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बजट 2020 : किसान और कृषि उद्यमी बोले, बजट में एफपीओ पर जोर दे सरकार

एक ऐसे देश में जहां की कृषि अर्थव्यवस्था ज्यादातर छोटे और सीमांत किसान पर टिकी है, क्या सरकार फरवरी में आने वाले बजट में किसान उत्पादक संगठन यानी एफपीओ को बढ़ाने पर जोर देगी ?

Kushal MishraKushal Mishra   27 Jan 2020 10:14 AM GMT

बजट 2020 : किसान और कृषि उद्यमी बोले, बजट में एफपीओ पर जोर दे सरकार

"पहले किसान समूह में खेती करता था तो उसको फायदा मिलता था, मगर आज ज्यादातर किसान छोटी जोत का है और अकेला है, ऐसे में एफपीओ के जरिए किसानों को फिर से समूह में अपनी उपज बेचने का मौका मिलता है। हम जैसे छोटे किसान और पशुपालक मंडी में दूध बेचने की बजाए एफपीओ को दे रहे हैं, वो उसका प्रोसेस करते हैं और हमको अच्छी कीमत भी मिलती है, बजट में सरकार को एफपीओ पर जोर देना चाहिए," हरियाणा के हिसार जिले की तहसील बास के खांडा खेरी गांव के छोटे किसान और पशुपालक विक्रम संधू कहते हैं।

एफपीओ यानी किसान उत्पादक संगठन, असल में किसानों का एक ऐसा समूह है, जो वास्तव में कृषि उत्पादन कार्य में लगा हो और कृषि व्यावसायिक गतिविधियां चलाने में एक जैसी धारणा रखते हों, एक गांव या फिर कई गांवों के किसान मिलकर भी यह समूह बना सकते हैं। सरकार ने पिछले बजट में देश में ऐसे ही 10,000 एफपीओ अगले पांच सालों में खोलने की घोषणा की थी।

देश के छोटे और सीमांत किसानों की आय दोगुनी करने के लिए केंद्र सरकार एफपीओ को बढ़ावा देने के लिए नाबार्ड, लघु कृषक कृषि व्यापार संघ (एसएफएसी) और सहकारी समितियों के साथ मिलकर काम कर रही है। अब तक नाबार्ड ने 2154 किसान उत्पादक संगठन यानी एफपीओ को बढ़ावा दिया है, वहीं एसएफएसी की ओर से ऐसे 822 एफपीओ को बढ़ावा दिया गया है।

ऐसे में एक ऐसे देश में जहां की कृषि अर्थव्यवस्था ज्यादातर छोटे और सीमांत किसान पर टिकी है, क्या सरकार फरवरी में आने वाले बजट में एफपीओ को बढ़ाने पर जोर देगी? 'गांव कनेक्शन' ने कई राज्यों में एफपीओ संचालकों और किसानों से बात करने की कोशिश की और जानना चाहा कि आने वाले बजट में सरकार से उनकी क्या उम्मीदे हैं।


हरियाणा के किसान विक्रम संधू जिस एफपीओ को अपनी भैंसों का दूध बेचते हैं, उस एफपीओ का नाम शक्ति वर्धक मिल्क प्रोड्यूसर है जिसकी शुरुआत डॉ. विनोद बेनीवाल ने वर्ष 2016 में हिसार जिले से शुरू किया। इस एफपीओ से अब तक 20,000 से ज्यादा पशुपालक जुड़ चुके हैं और वर्ष 2018 में हरियाणा सरकार ने राज्य की सर्वश्रेष्ठ एफपीओ के अवार्ड से इस एफपीओ को पुरस्कृत किया।

इस एफपीओ के प्रमुख डॉ. विनोद बेनीवाल बताते हैं, "हमने शुरुआत से अपने साथ जुड़ने वाले हर पशुपालक को पशुओं को पालने के लिए विभाग से प्रशिक्षण दिलाया। उन्हें बताया कि कैसे अपने पशुओं का ध्यान रखें, कैसे उनका उपचार करें, उन्हें क्या खिलाएं ताकि उन्हें पशुओं से ज्यादा दुग्ध उत्पादन मिले।"

