चंपारण: शिक्षा और खादी के प्रयोग

चंपारण: शिक्षा और खादी के प्रयोगचंपारण।

चरखे में स्वराज समाया है

या

खादी पहनिए क्योंकि खादी अंतिमजन को रोजगार देकर उसके पेट की भूख मिटाती है

खादी-ग्रामोद्योग के उत्पादों के साथ मिलने वाली रसीदों पर छपे गांधी जी के इन विचारों के क्या मायने हैं?

डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा चंपारण सत्याग्रह पर लिखी गई किताब से पता चलता है गांधी जी पहले-पहल यहाँ चार-पाँच दिनों के लिए आए थे लेकिन जब उन्होंने देखा कि काम में महीनों लग सकते हैं तो फिर 'कुछ और कार्यों' की तरफ भी ध्यान दिया गया। यही आगे चलकर गांधीवादी आंदोलनों की रणनीति बन गई। सत्याग्रह में जितना महत्वपूर्ण अंग्रेजी सरकार के शोषणकारी कानूनों का विरोध था, वहीं इन सत्याग्रहों को जन-आंदोलन बनाने के लिए गांधी जी की कार्यपद्धति में शिक्षा, सामुदायिक विकास और खादी की कताई-बुनाई जैसे बुनियादी कार्य भी शायद उतने ही महत्वपूर्ण थे।

चंपारण को याद करने का मतलब सिर्फ उस घटनाक्रम या गांधी के विचारों को याद कर भविष्य में (संभवतः) ‘खोखले सरकारी संकल्प’ लेने का नहीं है, बल्कि इस अवसर पर हम यह भी देखें कि गांधी के नाम पर बड़ी-बड़ी कसमें खाने वाली सरकारों ने गांधी के उन विचारों का क्या किया, जो एक समय जमीन पर उतरे थे। इस हिस्से में हम शिक्षा और चरखे के लिए गांधी जी के प्रयासों और उन प्रयासों के जो ‘अवशेष’ बचे हैं, उनकी चर्चा कर रहे हैं।

चंपारण सत्याग्रह के दूसरे चरण (नवंबर 1917) में गांधी जी द्वारा (वर्तमान पूर्वी चंपारण) के बड़हवा-लखनसेन में स्थापित पहला बुनियादी विद्यालय इसी दिशा में पहला प्रयास था। यह विद्यालय 13 नवंबर 1917 में स्थापित किया गया। आज इस विद्यालय में उनके नाम का बस एक स्मारक शेष बचा है। बुनियादी शिक्षा देने के जिस सिद्धांत पर इसकी स्थापना की गई थी, वह अब सिर्फ यादों में सीमित बचा है। न सिर्फ व्यवहार में बल्कि सिद्धांतों में भी यहाँ का पठन-पाठन बिहार के अन्य परंपागत विद्यालयों जैसा हो चुका है। गाँव के ही रहने वाले और ग्राम विकास समिति के सचिव मो. कमल हसन दावा करते हैं कि अब इस विद्यालय को महाविद्यालय और विश्वविद्यालय बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

दूसरा विद्यालय पश्चिमी चंपारण के भितिहरवा में स्थापित किया गया जो आज आश्रम/स्मारक में तब्दील कर दिया गया है। इस विद्यालय में कस्तूरबा गांधी करीब छः महीने रही थीं। कहते हैं कि गांधी जी को तो कई भाषाएं आती थीं लेकिन बा को शायद हिंदी और वह भी इस इलाके में बोली जाने वाली भोजपुरी न के बराबर समझ में आती थी। भाषा की इस समस्या के बारे में बा ने जब गांधी जी को बताया कि उन्हें इन लोगों की भाषा समझ में नहीं आती तो वे कैसे इन लोगों को पढ़ा पाएंगी? इस पर गांधी ने जवाब दिया कि अगर भाषा नहीं आती तो कोई बात नहीं, वे (कस्तूरबा) कम से कम यहाँ के बच्चों के दांत तो मांझ ही सकती हैं या कम से कम उन्हें रोज नहला-धुला कर सफाई से रहना तो सिखा ही सकती हैं!

