पति के मरने के बाद भी नहीं मानी हार, पहले फौजी फिर बनीं ब्यूटी क्वीन

पति के मरने के बाद भी नहीं मानी हार, पहले फौजी फिर बनीं ब्यूटी क्वीनकर्नल पद से वीआरएस लेने के बाद शुरू किया रैम्प का सफर

लखनऊ। एक महिला जिसकी मेजर से शादी हुई, फिर एक बेटा हुआ, बाकी परिवारों की तरह इनकी भी ज़िन्दगी खुशहाल थी। लेकिन, एक दिन जब उनके घर जौनपुर में मेजर की पत्नी को पता चला कि उनका पति देश के लिए आतंकियों से लड़ता हुआ कश्मीर में शहीद हो गया। हमले में मेजर अविनाश सिंह बहादुरी से लड़े और उन्होंने 5 आतंकियों को मार गिराया। इस घटना ने शालिनी कि ज़िन्दगी जीने का मक़सद खत्म दिया था।

पति केे मरने के बाद उन्हें कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। लेकिन, पति की मौत के बाद सिर्फ एक सम्मान चक्र के सहारे जीना संभव नहीं था। किसी भी महिला के लिए शायद इससे बुरा वक्त और कुछ नहीं हो सकता लेकिन मेजर की पत्नी शालिनी सिंह बाकी महिलाओं से भिन्न थीं।

उनकी सोच कुछ और ही थी उनके अन्दर कुछ अलग करने का जज़्बा था इसीलिए वह अपने पति की मौत के बाद घर में नहीं बैठीं। उन्होंने एसएसबी की तैयारी करने की ठान ली और सलेक्ट भी हुईं। फिर ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकेडमी चेन्नई में ट्रेनिंग लेकर सेना में अधिकारी बनीं।

शालिनी शर्मा, उनके पति अविनाश सिंह और बेटा ध्रुव।

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उस वक्त उनका बेटा दो साल का था, जिसे शालिनी ने घर पर ही छोड़ दिया। उन्होंने आर्मी में ऑफिसर बनकर 6 साल तक देश की सेवा की और बाद में कर्नल पद से वीआरएस लेकर पुत्र को भी आर्मी में ऑफिसर बनाया। इस साल 2017 में 40 साल की उम्र में उन्होंने ब्यूटी कोंटेस्ट में हिस्सा लेकर मिसेज इंडिया क्विन ऑफ़ सब्सटेंस -2017 का ख़िताब जीता। इसके साथ ही उन्होंने एक और रिकार्ड अपने नाम किया। वह पहली महिला फौजी बनीं, जिसने मिसेज इंडिया क्लासिक का खिताब जीता है।

26 साल की कम उम्र में पति की मौत हो जाने के बाद घर वालों ने उन्हें दोबारा शादी करने के लिए समझाया। इसके बाद उन्होंने 2008 में सेना के ही मेजर एसपी सिंह से फिर से शादी की। लेकिन उन्होंने उनके खाते से अस्सी लाख रुपये निकाल लिए और उनके साथ धोखेबाजी की। इसके बाद उन्होंने तलाक ले लिया।

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शालिनी सिंह उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं, जो हालातों से लड़ने के बजाय उनसे हार मान लेती हैं। शालिनी अब एक कंपनी में बतौर सीनियर मैनेजर कार्यरत हैं। इसके अलावा वह समाज सेवा करती हैं। ग़रीब और दिव्यांग बच्चों को पढ़ाई में मदद करती हैं।

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