डॉ. विनोद कहते हैं, "यही कारण है कि ज्यादा किसानों के जुड़ने से पहले ही साल हमारा वार्षिक कारोबार 39 लाख रुपए पहुंच गया। किसान उत्पादक संगठन के तौर पर कम समय में इतनी उपलब्धि हासिल करने के लिए नाबार्ड ने भी हमें दो बार उत्कृष्ट सहभागिता पुरस्कार से भी नवाजा। इसलिए जरूरत है कि सरकार छोटे और सीमांत किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए एफपीओ को लेकर बजट बढ़ाए।"

हरियाणा जैसे हालात मध्य प्रदेश में नहीं

मगर हरियाणा जैसे हालात मध्य प्रदेश में नहीं हैं। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले की तहसील नटेरन के सिलवाह खजूरी गांव में गोपाल सिंह रघुवंशी पमरिया दलहन नाम से एफपीओ चला रहे हैं और चना, सोयाबीन और गेहूं के किसानों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

गोपाल सिंह 'गांव कनेक्शन' से बताते हैं, "अभी हमारी एफपीओ से छोटे और सीमांत किसानों को ज्यादा फायदा नहीं मिल रहा है। अब तक किसानों को एफपीओ से बीज और क्रेडिट कार्ड ही उपलब्ध करा पाएं हैं, जिससे थोड़ा बहुत ही फायदा किसानों को मिला है, लेकिन ज्यादा नहीं। हमें सरकार से कोई आर्थिक मदद भी नहीं मिली।"

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गोपाल कहते हैं, "कम से कम करीब 4900 किसान हमसे जुड़े हैं और अपने एफपीओ से सात एफपीओ और भी जुड़े हैं, जिनसे मिलकर एक कंपनी तैयार हुई। मगर अभी स्थिति अच्छी नहीं है क्योंकि किसानों के पास पैसा नहीं है। हमारे विदिशा जिले में एफपीओ को लेकर फिलहाल यही हाल है, बिना शासन की मदद के बिना किसानों को फायदा नहीं मिलेगा। हमें उम्मीद है कि बजट में सरकार एफपीओ को बेहतर बनाने के लिए कदम उठाएगी।"

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के बक्स्वाहा गांव में पांच एकड़ जमीन पर सब्जियां उगाने वाले किसान राजीव कुमार बताते हैं, "अभी हमारे जिले में ऐसी कोई एफपीओ नहीं है। हमारे गांव में ज्यादातर छोटे और सीमांत किसान ही हैं जो फिलहाल समूह में ही मंडी में जाकर अपनी उपज बेचते हैं। किसान को तो सब्जियां जल्द ही बेचनी पड़ती है, तो उतनी कीमत नहीं मिलती, मगर ऐसी एफपीओ हो तो जरूर हमें फायदा मिलेगा।"

पिछले बजट में 10 हजार एफपीओ खोलने की घोषणा

किसान उत्पादक संगठन के जरिए सरकार किसानों के कृषि उत्पादों की पैकेजिंग, ब्रांडिंग, मानकीकरण और मार्केटिंग, कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग करके नया उत्पाद बनाने और बेचने के साथ किसानों की आय दोगुनी करने का प्रयास कर रही है। सरकार की ओर से किसानों की उपज के साथ डेयरी, दुग्ध उत्पादन, रेशम कीट पालन, मधुमक्खी पालन, मुर्गीपालन समेत अन्य कृषि आधारित व्यवसाय किए जाने का फैसला लिया गया। ऐसे में सरकार ने पिछले बजट में अगले पांच सालों में देश में 10 हजार एफपीओ खोलने की घोषणा की।

हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की कसौली तहसील के गदियार गांव के रहने वाले राजिंदर कुमार कौशल वर्ष 2016 से बनासर किसान समृद्धि नाम से एफपीओ चलाते हैं और क्षेत्र में टमाटर और अदरक के किसानों के साथ काम करते हैं। राजिंदर के एफपीओ से 350 किसान जुड़े हैं और उनमें 80 प्रतिशत सीमांत किसान हैं। उनका लक्ष्य है कि जल्द ही 1000 किसानों को एफपीओ से जोड़ें।