गांधी जी के सिद्धांतों पर, एक अन्य विद्यालय वृंदावन में खोला गया था लेकिन उसकी स्थापना 1917 में न होकर 1939 में हुई थी। समय की दृष्टि से देखें तो इसकी यहाँ चर्चा बेमानी लगती है लेकिन फिर भी करनी पड़ रही है। दरअसल आधिकारिक रुप से ही सही, यही वह विद्यालय है जो गांधी जी के विचारों का ‘सैद्धांतिक रुप’ से अनुसरण कर रहा है।

कुल 13 शिक्षकों में से आधे से अधिक गांधी स्मृति की तरफ से नियुक्त हैं, जिन्हें बुनियादी शिक्षा के लिए विशेष प्रशिक्षण मिला हुआ है। लेकिन हक़ीक़त में चीजें कुछ और ही हैं। गांधी की बुनियादी शिक्षा को पढ़ाना है तो शायद गांधी के विचारों से पहले परिचित होना अनिवार्य हो जाता है। मुझे लगता है कि इस दिशा में जहाँ न सिर्फ (कम से कम) गांधी की आत्मकथा जरुरी है बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण उनकी 'हिंद स्वराज' है। (संभव है कि मेरा अनुमान गलत हो, लेकिन फिर भी कम से कम इस पुस्तक की जानकारी तो होनी ही चाहिए) लेकिन गांधी जी की 'हिंद स्वराज' को पढ़ना तो दूर, कोई इस किताब का नाम भी नहीं जानता। आपको यह सामान्य लग सकता है कि प्राइमरी या दस तक के सरकारी विद्यालयों के अध्यापकों से इतनी 'ज्ञान' की अपेक्षा नहीं की जा सकती लेकिन यहाँ मामला कुछ हटकर है इसलिए गांधी जी से जुड़ी चीजों का जानना प्रासंगिक हो जाता है।

लेकिन अंतिम निष्कर्ष बनाने से पहले इस 'अंधेरे' एक दूसरे पहलू पर गौर करना चाहिए। जिन शिक्षकों का गांधी स्मृति की तरफ से नियुक्त किया गया है, उनका वेतन सिर्फ पांच हजार रुपया है। ऐसे में परिवार का कितना पेट भरा जाएगा और इसके बाद कितने 'ज्ञान ग्रहण' करने की संभावना बनी रहेगी, यह अपने आप में प्रश्न बन जाता है! गांधी जी के विचारों पर आधारित इन विद्यालयों के पुनिर्माण के लिए सरकारों के पास पैसे का कोई अभाव नहीं है, शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में गांधी जी की याद में पुनिर्माण हो भी रहा है लेकिन उनके विचारों को 'हक़ीक़त' में उतारने की इच्छा शक्ति दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती।

बुनियादी शिक्षा और चरखे का मूल एक ही है। जिसे हम कम शब्दों में स्वावलंबन से स्वराज के रुप में समझ सकते हैं। गांधी जी का खादी पर भी उतना ही जोर था, लेकिन चंपारण के समय उस स्तर पर कोई व्यवस्थित प्रयास नहीं हुआ जो बुनियादी शिक्षा के मसले पर हुआ। लेकिन गांधी के अनुयाइयों ने आगे चलकर सूत कताई और ग्रामोद्योग के लिए कुछ प्रयास किए। इन्हीं में से दो की चर्चा यहाँ, जो चंपारण में अभी भी चल रहे हैं। पूर्वी चंपारण के मधुबनी गांव में स्थित खादी की यह कार्यशाला न सिर्फ इतिहास में बल्कि वर्तमान में भी पूरे बिहार और उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी और व्यवस्थित कार्यशाला थी और है।

