिक किस्म को बचाने का प्रयास कर रहे हैं वी स्वामीनाथन। (फोटो- पंकजा श्रीनिवासन)

किसान जेवियर कहते हैं, "मैं पारंपरिक बीजों का इस्तेमाल करता हूं, मेरे पूर्वज भी इसी का इस्तेमाल करते थे।" इस वर्षा वाले इलाकों में सालों से करुनगन्नी की खेती की जाती रही है। उन्होंने आगे समझाया, "इसके रखरखाव में अधिक ध्यान नहीं देना पड़ता है और किसी तरह के कीटनाशकों की जरूरत भी नहीं होती है। इसकी खेती के लिए पंचकाव्य [प्राकृतिक उर्वरकों] और मौसमी बारिश पर्याप्त होते हैं।" इस किस्म के बीजों को हाइब्रिड कपास के विपरीत साल-दर-साल इस्तेमाल किया जा सकता है।

एक अन्य किसान आर गणेशन, जो कि दो एकड़ जमीन में कारुगन्नी की खेती करते हैं ने गाँव कनेक्शन को बताया, "हम इसमें विभिन्न फसलों की एक साथ खेती (बहु फसल) भी कर सकते हैं।"

गणेशन की दो एकड़ भूमि पर कपास के पौधों की साफ-सुथरी पंक्तियाँ हैं, जो अभी घुटने तक ऊँची हैं, इसमें पीले-पीले फूल लगे हुए हैं। उनमें से कुछ पर कपास की कलियों को भी देखा जा सकता है। इसमें बीच-बीच में हरे टमाटर, छोले और धनिया भी उगाया गया है। किसानों को इनसे अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें और उनके परिवारों को स्वस्थ, कीटनाशक रहित भोजन खाने को मिलता है।

यहां कपास के साथ अन्य फसलें भी बोई जाती हैं। धनिया की फसल 45 दिनों में तैयार हो जाती है, जबकि छोले 90 दिनों में तैयार हो जाते हैं। कपास को कटाई के लिए तैयार होने में 120 दिनों का समय लगता है। यह खाद्य फसलों के लिए मौसमी कैलेंडर है।

ज़ेवियर के खेत के बगल में उसके घर के पास उसकी माँ, भाई, भतीजा और एक पड़ोसी किसान एक नीले तिरपाल पर पैर फैलाकर बैठे हुए हैं। वे ताज़े कटे हुए छोले के एक टीले से मिट्टी को अलग कर रहे हैं। जेवियर की मां मासिलामानी ने गांव कनेक्शन को बताया, "हम कपास के साथ-साथ सब्जियां और दालें भी उगाते हैं। इससे हमें अतिरिक्त आय हो जाती है।" उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज भी ऐसा किया करते थे। उन्होंने कहा, "बारिश वाले क्षेत्रों में हमारी तरह कपास उगाने वाले किसान पारंपरिक तौर पर बहु-फसल कृषि करते हैं।"

कपास की फसल पककर तैयार है। (फाटो- वी स्वामीनाथन)

पूर्व औपनिवेशिक समय में कपास की खेती और बुनाई की प्रक्रिया में पूरा गांव शामिल होता था। लेकिन उपनिवेश काल के साथ, होमस्पून उद्योग पूरी तरह से नष्ट हो गया। ए फ्राइड हिस्ट्री, द जर्नी ऑफ कॉटन इन इंडिया नामक किताब मंू मीना मेनन और उज़्रम्मा ने भारतीय कपास की यात्रा के बारे में लिखा है।

स्वामीनाथन और उनकी किसानों की टीम दुनिया को यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि बुनियादी तरीकों की ओर लौटना किसानों, बुनकरों और पर्यावरण की भलाई सुनिश्चित करने का एक अच्छा तरीका हो सकता है। वे खेतों में एक भौगोलिक स्थान के अंतर्गत कपास की खेती करते हुए गांव की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। स्वामीनाथन याद करते हुए कहते हैं कि यह सोचने की बात है कि एक समय था जब गांव के ही लोग अपने हाथों से कताई और बुनाई की प्रक्रियाओं को पूरा करते थे और ढाका के मलमल जैसे कपड़ों का उत्पादन करते थे।

खेत से लेकर कपड़े तक

ज़ेवियर, गणेशन और अन्य किसान कपास की फसल की कटाई के बाद ओटाई के लिए इसे करिसालपट्टी से 10 किलोमीटर दूर डिंडीगुल शहर में भेजते हैं। वहां बीज को उनके लिंट (Lint) से अलग किया जाता है व इन बीजों को अगली बुवाई के लिए किसान अपने पास रख लेते हैं। इसके बाद कॉटन लिंट को गाँधीग्राम में एक पूर्व-कताई इकाई में भेज दिया जाता है, जो कि चेट्टियापट्टी में है, जहाँ बड़ी-बड़ी रंबलिंग मशीनों के ज़रिए कपास को अशुद्धियों से अलग किया जाता है और इसे रोविंग्स (Rovings) में बदल दिया जाता है। रोविंग्स फाइबर के बंडल होते हैं जिसे लिंट से निकाला जाता है। बाद में इससे सूत काता जाता है।