राजिंदर कुमार 'गांव कनेक्शन' से बताते हैं, "असल में छोटे किसानों को समझाना बहुत मुश्किल होता है इसलिए हम किसानों को समय-समय पर कृषि विशेषज्ञों से प्रशिक्षण भी दिलाते हैं, यहां ज्यादातर किसान टमाटर उगाते हैं तो जल्द ही एफपीओ में प्रोसेसिंग यूनिट भी लगाने जा रहे हैं, ताकि छोटे टमाटरों की प्रोसेसिंग करें और ब्रांड बनाकर बेचें जिससे किसानों को ही फायदा मिलेगा।"

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राजिंदर कहते हैं, "हम किसानों को यही समझाते हैं कि बाजार में जो मांग हो उसी के अनुसार तैयारी करें तो ज्यादा पैसा कमाएंगे। हमारी कोशिश जारी है। आज देश में छोटे और सीमांत किसानों के लिए एफपीओ की बहुत सख्त जरूरत है। इसलिए 10 हजार नहीं, बल्कि एक लाख एफपीओ खोलने का लक्ष्य तय किया जाए। बस इतनी सरकार से गुजारिश है कि सरकार एफपीओ के लिए सरकार की जो कागजी कार्यवाही है, उसे आसान बनाया जाए क्योंकि एक किसान के लिए बहुत मुश्किल होता है।"

इसी एफपीओ से जुड़े कसौली तहसील के धरमपुरवा गांव में रहने वाले और अपने एक एकड़ खेत में टमाटर, शिमला मिर्च और अदरक उगाने वाले वीरेंद्र कुमार बताते हैं, "अभी हम अपनी उपज एफपीओ को बेच रहे हैं, मगर अभी ज्यादा किसान नहीं जुड़ रहे हैं। जो जागरूक हैं वो आगे आ रहे हैं। जब ज्यादा किसान जुड़ेंगे तो किसानों को और भी फायदा होगा। सरकार को जरूर एफपीओ को बढ़ावा देना चाहिए।"

देश में बढ़ी छोटे और सीमांत किसानों की आबादी


कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार देश में छोटे और सीमांत किसानों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2010-11 के आंकड़ों के अनुसार देश के कुल किसानों में छोटे और सीमांत किसानों का 84.9 प्रतिशत था, जो वर्ष 2015-16 में 86.2 प्रतिशत हो गया। ऐसे में ऐसे किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए सरकार को बड़ा बाजार उपलब्ध कराने के साथ किसानों की आय को बढ़ाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा।

बिहार के पूर्वी चंपारण के ब्लॉक पहाड़पुर के रघुनाथपुर गांव के रहने वाले जयशिव कुमार तिवारी वर्ष 2017 से अत्युत्तम एग्रो प्रोड्यूसर कंपनी चला रहे हैं और चावल, गेहूं, मक्का, हल्दी, मसूर जैसी फसलों के किसानों के साथ काम कर रहे हैं। इस एफपीओ से अब तक आस-पास के गांव के करीब 850 किसान जुड़े हुए हैं।

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जयशिव कुमार तिवारी बताते हैं, "एफपीओ के लिए सरकार से मदद मिली तो आज किसानों को फायदा भी मिल रहा है। पहले किसान गांव की दुकान से ही खेती का सारा सामान लेते थे, वो महंगा भी था तो हमने सबसे पहले एफपीओ से किसानों को डीलरों से मंगा कर धान, गेहूं, मक्का जैसी फसलों के गुणवत्तापरक बीजों को सही दाम में उपलब्ध कराया। उससे किसानों को फायदा मिला। उसके बाद हमने किसानों की उपज को बिचौलियों से बचाकर बाहर बेचने की तैयारी की। इससे किसानों को अब सही कीमत मिलने लगी है।"