लेकिन दिल्ली में खादी की चकाचौंध से दूर यहाँ अब सब खंडहर होता जा रहा है। पूंजी और कच्चे माल की अनुप्लब्धता के कारण यहाँ करघे पर काम करने वाले सिर्फ दो लोगों को महज 60-65 दिनों को रोजगार मिल पाता है। जिसमें उनकी मजदूरी बनती है 210-230 रुपया प्रतिदिन। इसी गाँव में रहने वाले और एक समय खादी ग्रामोद्योग में कार्यरत रहे विजय प्रसाद बताते हैं कि सन 1982-83 के समय इस केंद्र पर करीब दसियों हज़ार लोगों को रोजगार मिलता था। हालांकि संख्या में कुछ अतिश्योक्ति हो सकती है लेकिन जितने बड़े परिसर (17 एकड़) में यह फैला है और जिस स्तर पर यहाँ कबाड़ हो चुके करघों की संख्या (करीब सौ से अधिक) दिख रही है, उससे निश्चित ही कहा जा सकता है कि एक समय बहुत बड़ी संख्या में यहाँ लोगों को रोजगार मिलता होगा। लेकिन अपनी नियति से विपरीत जाकर समय की सुइयां यहाँ उल्टा घूमी हैं।

कुछ ऐसी ही हालत वृंदावन में भी देखने को मिली है। यहाँ तो खादी ग्रामोद्योग की हालत और भी खराब है। इसे चलाने वाले को प्रमोद साह की आंखों में निराशा स्पष्ट रुप से दिख जाएगी। और ऐसा हो भी क्यों न... कहते हैं कि सन 1978-80 कपड़ा बुनाई का एक रुपया प्रतिमीटर मिलता था जो बढ़ कर आज 25 रुपए हो पाया है। इतना बताते हुए वह पूछते हैं कि बताइए क्या मंहगाई इतनी ही बढ़ी है? 25 रुपए की दर से प्रमोद दिनभर में करीब साढ़े चार-पाँच मीटर खादी तैयार कर पाते हैं। इस हिसाब से इनकी मजदूरी हुई 125 रुपए प्रतिदिन।

ग्रामोद्योग की इन दो उदाहरणों से स्पष्ट है कि भले खादी में गरीबों का पेट भरने की क्षमता हो लेकिन वर्तमान में जो हालात हैं, उसमें वह ऐसा करने में सक्षम नहीं। लेकिन ऐसा नहीं कि बुनियादी शिक्षा और चरखे पर गांधी जी के विचार इस इलाके में कहीं हक़ीक़त बनते हुए न दिखाई दे रहे हों।

पश्चिमी चंपारण में नरकटियागंज में बेहद छोटे स्तर पर ही सही लेकिन इन विचारों का मूर्त रुप दिखाई दे जाता है। गांधी जी के विचारों पर आधारित इस विश्व मानव सेवा आश्रम में वह सब कुछ होता है, जो गांधी जी चाहते थे। बात चाहे अपने भोजन के लिए खेतों में श्रमदान की हो, चरखा चलाकर सूत कातने की हो, खुद साफ-सफाई करने की, भोजन बनाने में अपना योगदान करने की या अपने आसपास की चीजों को देखकर सीखने-पढ़ने की... इस आश्रम को चलाने वाले और बच्चे सभी इसका बखूबी पालन करते हैं। सरकारी विद्यालयों के विपरीत इनके पास इच्छा शक्ति तो है लेकिन बुनियादी जरुरतों को पूरा करने के लिए संसाधन बेहद कम हैं।

चंपारण की शताब्दी समारोह पर सरकारें पाँच-छः सौ करोड़ खर्च कर रही हैं। इस रकम का कितना जमीनी धरातल पर उतरेगा और कितना बातों का गुबार बन कर अंतरिक्ष में खो जाएगा, ये तो पता नहीं लेकिन इतिहास देख कर लगता है कि नारों में गांधी जीवित रहने चाहिए... उन्हें हक़ीक़त में उतारने की किसी को कोई जल्दी नहीं है। और हो भी क्यों... अभी तो महज़ सौ साल ही हुए है!

(लेखक, अमित और सह लेखक विश्वजीत मुखर्जी ऑफप्रिंट से जुड़े हैं)

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