चमकी बुखार में बेटी खोने वाले पिता ने कहा- "अभी भी लगता है जैसे वो कह रही है, पापा भूख लगी है कुछ बना दो"

दर्जनों ऐसे मां-बाप हैं जिनके सामने ही उनके बच्चों ने चमकी बुखार से दम तोड़ दिया था, लाख कोशिशों के बावजूद उनके बच्चों की यादें उन्हें परेशान कर रही हैं

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   14 Nov 2019 1:34 PM GMT

चमकी बुखार में बेटी खोने वाले पिता ने कहा- "अभी भी लगता है जैसे वो कह रही है, पापा भूख लगी है कुछ बना दो"

"उसकी मां के गुजर जाने के बाद बिटिया ही जीने का सहारा थी। भगवान ने उसको भी हमसे छीन लिया। कभी-कभी तो लगता है कि हम सोए हुए हैं और वो हमसे कह रही है, पापा-पापा उठो हमको भूख लगी है कुछ बना दो।" इतना कहते-कहते विनोद कुमार यादव(35वर्ष) फोन पर ही जोर-जोर से रोने लगते हैं।

बिहार के जनपद मुजफ्फरपुर के प्रखंड मधुबन के गाँव मिथनपुरा निवासी विनोद कुमार की इकलौती बेटी सलोनी (5वर्ष) की मौत चमकी बुखार से जून 2019 में हो गई थी। कुछ साल पहले सड़क हादसे में पत्नी को खोने के बाद विनोद के जीने के लिए उसकी एकलौती बेटी सलोनी ही सहारा थी, लेकिन वह भी उन्हें छोड़कर चली गई। बेटी की मौत के सदमे से विनोद अभी उभर नहीं पाए हैं।

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परिजनों को लाख कोशिशों के बावजूद परेशान कर रही हैं बच्चों की यादें।

चमकी बुखार की चर्चा एक बार फिर हो रही है, क्योंकि सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाली बिहार की एक गैर सरकारी संस्था ने एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके अनुसार 76.2 फीसदी परिवार वालों को चमकी बुखार के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। ज्यादातर पीड़ित बच्चे गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे। सर्वे में चमकी बुखार से पीड़ित 227 अभिभावकों से बातचीत की गई थी। ऐसे में गाँव कनेक्शन ने उन परिजनों से बात की जिन्होंने ने चमकी से अपनों को खो दिया।

विनोद के बच्चे की ही तरह न जाने कितने लोग भारत में ऐसी बीमारियों से दम तोड़ देते हैं जिन्हें जल्द इलाज, और मूलभूत सुविधाओं तक उनकी पहुंच से बचाया जा सकता है। ये ऐसी बीमारियां हैं, जो साफ-सफाई, टीकाकरण, पोषणयुक्त भोजन और समय से इलाज मिलने से हजारों ज़िंदगियां बचाई जा सकती हैं।

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जून महीने में चमकी बुखार से एक साथ इतनी संख्या में हुई मौतों के बाद पूरे देश में मुजफ्फरपुर काफी चर्चा रहा। कुछ ऐसी ही चर्चा गोरखपुर की भी जेई (जापानी इंसेफेलाइटिस) से होती रही है। गोरखपुर और आस-पास के करीब आधा दर्जन जिलों में जेई कई सालों से बच्चों पर कहर बरपाती आ रही है। वर्ष 2017 में गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन गैस की कमी से जेई वार्ड में भर्ती कई दर्जन बच्चों की मौत हो गई थी। उस समय यह मामला काफी चर्चित हुआ था।

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पिछले 25 साल से बिहार के मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों में चमकी बुखार हर साल कहर बरपा रही है। हर साल बड़ी संख्या में बच्चे इस बीमारी वजह से दम तोड़ देते हैं। इस लाइलाज बीमारी की पहचान करने की कोशिशें की जा रही हैं। अब तक के शोध और जांच में बढ़े तापमान, आद्रता और कुपोषण और लीची को इसका जिम्मेदार माना गया है। लेकिन अभी भी इस बीमारी के मूल कारणों का पता नहीं लगाया जा सका है। वर्ष 1995 से लगातार यह बीमारी मासूमों की जान ले रहा है। लक्षण के आधार पर इसे एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम नाम दे दिया गया, लेकिन मुजफ्फरपुर के प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अरुण शाह इस बीमारी की वजह कुपोषण, गंदगी और गरीबी को मानते हैं।

जिनके बच्चे चमकी से बच गए आज भी उनकी आंखों में चमकी का खैाफ है।

जापानी इंसेफेलाइटिस पर कई वर्षों से काम करने वाले यूपी के गोरखपुर निवासी डॉ. आरएन सिंह ने गाँव कनेक्शन को फोन पर बताया, " पिछले तीन दशक में गोरखपुर मे मेडिकल कॉलेज के अनुसार 10 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। वर्ष 1978 में गोरखपुर में जेई का पहला केस सामने आया था। यूपी में योगी सरकार के प्रयासों से गोरखपुर में इस बीमारी से होने वाली मौतों की संख्या में काफी कमी आई है। अगर सरकार इस बीमारी को लेकर संजीदा हो जाए तो निश्चित रूप से इसे जड़ से समाप्त कर सकते हैं। जब पोलियो और चेचक से देश मुक्त हो सकता है तो जेई और चमकी से क्यों नहीं ? "

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बिहार के जनपद वैशाली जिले प्रखंड भगवानपुर के हरिबंशपुर गांव के ही रहने वाले है चतुरी सैनी भी अपने जिगर के दो टुकड़ों को चमकी बुखार से गंवा चुके हैं। चतुरी ने गाँव कनेक्शन को फोन पर बताया, " दोनों बच्चों की बहुत याद आती है। है। मैं तो बाप हूं इसलिए किसी तरह से खुद का संभाल लेता हूं, लेकिन मेरी औरत (पत्नी) आज भी उन्हें भुला नहीं पाई है। ऐसा कोई दिन नहीं है जब वो बच्चों को याद कर रोती न हो।"

मुजफ्फरपुर जिले से करीब 10 किलोमीटर दूर मुशहरी प्रखंड के गांव नेउरा के रहने वाली मुन्नी देवी (50वर्ष) के पोता गुड्डू (3वर्ष)और पोती मेघा (डेढ़ वर्ष) को चमकी बुखार हो गया था। लेकिन डॉक्टरों की कोशिश से दोनों स्वस्थ होकर घर आ गये थे। मुन्नी देवी ने फोन पर गाँव कनेक्शन को बताया, " दोनों बच्चा जब बीमार थे तब हमने भगवान के सामने बहुत हाथ-पैर जोड़े थे, उसी का नतीजा था कि हमारे बच्चे बच गए। लेकिन दोनों हमेशा बीमार रहते हैं, डॉक्टर बोले हैं धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।"

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