इसी एफपीओ से जुड़े पहाड़पुर ब्लॉक के ही बलवा पंचायत के रहने वाले किसान मणि प्रसाद एक एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। वह बताते हैं, "एफपीओ से आज हमें अपनी उपज की अच्छी कीमत मिलने लगी है। एक-दो बार हम लोगों को खेती के लिए प्रशिक्षण भी दिया गया है, हमें बताया गया कि कौन-कौन सी फसल उगाएं। आज हम और हमारे क्षेत्र के किसान धान, मक्का, गेहूं, आलू, गोभी, लहसुन सब उगा रहे हैं। हम चाहते हैं कि सरकार बजट में एफपीओ को बढ़ावा दे।"

'महाराष्ट्र में सरकार से अब तक कोई सहयोग नहीं'

मगर बिहार से महाराष्ट्र के हालात बिल्कुल विपरीत हैं। महाराष्ट्र के लातुर जिले के तालुका औसा के अलमाला पोस्ट के रहने वाले विश्वनाथ रामराव गोडके की नागराज एग्री एंड फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी है। विश्वनाथ की एफपीओ सोयाबीन, चना और तूर उगाने वाले किसानों के साथ काम करती है।

विश्वनाथ 'गांव कनेक्शन' से बताते हैं, "जब हमने पांच साल पहले एफपीओ खोला तभी सरकार ने हमारी मदद की थी, मगर उसके बाद से सरकार का कोई सहयोग नहीं मिला। आज हमारे साथ करीब 1000 किसान जुड़े हैं, इनमें करीब 700 किसान छोटे और सीमांत हैं। अभी तो महाराष्ट्र के किसानों को बारिश से भी काफी नुकसान हुआ, साथ ही सरकार बदलने के बाद से अब तक कोई सहयोग भी हमें नहीं मिला है।"

विश्वनाथ कहते हैं, "हमारे एफपीओ में फूड प्रोसेसिंग यूनिट भी है, मगर इतना बजट नहीं है तो अभी बंद पड़ी है। सरकार को नियमित रूप से एफपीओ को काम देना चाहिए, बाजार उपलब्ध कराना चाहिए ताकि किसानों को फायदा मिले। हमें उम्मीद है कि सरकार इस बजट में देश में चल रहे एफपीओ के लिए पहल करेगी।"

महाराष्ट्र के लातूर जिले के अल्मोरा गांव के किसान महारुद्र लोहारे छह एकड़ खेती में सोयाबीन और चने की खेती करते हैं। महारुद्र बताते हैं, "पहले उपज बेचने में ज्यादा दाम नहीं मिलता था, मगर एफपीओ से जुड़ने पर उपज बेची तो अच्छी कीमत मिली, मगर अभी ज्यादा किसान नहीं है। बहुत कम ही किसान जुड़े हैं। एफपीओ में फूड प्रोसेसिंग शुरू होनी है तो और फायदा मिलेगा।"

दूसरी ओर सिक्किम देश का पहला ऐसा राज्य बना है, जहां करीब 75 हजार हेक्टेयर में सभी किसान जैविक खेती कर रहे हैं। इस राज्य के किसानों ने पूरी तरह से जैविक खेती को अपनाकर कृषि को नया आयाम दिया है। मगर एफपीओ को लेकर प्रशासन की तरफ धीमी रफ्तार से परेशान नजर आते हैं।

सिक्किम के पूर्वी क्षेत्र में अपर समडोंग में रकडोंग टिनटेक नाम से किसान उत्पादक संगठन के गोविंद नियोपैनी बड़ी इलायची, अदरक, हल्दी और बक गेहूं उगाने वाले किसानों के साथ काम कर रहे हैं। इनकी एफपीओ से करीब 850 किसान जुड़े हैं और इनमें से करीब 350 छोटे और सीमांत किसान हैं।

'अभी उतना नहीं मिल रहा जैविक उत्पादों का लाभ'

