जहां बीटी कॉटन फेल, पारंपरिक कपास हुई पास

जहां बीटी कॉटन फेल, पारंपरिक कपास हुई पासकपास की खेती।

तमिलनाडु के पेरंबलूर जिले में किसानों के एक समूह ने बीटी कॉटन की नाकामी के बाद विकल्प के रूप में कपास की एक स्थानीय किस्म ‘करुनगन्नी‘ की खेती फिर से शुरू कर दी है। पेरंबलूर कपास उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वहां के किसान पारंपरिक किस्मों की जगह सिर्फ बीटी कॉटन ही उगा रहे थे।

हाल ही में बीटी कॉटन की फसलें जिस तरह से बर्बाद हुई हैं उसे देखकर करुनगन्नी कपास उत्पादक समूह नामके इस ग्रुप ने फिर से उन किस्मों को उगाना शुरू कर दिया जिन्हें किसान भूल चुके थे।

बीटी कॉटन हुई बर्बाद

बीटी कॉटन कपास की जैविक स्तर पर परिवर्धित किस्म या जिनेटिकली मॉडिफाइड फसल है। मतलब बीमारियों और कीटों से बचने के लिए इसके आनुवंशिक गुणों में फेरबदल की गई है। इसे डिवेलप करने वाली कंपनी ने दावा किया था कि बीटी कपास कीटों के हमलों से बेअसर रहेगी और नतीजे में किसानों को कीटनाशकों पर कम खर्च करना होगा। बहरहाल, हुआ इसका उलटा।

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बीटी कॉटन की फसलें पिंक बॉलवर्म का हमला नहीं रोक पाई। इसकी वजह से देश के सबसे बड़े उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में आधी फसलें बर्बाद हो गईं। मध्यप्रदेश, तेलंगाना, आंध्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और गुजरात में भी बड़े पैमाने पर नुकासन हुए। कुछ जगह तो किसान एक किलो भी कपास नहीं उपजा पाए। कीटनाशकों के व्यापक इस्तेमाल से सैकड़ों किसान बीमार भी हुए।

करुनगन्नी बेहतर विकल्प

इन सभी समस्याओं का समाधान खोजने की जुगत में पेरंबलूर जिले के लगभग 30 किसानों ने करुनगन्नी कपास उत्पादक समूह बनाया और जिले भर में 40 एकड़ में करुनगन्नी की जैविक खेती की। इन किसानों ने रासायनिक खादों और कीटनाशकों की जगह जैविक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल किया। अभी तक नतीजे भी अच्छे रहे हैं।

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करुनगन्नी से भी बीटी कॉटन जितनी ही उपज मिल रही है, वहीं यह बीटी कॉटन को बर्बाद करने वाले पिंक वॉलवर्म के हमले से भी सुरक्षित रहती है। करुनगन्नी सूखे का सामना करने में सक्षम है साथ ही स्थानीय मौसम के अनुकूल भी है। लेकिन सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसान इसी उपज से अगले साल की बुवाई के लिए बीज भी बचा लेते हैं, जबकि बीटी कॉटन उगाने के लिए किसानों को हर सीजन में महंगे बीज खरीदने पड़ते थे।

जीएम फसलों से परेशानियां बढ़ीं

जीएम फसलों की शुरूआत के समय दावे किए गए थे कि ये फसलों पर कीटों के हमलों को रोकेंगी लेकिन कृषि विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं। देश के जानेमाने कृषि विशेषज्ञ एवं विचारक डॉ. देविंदर शर्मा बताते हैं, एक वरिष्ठ ने एक बार मुझसे कहा था कि 1960 के दशक की शुरूआत में कीटों की केवल छह से सात किस्में ही कपास उत्पादक किसानों को परेशान करती थीं लेकिन आज किसान 70 प्रमुख कीटों से संघर्ष कर रहा है। कीटों का हमला जितना ज्यादा होगा घातक रसायनों का इस्तेमाल उतना ही ज्यादा होगा। मसलन बीटी कॉटन जारी होने के महज चार साल बाद ही इस पर कीटों का हमला शुरू हो गया।

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