खाना, पानी और हवा में मौजूद हैं कैंसर के कारक

आंकड़ों के मुताबिक हर 5 में से एक आदमी और हर 6 में से एक औरत कैंसर से ग्रस्त है। कई विशेषज्ञ कैंसर को 21वीं सदी की दुनिया का सबसे बड़ा चुनौती मानते हैं, वहीं कई लोग इसे 21वीं सदी की महामारी भी कहते हैं।

खाना, पानी  और हवा में मौजूद हैं कैंसर के कारक

लखनऊ। कैंसर की लंबी बीमारी के बाद गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का रविवार देर शाम निधन हो गया। इस तरह कैंसर ने एक और व्यक्ति की जान ले ली। पर्रिकर, स्टीव जॉब्स, नेल्सन मंडेला, टॉम अल्टर, राजेश खन्ना जैसे उन हस्तियों में शुमार हो गए जिनकी कैंसर ने जान ले ली।

एक रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में एक करोड़ 80 लाख लोग कैंसर से पीड़ित हुए जबकि एक करोड़ लोगों की कैंसर से मृत्यु हो गई। आंकड़ों के मुताबिक हर 5 में से एक आदमी और हर 6 में से एक औरत कैंसर से ग्रस्त है। कई विशेषज्ञ कैंसर को 21वीं सदी की दुनिया का सबसे बड़ा चुनौती मानते हैं, वहीं कई लोग इसे 21वीं सदी की महामारी भी कहते हैं।

सामान्यतया धूम्रपान और एल्कोहल के सेवन को कैंसर का प्रमुख कारण माना जाता है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। कैंसर का एक प्रमुख कारण कार्सिनोजेन है, जो कि आजकल के प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (प्रोसेस्ड फूड) में भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। कार्सिनोजेन वे तत्व होते हैं जिनके शरीर में जाने से कैंसर होने का खतरा बढ़ता है। यह एक रासायनिक पदार्थ, एक वायरस या विकिरण हो सकता है।

कार्सिनोजेन सीधे हमारी कोशिकाओं में पहुंचकर डीएनए को नुकसान पहुंचाता है। यह कोशिकाओं की सामान्य प्रक्रियाओं में व्यवधान डालता है। इसकी वजह से कोशिकाएं तेजी से विभाजित होने लगती हैं। कोशिकाओं के तेजी से विभाजन के कारण कैंसर की संभावना बढ़ जाती हैं। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के अलावा, पैकेज्ड खानों, भुने और तले हुए पदार्थों में कार्सिनोज अधिक मात्रा में पाया जाता है।

उदाहरण के तौर पर फ्रोजेन मीट, मटर, तंदूर पर पकी हुई सब्जियां, रोटियां, पैक किए हुए खाने के पदार्थों में कार्सिनोजेन अधिकाधिक मात्रा में होता है। पिज्जा, बर्गर, रोस्टेड चिकन, रोस्टेड पनीर, रोस्टेड ब्रेड, कोल्ड ड्रिंक, टोमैटो सॉस, पैकेट वाला दूध, पैकेट वाला पानी, पैकेट वाले चिप्स आदि में कार्सिनोजेन पाया जाता है।

एल्कोहल, सिगरेट और ई-सिगरेट में भी कार्सिनोजेन पर्याप्त मात्रा में होता है। इसके अलावा खेतों में प्रयोग हो रहे यूरिया और पेस्टिसाइड में भी कार्सिनोजेन होता है। आपको बता दें कि भारत में पेस्टिसाइड का प्रयोग बहुतायात में होता है। पंजाब का क्षेत्रफल, भारत के क्षेत्रफल का सिर्फ 2 प्रतिशत है जबकि वहां पर पूरे देश का 17 प्रतिशत पेस्टिसाइड प्रयोग होता है। एक साल में लगभग 7 मिलियन टन पेस्टिसाइड हम उस धरती को देते हैं, जिसे हम माता कहते हैं। यही कारण है कि भारत में सबसे अधिक कैंसर के मामले पंजाब से ही पाए जाते हैं।

हमारे देश में पेस्टीसाइड पर निर्भरता इतनी बढ़ गई है कि लोग चाहकर भी कैंसर से बच नहीं सकते। इसलिए कैंसर खास से आम बीमारी होती जा रही है। जीएम फसलों में भी कार्सिनोजेन होता है। यह एक वैश्विक समस्या है कि कृषि को भी लोग एक उधोग बना लिए हैं और अधिक से अधिक फसल उगाने के लिए जीएम फसल उगाने की व्यवस्था

प्रदूषण से भी कार्सिनोजेन पैदा होते हैं। यह प्रदूषण वायु, जल और मृदा कुछ भी हो सकता है। उद्योगीकरण से वायु और जल लगातार प्रदूषित हुआ है। चीन में उधोगीकरण की वजह से कई नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं। ऐसी नदियों को वहां कैंसर नदी कहा जाता है। इन नदियों से कुल 50 करोड़ लोगों की पेय जल की पूर्ति होती है। चीन में ऐसे कई गांव हैं जहां हर दो परिवार में कम से कम एक लोग कैंसर से पीड़ित हैं। ऐसे गांवों को चीन में कैंसर गांव कहा जाता है। उद्योगीकरण की कीमत आम आदमियों को चुकता करना पड़ रहा है।

हैरानी की बात यह है कि कार्सिनोजेन्स के खिलाफ अभी तक कोई भी जनांदोलन नहीं हुआ है। इसे रोकने के लिए कोई भी सरकार गंभीर नहीं दिख रही है। 2010 में अमेरिका में ओबामा के समय एक कैंसर पैनल का गठन हुआ था जिसने राष्ट्रपति को सलाह दी थी कि वह भोजन, पानी और हवा से कार्सिनोजेन्स निकालने की आकस्मिक व्यवस्था करें। लेकिन इस पर भी कोई बात नहीं बन सकी थी।

जैविक खेती को कार्सिनोजेन का एक विकल्प माना जाता है। लेकिन जैविक खेती भारत में लोग ना के बराबर ही करते हैं। जैविक खेती से ना सिर्फ स्वास्थ्यवर्धक भोजन मिलता है बल्कि इससे जैव विविधता और पर्यावरण भी संरक्षित रहती है।

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