गोविंद नियोपैनी 'गांव कनेक्शन' से बताते हैं, "हमारे सभी कृषि उत्पाद जैविक हैं, मगर जैविक उत्पाद का अभी फायदा हमें जैसा मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल पा रहा है। राज्य में 28 एफपीओ हैं, मगर किसी में प्रोसेसिंग प्लांट नहीं लग पाया है। जबकि वर्ष 2020 तक 14 एफपीओ और खोले जाएंगे।"

नियोपैनी कहते हैं, "जरूरत है कि प्रोसेसिंग प्लांट से नए उत्पाद बनाकर बेचें जिससे सभी किसानों को ज्यादा मुनाफा मिले। अभी तो हम अदरक और बक गेहूं उगाने वाले किसानों से ही उनकी उपज बाचार में बेच रहे हैं। विभागों की ओर से बहुत धीरे गति से काम चल रहा है, अगर शासन स्तर पर बेहतर तरीके से काम हो और देखरेख हो तो निश्चित रूप से एफपीओ को बढ़ावा मिलेगा और सभी किसान इसका फायदा उठा पाएंगे।"

सिक्किम की तरह असम में भी एफपीओ संचालक सरकार के रुखे रवैये से परेशान हैं। असम के मरीगांव जिले के अमलीघाट के सिंधीसार गांव में अमलीघाट बनाना फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी के अपूर्ब भगाबति केले के किसानों के साथ काम कर रहे हैं।

अपूर्ब भगाबति 'गांव कनेक्शन' से बताते हैं, "एफपीओ को बढ़ावा देने के लिए अभी तक हमें सरकार से कोई ग्रांट नहीं मिली, मगर हम कोशिश कर रहे हैं कि किसानों को एफपीओ से फायदा मिले। फिलहाल अभी हमारे साथ कुल 1600 किसान जुड़े हैं जिनमें 500 छोटे किसान हैं। राज्य में किसानों को प्रशिक्षण देने के लिए कोई अच्छा प्रशिक्षणकर्ता भी नहीं है, हमारी कोशिश है कि किसानों को प्रशिक्षण मिले। हम यह भी कोशिश कर रहे हैं कि जल्द ही ग्रेडिंग का भी यूनिट लगाएं जिससे किसानों को फायदा मिले। सरकार को बजट में एफपीओ को बढ़ावा देना चाहिए मगर जमीनी स्तर पर काम के देखरेख की भी बहुत जरूरत है।"

'अभी हमें प्रोसेसिंग यूनिट की जरूरत है'


राजस्थान राज्य में भी एफपीओ के जरिए किसानों को मदद मिल रही है। राजस्थान के अलवर जिले के बहरोर तहसील में बर्डोद गांव में रहने वाले श्याम सिंह टमाटर, गोभी, मिर्च और भिंडी के किसानों के साथ मिलकर बर्डोद बंसूर एग्रो वेज नाम से किसान उत्पादक संगठन चला रहे हैं। श्याम सिंह के अनुसार, उनकी एफपीओ से कुल 1013 किसान जुड़े हैं और सभी छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास 02 से 05 बीघा तक जमीन है।

श्याम सिंह 'गांव कनेक्शन' से बताते हैं, "अभी हम किसानों को अच्छे बीज दिला रहे हैं और विभाग के साथ मिलकर प्रशिक्षण भी दिलाया जा रहा है। हमारी इंडिया मार्ट, जूमैटो, किसान यार्ड जैसी कंपनियों से टाइअप करने का प्रयास कर रहे हैं कि वे हमसे बड़े स्तर पर उपज खरीदें। अभी हमें जरूरत है प्रोसेसिंग यूनिट की, उसके लिए कोशिश कर रहे हैं। प्रोसेसिंग यूनिट लगने के बाद हम किसानों को ज्यादा फायदा पहुंचा पाएंगे।"

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श्याम सिंह कहते हैं, "सरकार को बजट में देश में एफपीओ को बढ़ावा देने के लिए बड़ी राशि देनी चाहिए। इसके अलावा जो एफपीओ चल रहे हैं उनको बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ जोड़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए जिससे एफपीओ को बढ़ावा मिले। एफपीओ को बढ़ावा मिलेगा तो निश्चित रूप से किसान को अच्छी कीमत मिलेगी।"