स्वामीनाथन ने समझाया, "रोविंग्स बनाना एक मुश्किल काम था। तमिलनाडु में बड़े कताई केंद्रों में मशीनरी केवल लंबे स्टेपल कॉटन लेने के लिए तैयार की गई है, और कोयम्बटूर में साउथ इंडियन टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन (SITRA) में बहुत परीक्षण और त्रुटियों के बाद पता चला कि यदि सही माप ली जाए तो गांधीग्राम सेंटर में भी करुनगन्नी से रोविंग्स निकाली जा सकती है।"

लगभग 20 किलोमीटर दूर धारुमाथुपट्टी गांव में 19 महिलाएं एक लंबे, हवादार हॉल में बैठती हैं। गांधीग्राम से रोविंग्स उन तक पहुंचते हैं, जिनका यहां अंबर चरखा (चरखा) पर सूत काता जाता है।

55 वर्षीय पी नालम्मा ने गांव कनेक्शन को बताया, "मैं 29 वर्षों से कताई कर रही हूं।" उनके बगल में 47 वर्षीय जी पापाथी बैठी हुई हैं। वे लगातार बिना रुके चरखे का पहिया घुमा रही हैं। उन्होंने बताया कि वे लोग नौ से पांच तक काम करते हैं।

विंसेंट जेवियर सहित कई किसान 20 एकड़ में इस पुरानी किस्म की कपास की खेती कर रहे हैं।

यह काफी मेहनत का काम है, लेकिन महिलाओं का कहना है कि अच्छी बात यह है कि वे यह काम घर बैठे कर सकते हैं। वे कहती हैं कि यह काम खेतों में मजदूरों के रूप में काम करने से अच्छा है। पापाथी ने बताया, "हम एक दिन में 150 से 200 रुपये तक कमा लेते हैं।" महिलाओं से भरे कमरे में 33 वर्षीय वेलुमुरुगन एकमात्र पुरुष हैं। वे अपनी मां अमरावती के पास बैठते हैं, जो कि थोड़ी-थोड़ी देर में झुककर चरखे को ठीक करती रहती हैं। वेलुमुरुगन दृष्टिबाधित हैं।

पापाथी और उनकी बहन द्वारा काते गए सूत को आखिरकार उन बुनकरों तक पहुँचाया दिया जाता है जो कि उन्हें करघे पर बुनते हैं।

लगभग 60 क्विंटल कच्चे कपास में से आठ हजार मीटर कपड़ा बुना जा सकता है। यह कच्चा माल डिंडीगुल के 12 किसानों से आता है। इसमें से कुछ केरल में कन्नूर में भेज दिया जाता है, जो कि अच्छे हथकरघा बुनाई तकनीक के लिए जाना जाता है।

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स्वामीनाथन कासकोम (KASKOM) के संस्थापक भी हैं, वे बताया, "हम कपड़े के साथ ही मूल्य वर्धित उत्पादों को बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जैसे- टेबल लिनन, तौलिए और धोती। कन्नूर के बुनकर इस काम में बहुत अच्छे हैं।" बुनाई के आधार पर, करुनगन्नी सूती कपड़े की कीमत 490 रुपये से 630 रुपये के बीच होती है।

इस बीच, पुथंडु (तमिल नव वर्ष) आ गया है और जेवियर की करुनगन्नी कपास की फसल भी तैयार हो चुकी है। अपने तीन एकड़ जमीन पर वे एक वर्ष में लगभग 12 क्विंटल कपास की खेती करते हैं। उन्होंने करुनगन्नी की खेती करना क्यों चुना, जबकि उनके जैसे कई लोग बीटी कपास की खेती करते हैं, यह पूछने पर जेवियर ने बताया, "यह सही है कि बीटी कपास में उपज अधिक होती है, लेकिन करुनगन्नी तुलनात्मक रुप से अधिक मजबूत है। इसकी जड़ें तीन फीट नीचे जाती हैं, जबकि बीटी कपास की जड़ केवल कोज़ी काल (मुर्गी का पैर) जितनी ही नीचे जाती है।"

जेवियर ने आगे कहा, "मैं यहां अपने और अपने परिवार के उपभोग के लिए फसलें उगाता हूँ, इसलिए कभी भी अपनी जमीन पर कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करूँगा। मेरे पूर्वजों ने कभी रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया। कपास उगाने के लिए हमें बीज, बारिश और काली मिट्टी की जरूरत थी, जो हमारे पास उपलब्ध है।"

इस खबर को अंग्रेजी में यहां पढ़ें-

अनुवाद- शुभम ठाकुर

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