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आज छत्तीसगढ़ में मनाया जा रहा है 'नवाखाई', किसान धान में बालियां आने पर मानते हैं ये पर्व

Tameshwar SinhaTameshwar Sinha   7 Sep 2019 5:16 AM GMT

आज छत्तीसगढ़ में मनाया जा रहा है

कांकेर (छत्तीसगढ़)। धान का कटोरा कहे जाने वाला छत्तीसगढ़ अपनी परम्पराओं को लेकर जाना जाता है। इस के उत्सव, पर्व खेती पर आधारित होते है। धान की रोपाई से लेकर फसल कटने तक यह के किसान विभिन्न प्रकार के सामूहिक उत्सव और पर्व मनाते हैं।

जैसे कि धान रोपाई के समय छत्तीसगढ़ में आदिवासी क्षेत्रों में बीज पंडुम मनाया जाता है आम की पहली फसल खाने के पूर्व मरका पंडुम ठीक वैसे ही अभी खेती किसानी में धान की फसल में बालियां आना शुरू हो गया है और किसान अब इस उत्सव को नवा खाई पर्व के रूप में सामूहिक उत्सव मनाएंगे। धान की नई बाली को अपने इष्ट देवताओं में अर्पित कर परिवार के लोग उस नये अनाज को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।


कांकेर जिले के माकड़ी गांव के किसान योगेश नरेटी कहते हैं, "हमारे उत्सव पर्व प्राकृतिक पर निर्भर रहते हैं इन्हीं को जोड़ता है खेती किसानी। यह पहाड़ों को पूजा जाता है और जंगल का उत्सव मनाया जाता है। इसी कड़ी में यह नवा खाई भी है हमारे खाने से पहले हमारे पुर्वजों को अर्पित किया जाता है। फिर घर-घर नवा खाई पर्व मनाया जाता है। धान का पौधा जब पूर्ण रूप से परिपक्व हो जाता है तो किसान खुशी में नवा खाई (नुवा खाई) त्यौहार, उत्सव मनाते हैं। "

शासकीय महाविद्यालय, रामचंद्रपुर हिंदी असिस्टेंट प्रोफेसर पीयूष कुमार के अनुसार आदिवासी संस्कृति में नवाखाई महोत्सव का विशेष महत्व है। आदिकाल से यह परंपरा चली आ रही है। खेती-किसानी के काम के बाद जब नई फसल पककर तैयार होती हैं, तो पहला भोग ईष्ट देव को चढ़ाते है। ईष्ट देव की कृपा से ही आदिवासी संस्कृति समृद्ध होती है।


पीयूष आगे बताते हैं कि खेत से नई बालियां आ गयी हैं। इन बालियों के दाने तसमई (खीर) और चावल मे डाले जायेंगे। पूड़ी और उड़द दाल का बडा बनाया जाएगा। यह सब कुलदेवता को भोग लगाकर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाएगी।

यह लोक का अपना पर्व है। छत्तीसगढ के बस्तर मे (नवाखाई) और वहीं यह पड़ोसी राज्य ओडिशा में (नुवाखाई) मनाया जाता है, इसका महत्व वही है जो पोंगल, ओंणम, बैसाखी, बिहू आदि का है। यह समस्त त्योहार कृषि से सम्बद्ध हैं और इसका अधिक उत्साह लोक मे, गांवों मे या कहें कृषि से जुड़े लोगो मे दिखता है। आज नगरीयकरण और गांव से बढती दूरी ने इस पर्व के मूल स्वरूप को किसी हद तक जरूर कम कर दिया है पर हम प्रतीकात्मक ही सही, अपने स्तर पर कोशिश कर रहे हैं कि यह कायम रहे।

आज 7 सितंबर से छत्तीसगढ़ में नवाखाई का पर्व शुरू हो रहा है जहां अपने इष्ट देवताओं को नए धान की बालियों का चावल बना कर अर्पित किया जाएगा फिर घर-घर यह पर्व को मनाया जाएगा।


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