राजस्थान के नागौर जिले की डीडवाना तहसील के बाओरी गांव के किसान बजरंगलाल जट अपने छह बीघा खेत में सब्जियां उगाते हैं। बजरंगलाल बताते हैं, "हमारे क्षेत्र में सभी किसान सब्जियां उगाते हैं, मैं भी मेंथी, टमाटर, टिंडा जैसी सब्जियां उगाता हूं। मगर कई बार कीमत नहीं मिलती क्योंकि जब सब किसान सब्जियां उगाते हैं तो बाजार में अपने आप कीमत कम हो जाती है। अगर ऐसी एफपीओ हमारे नागौर जिले में बने तो हम जैसे छोटे किसानों को जरूर बहुत लाभ मिलेगा।"

उत्तर प्रदेश में सीएम योगी ने की पहल

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जहां कुल किसानों की संख्या में 90 प्रतिशत से ज्यादा छोटे और सीमांत किसान हैं, वहां दिसंबर में राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के कृषक उत्पादक संगठनों के साथ सम्मेलन में हिस्सा लिया। इस बीच मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने कहा कि आज लघु और सीमांत किसानों के लिए एफपीओ एक बड़ी जरूरत बन चुकी है और किसानों की आय दोगुनी में इनकी बड़ी भूमिका हो सकती है। ऐसे में जरूरत है कि कृषि उत्पादों की मूल्य श्रृंखला और आमदनी में बढ़ोत्तरी के लिए किसानों की भागीदारी बढ़ाई जाए।

सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने कहा कि किसानों की आय दोगुनी करने के लिए उत्तर प्रदेश में 60 हजार एफपीओ बनाए जाएंगे और हर विकास खंड में कम से कम एक एफपीओ को एक मॉडल के रूप में विकसित करेंगे। सरकार एफपीओ में हर जरूरी सुविधा मुहैया कराएगी ताकि किसानों की उपज की ब्रांडिंग हो, बाजार मिले और अच्छी कीमत मिलने से किसानों की आय बढ़े।

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में महरौनी के पास खिरियालटकंजू गांव के रहने वाले बलराम तिवारी महरौनी नाम से एफपीओ चला रहे हैं और चना, मटर और दाल के किसानों के साथ काम कर रहे हैं।

बलराम तिवारी बताते हैं, "अभी हमारी एफपीओ के साथ क्षेत्र के 1000 किसान जुड़े हैं, हम हर महीने बैठक करते हैं ताकि और भी किसानों को जोड़ें। अभी तो हम किसानों से उनकी उपज लेकर सीधे बाजार में बेच रहे हैं मगर जुलाई से हमारी कोशिश है कि हम हम ग्रेडिंग और पैकेजिंग करें। साथ ही किसानों को अच्छे बीज, खाद उपलब्ध करा पा रहे हैं। ऐसे में किसानों को ही फायदा मिल रहा है। हम चाहते हैं कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार और भी एफपीओ खोले।"

'जम्मू में 80 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान उठाएंगे फायदा'

वहीं जम्मू-कश्मीर के किसानों के लिए भी लघु कृषक कृषि व्यापार संघ की ओर से जम्मू में जम्मू ओरियंटल फ्रेश नाम से एफपीओ पर काम चल रहा है। इसके अलावा श्रीनगर में कश्मीर किसान के नाम से एफपीओ शुरू करने पर काम जारी है। ये दोनों एफपीओ क्षेत्र के मूली, शलजम, नोल खोल, फूल गोभी, पत्ता गोभी, टमाटर, मटर, बीन्स, ककड़ी, बैंगन, मिर्च, पालक, लहसुन, आलू के उत्पादक किसानों के साथ काम कर रही हैं। जम्मू में एफपीओ में 2000 टन के कोल्ड स्टोरेज की सुविधा के साथ 10 कलेक्शन सेंटर और 06 रेफ्रिजिरेटर गाड़ियों समेत कई सुविधाएं किसानों को मिलेंगी।

जम्मू-कश्मीर में लघु कृषक कृषि व्यापार संघ के साथ काम कर रहे और एसीटेक सूचना प्रणाली लिमिटेड के परियोजना निदेशक अरविंद पचोरी 'गांव कनेक्शन' से बताते हैं, "जम्मू में एफपीओ से अब तक 11 हजार किसान जुड़ चुके हैं और अगले दो-तीन महीने में यह एफपीओ पूरी तरह से शुरू हो जाएगा जिसका फायदा 80 प्रतिशत से ज्यादा छोटे और सीमांत किसान उठा पाएंगे।"

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अरविंद बताते हैं, "फिलहाल इस एफपीओ से अभी किसानों को बीज और खेती से जुड़े उत्पाद दिए जा रहे हैं, साथ ही किसानों को बेहतर प्रशिक्षण के साथ क्रॉप कैलेंडर के बारे में बताया जा रहा है। किसानों की उपज अभी पैकेजिंग करके सरकारी सोसाइटी में बेची जा रही है जहां से किसानों को अच्छी कीमत मिल रही है। पूरी तरह से एफपीओ शुरू होने पर किसानों को और भी ज्यादा फायदा हो सकेगा।"


फरवरी में आने वाले बजट में एफपीओ को बढ़ावा दिए जाने के सवाल पर अरविंद पचौरी कहते हैं, "एफपीओ ज्यादा संख्या में खोले जाने की बजाए उसकी गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाना ज्यादा जरूरी है। कुछ राज्यों में एफपीओ बंद भी हुए हैं क्योंकि उनको काम नहीं मिल रहा है, बाजार नहीं मिल रहा। फायदा उनको मिल रहा है जो कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग कर पा रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि जमीनी स्तर पर एफपीओ और किसानों को सुविधाएं मिलें तो छोटे और सीमांत किसानों की स्थिति निश्चित रूप से सुधरेगी।"

'कई किसान एफपीओ के लिए दिखे इच्छुक'

हालांकि अलग-अलग राज्यों में बातचीत में कई किसान ऐसे एफपीओ के बारे में जानने के लिए इच्छुक रहे और सरकार की ओर से बजट में देश में ऐसे एफपीओ को बढ़ावा देने की बात कही।

इस बारे में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में नाबार्ड के जिला विकास प्रबंधक शैलेंद्र सिंह चौहान 'गांव कनेक्शन' से बताते हैं, "अगर कोई किसान एफपीओ खोलना चाहता है तो कम से कम 11 लोग मिलकर एक एफपीओ शुरू कर सकते हैं। जो भी एफपीओ बनाना चाहता है, बना सकता है। इसमें कंपनी अधिनियम या राज्य सरकार की कोऑपरेटिव सोसाइटी अधिनियम के तहत एफपीओ का पंजीकरण करा सकते हैं। नाबार्ड के अलावा एसएफएसी, कृषि से जुड़ी कई शासकीय निकाय भी एफपीओ बनाती है और उसी के अनुसार एफपीओ को अनुदान दिया जाता है।"

शैलेंद्र सिंह बताते हैं, "एफपीओ के लिए नाबार्ड में अलग से फंड बनाया गया है। नाबार्ड की ओर से एक एफपीओ को तीन साल में 11.44 लाख रुपए का अनुदान दिया जाता है। इसमें एफपीओ को इनपुट लाइसेंट, मंडी लाइसेंस, एफएसीसीआई जैसे लाइसेंस दिलवाए जाते हैं। इसके अलावा एफपीओ के किसानों को तकनीकी मदद, सस्ता खाद-बीज और दवाई उपलब्ध कराई जाती है ताकि खेती की लागत कम होने के साथ किसानों का मुनाफा बढ़े। अभी देश में 10 हजार एफपीओ बनाए जाने हैं और इसमें सरकार का मुख्य लक्ष्य है कि कृषि से जुड़ी सभी योजनाओं को एफपीओ में शामिल कर किसानों को लाभ पहुंचाया जाए।"



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